नई दिल्ली: IDBI बैंक (इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट बैंक ऑफ इंडिया) की बिक्री का मामला अब सिर्फ निजीकरण की बहस नहीं रहा. इसमें इसको बेचने की कीमत तय करने कि प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में आ गई है. कांग्रेस ने IDBI बैंक के कर्मचारियों के समर्थन में सरकार पर हमला बोला है. दूसरी तरफ बिजनेस वर्ल्ड पत्रिका की एक रिपोर्ट में सरकार के आंतरिक नोट के हवाले से दावा किया गया है कि बोली खुलने के बाद मूल्यांकन के नियम बदले गए. 
सरकार के विनिवेश विभाग ने इस रिपोर्ट के नोट या उसमें लिखी गई बातों को गलत नहीं बताया है. विनिवेश विभाग वित्त मंत्रालय का वह विभाग है जो सरकारी कंपनियों और बैंकों में सरकार की हिस्सेदारी बेचने का काम संभालता है. इसका पूरा नाम DIPAM (Department of Investment and Public Asset Management) है. 

क्या है 52,878 करोड़ रुपये का यह सौदा?
केंद्रीय मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने 14 अक्टूबर को IDBI बैंक की 60.72 प्रतिशत हिस्सेदारी कनाडा की फेयरफैक्स फाइनेंशियल होल्डिंग्स की एक सहायक कंपनी को बेचने को मंजूरी दे दी. सौदे की कीमत 52,878 करोड़ रुपये है, यानी 81 रुपये प्रति शेयर. इसमें सरकार अपनी 30.48 प्रतिशत और जीवन बीमा निगम (LIC) अपनी 30.24 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचेगा. बिक्री के बाद सरकार के पास सिर्फ 15 प्रतिशत और LIC के पास 19 प्रतिशत हिस्सेदारी बचेगी. सरकार इसे वित्तीय क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा विदेशी निवेश बता रही है. सौदे को अभी रिजर्व बैंक की मंजूरी चाहिए. रिजर्व बैंक देखेगा कि खरीदार बैंक चलाने के लिए योग्य है या नहीं. इस जांच को 'फिट एंड प्रॉपर' परीक्षण कहा जाता है. 

राहुल गांधी का पत्र और कांग्रेस का हमला
कांग्रेस ने अपने आधिकारिक X हैंडल पर लिखा कि ‘कांग्रेस के समय बैंक बनते थे और मोदी के समय बिकते हैं’. नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने भी अपने X पर यही बात दोहराई. उन्होंने यह भी लिखा कि मोदी सरकार में ‘पहले बोली देखी गई, फिर दाम तय हुआ’, इसके साथ ही उन्होंने कर्मचारियों के नाम 29 अक्टूबर का पत्र भी साझा किया जिसके लिए ऑल इंडिया IDBI ऑफिसर्स एसोसिएशन ने उनका आभार जताया. 

IDBI बैंक विवाद

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काँग्रेस का IDBI बैंक के कर्मचारियों को समर्थन पत्र

पत्र में राहुल ने कहा कि मार्च 2025 में कर्मचारियों का एक दल उनसे संसद भवन में मिला था और उनसे पूछा था कि सरकार मुनाफे वाला बैंक क्यों बेच रही है. राहुल के अनुसार यह सवाल उन्होंने लोकसभा में उठाया, पर सरकार ने इसका कारण नहीं बताया. उन्होंने कहा कि बैंक सात साल पहले घाटे में था और पिछले साल उसने 9,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का मुनाफा कमाया है. उनके मुताबिक अभी सरकार और LIC के पास बैंक की करीब 95 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जो बिक्री के बाद सिर्फ 34 प्रतिशत ही रह जाएगी. उन्होंने यह दावा भी किया कि 2003 में सरकार ने संसद को भरोसा दिलाया था कि वह IDBI में कम से कम 51 प्रतिशत हिस्सेदारी रखेगी. राहुल ने निजीकरण के बाद SC, ST और OBC आरक्षण खत्म होने और कर्मचारियों की सेवा-शर्तें कमजोर होने की आशंका भी जताई है. 

कर्मचारियों की चिंता और सरकार का जवाब
बैंक के कर्मचारी अपने संगठन के निजीकरण का विरोध कर रहे हैं. यूनाइटेड फोरम ऑफ IDBI ऑफिसर्स एंड एम्प्लॉईज ने 2 और 3 नवंबर को देशव्यापी भूख हड़ताल का ऐलान किया है. विनिवेश विभाग (DIPAM) के सचिव अरुणीश चावला का कहना है कि शेयर खरीद समझौते में खरीदार पक्षों ने मौजूदा कर्मचारियों की सेवा-शर्तें अपरिवर्तित रखने पर सहमति दी है. उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा पेंशनधारकों के लिए अलग पेंशन फंड बनाया गया है. 

