अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के लिए 3 नवंबर को वोट डाले जाएंगे. Early Voting पहले ही शुरू हो चुकी है और अनुमानों के मुताबिक़ क़रीब चार करोड़ अमेरिकी अपना वोट डाल चुके हैं. असल मतदान 3 नवंबर को होगा जिसके ख़त्म होते ही गिनती शुरू हो जाएगी. भारतीय समय के हिसाब से नतीजे 4 नवंबर की सुबह से आने लगेंगे. पूरी दुनिया की तरह भारत की नज़र भी इस चुनाव पर है क्योंकि अमेरिका में हो रहे इस चुनाव के नतीजे तय करेंगे कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने फ़ैसले कितनी आसानी से लागू करा पाएंगे इसका सीधा असर टैरिफ़, H-1B वीज़ा और रूस से तेल ख़रीद जैसे मुद्दों पर भारत के साथ अमेरिका के रुख़ पर पड़ सकता है.
क्या होते हैं मिडटर्म चुनाव?
अमेरिका में राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता है. ये चुनाव कार्यकाल के ठीक बीच में होते हैं, इसीलिए इन्हें मिडटर्म कहा जाता है. इनमें तय होता है कि अमेरिकी कांग्रेस, यानी वहां की संसद, पर किस पार्टी का नियंत्रण रहेगा. कांग्रेस के दो हिस्से हैं, हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स (निचला सदन) और सीनेट (ऊपरी सदन). देश भर में लागू होने वाले संघीय क़ानून बनाना और पास करना कांग्रेस का अहम काम है.
इस बार हाउस की सभी 435 सीटों पर चुनाव होगा. हाउस सदस्यों का कार्यकाल दो साल का होता है और आम तौर पर प्रस्तावित क़ानून पहले यहीं पेश किए जाते हैं और इन्हीं पर बहस होती है. फ़िलहाल 219 सीटें रिपब्लिकन पार्टी के पास हैं, 214 पर डेमोक्रेट्स का कब्ज़ा है और दो सीटें ख़ाली हैं. सीनेट की 100 में से 35 सीटों पर चुनाव होगा. सीनेटरों का कार्यकाल छह साल का होता है और वो हाउस से आए प्रस्तावित क़ानूनों को मंज़ूरी देते हैं या रोक देते हैं. इस समय सीनेट में रिपब्लिकन के 53 और डेमोक्रेट्स के 45 सदस्य हैं. दो निर्दलीय सीनेटरों का समर्थन भी डेमोक्रेट्स को हासिल है.
रिपब्लिकन पार्टी का दोनों सदनों में बहुमत है. डेमोक्रेट्स को दोनों सदनों में नियंत्रण पाने के लिए चार-चार सीटों का शुद्ध फ़ायदा चाहिए. इसी दिन ज़्यादातर राज्यों में स्थानीय नेताओं का भी चुनाव होगा. इनमें कैलिफ़ोर्निया, फ़्लोरिडा, जॉर्जिया और मिशिगन के गवर्नर चुनाव सबसे ज़्यादा चर्चा में हैं.
किसके पक्ष में दिख रही है हवा?
अमेरिकी मतदाता पहले भी मिडटर्म में राष्ट्रपति की पार्टी को ‘सबक़’ सिखाते रहे हैं. मौजूदा सर्वे भी ट्रंप के लिए अच्छे संकेत नहीं दे रहे. पोलिंग वेबसाइट सिल्वर बुलेटिन के मुताबिक़ ट्रंप ने दूसरा कार्यकाल 50 प्रतिशत से कुछ ज़्यादा अप्रूवल रेटिंग के साथ शुरू किया था. अक्तूबर की शुरुआत तक यह घटकर क़रीब 37 प्रतिशत रह गई है. इसी दौरान 61 प्रतिशत लोगों ने उन्हें नापसंद किया.
