वह नेता जिसने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत ही कांग्रेस के विरोध और आपातकाल के विरोध से की थी - और अंत में उसी कांग्रेस ने उन्हें वह सब कुछ दिया जो शायद किसी और पार्टी में मिलना मुश्किल था. कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक - यानी कुल 8 साल मुख्यमंत्री रहने वाले सिद्धारमैया की कहानी उतनी ही दिलचस्प है जितनी लंबी.
कांग्रेस के विरोधी से कांग्रेस के मुख्यमंत्री तक
1980 से लेकर 2005 तक सिद्धारमैया कांग्रेस के कड़े विरोधी रहे और जनता दल तथा बाद में जनता दल सेक्युलर से जुड़े रहे. लेकिन बात तब बिगड़ी जब जनता दल सेक्युलर के नेता एच.डी. देवगौड़ा अपनी राजनीतिक विरासत अपने बेटे एच.डी. कुमारस्वामी को सौंपने लगे और उन्हें ज्यादा अहमियत देने लगे. यहीं से साल 2005 में सिद्धारमैया और देवगौड़ा के बीच खींचतान खुलकर सामने आने लगी.
2005 में बात इतनी बिगड़ी कि सिद्धारमैया को जनता दल सेक्युलर से बाहर निकाल दिया गया. पार्टी से बाहर होने के बाद उन्होंने अपनी अलग पार्टी बनाने की कोशिश की - लेकिन कर्नाटक में वह पार्टी जमीन नहीं पकड़ सकी. तब उन्हें अपनी राजनीतिक जमीन कांग्रेस में तलाशनी पड़ी.
इस कड़ी में सबसे अहम भूमिका निभाई कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सोनिया गांधी के करीबी सलाहकार अहमद पटेल ने. वह कांग्रेस हाई कमान और सिद्धारमैया के बीच एक सेतु के रूप में काम कर रहे थे.
कांग्रेस ने उन्हें तब अपनाया जब वह अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कठिन दौर में थे. सोनिया गांधी ने खुद उनसे बात की और व्यक्तिगत रूप से यह भरोसा दिलाया कि कांग्रेस में आइए - आपको मुख्यमंत्री बनाया जाएगा.
पार्टी के भीतर भी राह आसान नहीं थी
कांग्रेस में आने के बाद भी सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री बनने की राह आसान नहीं थी. आज जो कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं - मल्लिकार्जुन खरगे. वह उस वक्त कर्नाटक के सबसे बड़े नेताओं में से एक थे और सिद्धारमैया के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वियों में से एक.
लेकिन सिद्धारमैया ने उन्हें भी पीछे छोड़ दिया. खरगे केंद्र की राजनीति में चले गए और कर्नाटक में सिद्धारमैया का एकछत्र राज स्थापित हो गया.
AHINDA - एक नया राजनीतिक समीकरण
सिद्धारमैया खुद कुरुबा समुदाय से आते हैं - जो मेंढक पालन करने वाला पिछड़ा वर्ग है. लेकिन उन्होंने अपना राजनीतिक समीकरण केवल अपनी जाति तक सीमित नहीं रखा. उन्होंने एक नया फॉर्मूला तैयार किया जिसे उन्होंने नाम दिया - AHINDA.
इसमें शामिल थे - अल्पसंख्यक यानी मुस्लिम समुदाय जो कर्नाटक में लगभग 13 प्रतिशत है, पिछड़ा वर्ग जिसमें उनकी खुद की कुरुबा जाति भी शामिल है और दलित यानी अनुसूचित जाति जो लगभग 17 प्रतिशत है.
इन सबको मिलाकर उन्होंने अपना एक मजबूत सामाजिक गठजोड़ बनाया. यही कारण था कि सिद्धारमैया हर समुदाय के नेता माने जाते थे - एक ऐसे नेता जिन्हें हर वर्ग अपना नेता मानता था.
2013 - पहली बार मुख्यमंत्री
2013 में जब कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव जीता तो सिद्धारमैया को राज्य का 22वाँ मुख्यमंत्री बनाया गया. उनके मुख्यमंत्री बनने की वकालत डी.के. शिवकुमार ने हाई कमान से की थी. हालाँकि बाद में साल 2023 में जब काँग्रेस सत्ता में आई तो दोनों के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर अंदरूनी खींचतान बनी रही.
2018 में जब कांग्रेस चुनाव हारी तो सिद्धारमैया को विधानसभा में विपक्ष का नेता बनाया गया.
2023 में कांग्रेस ने डी.के. शिवकुमार के नेतृत्व में जोरदार चुनाव लड़ा और सरकार बनाई, वह उस वक्त राज्य के प्रदेश अध्यक्ष थे. लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर एक बार फिर खींचतान शुरू हो गई. एक तरफ डी.के. शिवकुमार मुख्यमंत्री बनना चाहते थे और दूसरी तरफ सिद्धारमैया.
जब डी.के. शिवकुमार किसी की बात मानने को तैयार नहीं थे तो उन्होंने कहा कि मुझे मैडम सोनिया से बात करनी है. उस वक्त सोनिया गांधी शिमला में छुट्टियाँ मना रही थीं. फोन पर उन्होंने शिवकुमार को आश्वासन दिया कि ढाई साल बाद आपको मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. और इस तरह सिद्धारमैया दूसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने.
यह दिलचस्प संयोग है कि जो वादा कभी सोनिया गांधी ने सिद्धारमैया से किया था - वही वादा अब डी.के. शिवकुमार से किया गया.
और अब वह समय आ गया है जब सिद्धारमैया मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ेंगे और डी.के. शिवकुमार कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री बनेंगे. 8 साल तक राज्य के मुख्यमंत्री रहने वाले सिद्धारमैया का यह सफर - कांग्रेस के विरोध से शुरू होकर कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत तक पहुँचने की एक अनोखी कहानी है.
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