बिजनेस वर्ल्ड की रिपोर्ट: बोली पहले खुली, मूल्यांकन बाद में हुआ
बिजनस वर्ल्ड के पत्रकार पलक शाह की 29 अक्टूबर की रिपोर्ट DIPAM के 10 पन्नों के आंतरिक नोट पर आधारित है. यह नोट विभाग के सचिव अरुणीश चावला के दस्तखत से 13 अगस्त 2026 को जारी किया गया था. रिपोर्ट के अनुसार इसे कोर ग्रुप ऑफ सेक्रेटरीज ऑन डिसइन्वेस्टमेंट (CGD) के लिए लिखा गया था जिसमे उनसे कहा गया था कि फेयरफैक्स को IDBI बैंक का खरीदार बनाया जाए. 

रिपोर्ट के मुताबिक पहले दौर की बोलियां 12 मार्च 2026 को खुलीं और दोनों बोलियां न्यूनतम कीमत यानी रिजर्व प्राइस से कम थीं. यह वह कीमत है जिससे नीचे सरकार अपने शेयर नहीं बेचेगी. यह रिजर्व प्राइस 94.42 रुपये प्रति शेयर था. बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बिजनेस वर्ल्ड ने लिखा है कि फेयरफैक्स की पहली बोली 75 रुपये की थी. 

इसके बाद 1 जून को फेयरफैक्स ने संशोधित सीलबंद बोली दी. सीलबंद बोली का मतलब है कि कीमत लिफाफे में बंद रहती है और तय दिन पर खोली जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक 13 जुलाई को CGD की पहली बैठक में यह बोली खोली गई और उसे पहले स्थान पर रखा गया. उसी दिन दूसरी बैठक में समिति ने कहा कि पुराना रिजर्व प्राइस दोबारा इस्तेमाल नहीं हो सकता और उसे नजरअंदाज किया जाए. साथ ही नए नियमों से नया मूल्यांकन कराने को कहा गया. यानी मूल्यांकन एजेंसियों से कंपनी की कीमत नए सिरे से आंकने को कहा गया था. 

रिपोर्ट के अनुसार नोट में सरकार की अपनी नियमावली का हवाला है. उसके मुताबिक रिजर्व प्राइस तय करते समय अधिकारियों को बोलीदाताओं की पेशकश की जानकारी नहीं होनी चाहिए. नोट में लिखा है कि यह तरीका शुरू में अपनाया गया था, पर बोलियां रिजर्व प्राइस से कम रहीं. बिजनेस वर्ल्ड ने इसका अर्थ यह निकाला है कि सरकार ने एक बार नियम माना और बोलियां विफल होने पर उसे छोड़ दिया. 

मूल्यांकन में तीन बदलाव
रिपोर्ट के अनुसार नया मूल्यांकन बनाते समय तीन बदलाव किए गए. पहला बदलाव शेयर बाजार भाव को लेकर है. जब IDBI का शेयर ऊंचा था, तब नोट में इसे मूल्यांकन के लिए ‘अनुपयोगी’ बताया गया और कहा गया कि भाव में करीब 100 प्रतिशत उतार-चढ़ाव आता है. पर जब भाव बोली से नीचे रहा, तो उसी नोट में कहा गया कि तीन महीने से बाजार भाव खोजी गई कीमत से कम है, इसलिए सबसे ऊंची बोली को उचित माना जा सकता है. 

दूसरा बदलाव तुलना के पैमाने का है. मूल्यांकन में किसी बैंक की कीमत आंकने के लिए उसकी तुलना दूसरे बैंकों से की जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक CGD ने कहा कि तुलना सिर्फ सरकारी बैंकों से हो, निजी बैंकों से नहीं. नोट में कारण लिखा है कि निजी बैंकों को शामिल करने से रिजर्व प्राइस जरूरत से ज्यादा आंका जाता है. रिपोर्ट यह भी याद दिलाती है कि रिजर्व बैंक IDBI को 2019 से निजी बैंक की श्रेणी में रखता है और इसे बिकने के बाद निजी मालिक चलाएगा. 

तीसरा बदलाव संपत्तियों के मूल्यांकन का है जिसके बाद बैंक का मूल्यांकन 75.99 रुपये प्रति शेयर आया. फेयरफैक्स की 81 रुपये की बोली इससे ऊपर थी और इसी आधार पर सरकार ने कहा कि बोली स्वतंत्र पैमाने से बेहतर रही. 