हालांकि हर सीट पर कांटे की टक्कर नहीं होती. कुछ सीटें रिपब्लिकन या डेमोक्रेट के लिए सुरक्षित मानी जाती हैं. BBC के अमेरिकी सहयोगी सीबीएस न्यूज़ ने आयोवा और न्यू हैम्पशायर जैसे राज्यों की सीनेट की दस सीटों और एरिज़ोना और ओहायो जैसे राज्यों की हाउस की 42 सीटों को कड़े मुक़ाबले वाली सीटों में गिना है.
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत से रिश्ते
भारत को अमेरिका में दोनों प्रमुख पार्टियों का समर्थन मिलता रहा है. फिर भी भारत सरकार ने कई बड़े समझौते रिपब्लिकन राष्ट्रपतियों के साथ किए हैं. पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्रंप को व्हाइट हाउस में भारत का सबसे अच्छा दोस्त तक कहा था, और दोनों नेताओं के निजी रिश्ते भी अच्छे दिखे हैं. लेकिन दूसरा कार्यकाल भारत के लिए उतार-चढ़ाव भरा रहा है. हालात ऐसे बने कि भारत सरकार को अमेरिका से डील करने का अपना तरीक़ा बदलना पड़ा और कई मौक़ों पर व्हाइट हाउस के बयानों का खुलकर जवाब भी देना पड़ा.
सितंबर 2026 में न्यूयॉर्क में एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने आतंकवाद और व्यापार नीतियों के मुद्दे पर अमेरिका, ख़ासकर ट्रंप प्रशासन, की आलोचना की. उन्होंने कहा कि अगर कोई सहयोगी हमारी चिंताओं को नहीं समझता, तो उसका असर दोनों देशों के संबंधों पर पड़ेगा. विशेषज्ञों का कहना है कि यह अकेला मुद्दा नहीं है जिस पर दोनों देशों के बीच असहमति दिखी हो.
टैरिफ़ पर टकराव
ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत के साथ सबसे ज़्यादा विवाद टैरिफ़ को लेकर रहा. ट्रंप प्रशासन ने बार-बार भारत के ऊंचे आयात शुल्क की आलोचना की और उसे ‘टैरिफ़ किंग’ तक कह दिया. रेसिप्रोकल टैरिफ़ के नाम पर अमेरिका ने भारत के कई अहम निर्यात, जैसे स्टील, एल्युमीनियम, कपड़ा और ज्वैलरी, पर भारी शुल्क लगा दिया. अमेरिका ने जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ़ प्रेफ़रेंसेज़ (GSP) के तहत भारत को मिलने वाली ख़ास छूट भी ख़त्म कर दी. इस छूट की वजह से भारतीय सामान बिना शुल्क के अमेरिकी बाज़ार में बिकता था.
टैरिफ़ डील की बातचीत के दौरान अमेरिका ने भारत पर अपने कृषि उत्पादों और डेयरी सामान के लिए बाज़ार खोलने का दबाव डाला. जब भारत ने अपने कृषि और दवा निर्यात के लिए शुल्क में छूट मांगी, तो अमेरिका ने इनकार कर दिया. विशेषज्ञों की सबसे बड़ी आलोचना यही है कि इन टैरिफ़ से अमेरिका को ज़्यादा फ़ायदा होता है, जबकि भारतीयों की जेब पर इसका बोझ पड़ता है.
हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो मुंबई आए, लेकिन राजधानी दिल्ली नहीं गए. उनके दौरे का फ़ोकस ज़्यादातर कारोबार पर दिखा. 'The Indian Express' को दिए इंटरव्यू में रुबियो ने कहा कि कोई भी टैरिफ़ भारत को सज़ा देने या नुक़सान पहुंचाने के लिए नहीं है. उनके मुताबिक़ अमेरिका की बड़ी विदेश नीति में रूस-यूक्रेन युद्ध भी शामिल है. इस बयान से इतना साफ़ है कि अमेरिका भारत के साथ रिश्ते को अहम मानता है और टैरिफ़ को रूस-यूक्रेन युद्ध से जुड़ी अपनी नीति का हिस्सा बताता है. लेकिन टैरिफ़ का ख़तरा पूरी तरह टला नहीं है.