टैक्स मामलों की गारंटी और फेयरफैक्स की शर्त
रिपोर्ट के मुताबिक पहला दौर विफल होने के बाद सरकार ने बोलीदाताओं की एक मांग मानी. उसने IDBI के विवादित आयकर मामलों की भरपाई करने पर सहमति दी. यह वादा उन मामलों पर भी लागू है जो बैंक के खातों में दर्ज नहीं थे. 
DIPAM ने अपने जवाब में कहा है कि इस मद में संभावित देनदारी सिर्फ 627 करोड़ रुपये थी, जबकि खोजी गई बोली कीमत 3,917 करोड़ रुपये बढ़ी. बिजनेस वर्ल्ड का अपना अनुमान है कि 75 से 81 रुपये की बोली का अंतर करीब 3,900 करोड़ रुपये बैठता है.

रिपोर्ट में फेयरफैक्स की चिट्ठी का भी जिक्र है. संशोधित बोली के साथ कंपनी ने लिखा कि यह उसकी अंतिम पेशकश है. उसके अनुसार दोबारा बोली मांगे जाने या बोली और बढ़ाने की मांग पर वह प्रक्रिया से हट जाएगी. रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने इस पर कोई आपत्ति नहीं की. दूसरे बोलीदाता ने संशोधित बोली दी ही नहीं और केवल इतना कहा कि उसकी पुरानी बोली कायम है. चार पक्षों को बोली की मंजूरी मिली थी, जिनमें से दो ने बोली ही नहीं लगाई.

सरकार को पैसे की जरूरत क्यों?
रिपोर्ट के अनुसार नोट में यह भी लिखा है कि इस साल सरकार की कमाई घटी और खर्च बढ़ गया है. इसके कारण नोट में पश्चिम एशिया का संघर्ष और एलपीजी की ऊंची लागत और पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती से हुए नुकसान बताए गए हैं. नोट के अनुसार विदेशी मुद्रा भंडार घटा है और रुपया दबाव में है, इसलिए बिक्री से मिलने वाली रकम बजट के लिहाज से अहम बताई गई है. 

DIPAM का जवाब
बिजनेस वर्ल्ड ने रिपोर्ट छापने से पहले सवाल भेजे थे. DIPAM का जवाब 29 अक्टूबर को आया. उसका कहना है कि उसकी आंतरिक प्रक्रियाएं सिर्फ दिशानिर्देश हैं, कोई सख्त नियम नहीं. विभाग के अनुसार रिजर्व प्राइस न घटाया गया, न बढ़ाया गया और बोलियां मंजूर न होने के बाद पहला दौर ‘फंक्टस ऑफिशियो’ हो गया, जिसका मतलब है कि वह दौर खत्म हो चुका था और उसके नियम आगे लागू नहीं थे. 
विभाग ने यह भी कहा कि मूल्यांकन की पद्धति की समीक्षा अप्रैल में हुई थी और एजेंसियों ने मई से काम शुरू कर दिया था. उसके अनुसार प्रक्रिया ‘डबल ब्लाइंड’ रही, यानी बोलीदाता को मूल्यांकन नहीं पता था और मूल्यांकन करने वालों ने भी बोली नहीं देखी थी. सिर्फ सरकारी बैंकों से तुलना पर विभाग ने कहा कि तुलना लायक कोई सौदा उपलब्ध नहीं था और बाजार निवेशक IDBI को अब भी सरकारी इकाई की तरह ही आंकते रहे. 

रिपोर्ट के अनुसार नोट में फेयरफैक्स की उस योजना का जिक्र नहीं है जिसमें वह गो डिजिट और IIFL कैपिटल में अपनी हिस्सेदारी IDBI में लाएगी. फेयरफैक्स के चेयरमैन प्रेम वत्स ने सौदे की मंजूरी के एक दिन बाद कहा कि ये हिस्सेदारियां ‘अपने-अपने बाजार भाव’ पर आएंगी. रिपोर्ट इसी बात को सरकार के उस रुख से जोड़ती है जिसमें IDBI को उसके अपने बाजार भाव पर आंकने से इनकार किया गया. रिपोर्ट के अनुसार बोली की रकम, मूल्यांकन के आंकड़े और टैक्स गारंटी का आकार नोट में नहीं दिए गए हैं. वह पूछती है कि बोली खुलने के बाद मूल्यांकन क्यों कराया गया, KPMG और BDO की रिपोर्टें सार्वजनिक होंगी या नहीं, कितने विवादित टैक्स की जिम्मेदारी सरकार ने ली, और कैबिनेट को फेयरफैक्स की योजना की जानकारी थी या नहीं. पूर्व केंद्रीय सचिव ई.ए.एस. सरमा भी इस पूरे विनिवेश की स्वतंत्र जांच की मांग कर चुके हैं.

आगे क्या?
सौदे को अभी रिजर्व बैंक की मंजूरी और अन्य नियामकीय औपचारिकताएं पूरी करनी हैं. कर्मचारी संगठन 2 और 3 नवंबर को भूख हड़ताल करेंगे. सरकार अपने पक्ष पर कायम है कि प्रक्रिया पारदर्शी थी और 81 रुपये की बोली दोनों मूल्यांकनों से बेहतर रही.

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