वीज़ा, प्रवासी और रूसी तेल का मुद्दा
‘अमेरिकी नौकरियां बचाने’ के नाम पर बनी नीतियों का सीधा असर भारत के टेक उद्योग और अमेरिका में बसे भारतीयों पर पड़ा है. H-1B वीज़ा का बड़ा हिस्सा भारतीय टेक पेशेवरों को मिलता है. आवेदनों की सख़्त जांच, ज़्यादा रिजेक्शन और फ़ीस बढ़ाने या अतिरिक्त शुल्क लगाने के प्रस्तावों ने TCS, Infosys और Wipro जैसी बड़ी भारतीय IT कंपनियों को प्रभावित किया है. बिना दस्तावेज़ वाले प्रवासियों के ख़िलाफ़ हुई सख़्त कार्रवाई में कई भारतीयों को भी वापस भेजा गया, जिसकी भारत में काफ़ी आलोचना हुई.
तीसरा बड़ा मुद्दा रूस से व्यापार का है. ऊर्जा आपूर्ति के मामले में भारत अपने हितों के हिसाब से चलता है, और यही अमेरिकी विदेश नीति से टकराता रहा है. भारत रूस से सस्ता कच्चा तेल ख़रीदता रहा और अमेरिका इस पर बार-बार दबाव बनाता रहा. रूसी ऊर्जा ख़रीदने वाले देशों पर टैरिफ़ लगाने की धमकी भी दी गई.
भारत के साथ रिश्तों पर अमेरिकी सांसदों का रुख़
विशेषज्ञ इस बात पर एकमत नहीं हैं कि चुनाव नतीजों से भारत को कितना फ़र्क़ पड़ेगा. वॉशिंगटन के कार्नेगी एंडोमेंट फ़ॉर इंटरनेशनल पीस में साउथ एशिया प्रोग्राम के निदेशक मिलन वैष्णव ने अल जज़ीरा से कहा कि सीनेट में कई डेमोक्रेट और रिपब्लिकन सांसद ट्रंप प्रशासन के अमेरिका-भारत रिश्तों को संभालने के तरीक़े से नाराज़ हैं. उनके मुताबिक़ ये सांसद भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति की आलोचना भले करते हों, लेकिन मज़बूत अमेरिका-भारत साझेदारी की ज़रूरत में सचमुच यक़ीन रखते हैं. वैष्णव का मानना है कि भारत को लेकर डेमोक्रेट सांसद नरम रुख़ अपना सकते हैं.
वहीं वॉशिंगटन के विल्सन सेंटर में दक्षिण एशिया मामलों के जानकार माइकल कुगेलमैन ने अल जज़ीरा से कहा कि उन्हें शक है कि चुनाव नतीजों का ट्रंप की विदेश नीति पर असर पड़ेगा. भारत के मामले में बदलाव और भी मुश्किल है. उन्होंने कहा कि ट्रंप क़ानूनी तौर पर तीसरे कार्यकाल के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते, इसलिए वो ऐसी नीतियों पर चलते रहेंगे जिनसे नई दिल्ली के साथ डील में अमेरिका को फ़ायदा मिले.
क्या भारत को मिलेगी राहत?
अगर ट्रंप की पार्टी दोनों सदनों में कमज़ोर पड़ती है, तो क़ानून पास कराने के लिए उसे विपक्ष के समर्थन की ज़रूरत होगी. ट्रंप की कई नीतियों का डेमोक्रेट्स खुलकर विरोध कर चुके हैं. ऐसे में टैरिफ़ जैसे मुद्दों पर भारत को कुछ राहत मिल सकती है. फिर भी कूटनीतिक मामलों में राष्ट्रपति के पास काफ़ी अधिकार होते हैं, और विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है. इसलिए 4 नवंबर को आने वाले नतीजे सिर्फ़ अमेरिकी राजनीति की दिशा नहीं, बल्कि भारत-अमेरिका रिश्तों की अगली तस्वीर का भी संकेत देंगे.
"अमेरिका में मिडटर्म चुनाव के लिए 3 नवंबर को वोट डाले जाएंगे. Early Voting पहले ही शुरू हो चुकी है और अनुमानों के मुताबिक़ क़रीब चार करोड़ अम…"













