उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची को लेकर अब तक विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है, लेकिन इस बार चिंता सत्ता के ही अंदर से आई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में कहा कि प्रदेश की मतदाता सूची से 1 करोड़ 27 लाख हिंदू मतदाताओं के नाम गायब हैं. केंद्र और राज्य, दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के कारण यह बयान और अहम हो जाता है, क्योंकि ‘डबल इंजन’ की सरकार चला रहे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री खुद मान रहे है कि सूची में बड़ी गड़बड़ी है. 

योगी ने गिनाए कौन से नाम छूटे
मुख्यमंत्री ने जनसंख्या के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि प्रदेश की आबादी करीब 25.70 करोड़ होने का अनुमान है. इस आधार पर 16 करोड़ से अधिक मतदाता होने चाहिए, जबकि इस समय करीब 13 करोड़ ही हैं. उन्होंने बताया कि गायब नामों में 66 लाख ऐसे लोग हैं, जिनके नाम पंचायत मतदाता सूची में हैं, लेकिन विधानसभा की सूची में नहीं. 
सरकारी योजनाओं का लाभ ले रहे करीब 55 लाख लोगों और 18-19 वर्ष आयु वर्ग के साढ़े चार लाख युवाओं के नाम भी सूची में नहीं हैं. मुख्यमंत्री के अनुसार दूसरे राज्यों से विवाह करके आईं महिलाओं के नाम भी छूटे हैं. 

28 नगरीय सीटों और 45 विधानसभा सीटों पर असर का हवाला
योगी ने कहा कि इसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है. उनके मुताबिक नगरीय निकायों की 28 सीटें इससे कमजोर हो रही हैं और पिछले चुनाव में 45 विधानसभा सीटों पर जीत-हार का अंतर बहुत कम रहा था, इसलिए सतर्कता जरूरी है. उन्होंने पिछले विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान में केवल चार लाख मतदाताओं की वृद्धि को भी चिंताजनक बताया.

कार्यकर्ताओं को 'कमल साथी' ऐप से अभियान चलाने के निर्देश 
मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वो BLO की मदद से पात्र मतदाताओं के नाम जुड़वाएं. इसके लिए उन्होंने ‘कमल साथी’ ऐप पर उपलब्ध जानकारी के आधार पर अभियान चलाने को कहा. सांसद, विधायक, विधानसभा प्रभारी और जिला प्रभारी इसकी नियमित समीक्षा करेंगे और नाम जुड़वाना संगठन की जिम्मेदारी होगी. इसी बैठक में उन्होंने करीब 1.63 लाख बूथों को सोशल मीडिया पर सक्रिय करने और विपक्ष के नकारात्मक नैरेटिव का बूथ स्तर पर जवाब देने के निर्देश भी दिए.

NDA नेताओं ने पहले भी उठाए थे सवाल  
मतदाताओं के नाम काटने की चिंता सिर्फ भाजपा तक ही सीमित नहीं है. NDA के सहयोगी दलों के नेता भी चुनाव प्रक्रिया पर पहले कई बार सवाल उठा चुके हैं.
जुलाई 2025 में बिहार में SIR के दौरान ही JDU सांसद गिरिधारी यादव ने इसे जबरन थोपी गई प्रक्रिया बताते हुए कहा था कि दस्तावेज जुटाने के लिए कम से कम छह महीने का समय मिलना चाहिए था. इसके साथ ही JDU विधायक संजीव कुमार ने आशंका जताई कि दूसरे राज्यों में काम करने वाले बिहार के प्रवासी मजदूरों के नाम कट सकते हैं.
और तो और चिराग पासवान ने चुनाव आयोग को उठ रहे सवालों पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने का भी सुझाव दिया था. 

चुनाव आयोग के आंकड़े क्या कहते हैं?
चुनाव आयोग के आंकड़े इस बहस की पृष्ठभूमि बताते हैं. SIR से पहले यूपी में करीब 15.44 करोड़ मतदाता दर्ज थे. 6 जनवरी को जारी ड्राफ्ट सूची में यह संख्या घटकर 12.55 करोड़ रह गई. 10 अप्रैल को जारी अंतिम सूची में 13 करोड़ 39 लाख 84 हजार 792 मतदाता दर्ज हुए, यानी 2.04 करोड़ से ज्यादा नाम हटे. न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार ड्राफ्ट के बाद 84 लाख से अधिक नाम जुड़े भी है. 
मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिणवा ने कहा था कि किसी का नाम बिना उचित प्रक्रिया के नहीं हटाया गया और जिनके नाम छूटे हैं, वे फॉर्म-6 भरकर दोबारा आवेदन कर सकते हैं. 

आंकड़ों के स्रोत पर सवाल
मुख्यमंत्री ने जो आंकड़े रखे, उनका स्रोत और गिनती की प्रक्रिया सार्वजनिक नहीं की गई है. ‘हिंदू’ मतदाताओं की संख्या कैसे निकाली गई, यह भी स्पष्ट नहीं है, क्योंकि मतदाता सूची में धर्म का कोई कॉलम नहीं होता और आयोग ने हटाए गए नामों का धर्म-वार ब्योरा जारी नहीं किया है.

'कमल साथी' ऐप को लेकर आलोचकों का दावा
इस बीच कमल साथी ऐप का नाम सार्वजनिक मंच से लिए जाने पर सियासी गलियारों में चर्चा तेज है. आलोचकों का दावा है कि यह ऐप मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी (OSD) संजीव सिंह की पहल पर बना था और इसके जरिए यूपी के भाजपा विधायकों का चुनावी डाटा एक अलग तंत्र में जुटाया गया. उनके अनुसार जब यह जानकारी सार्वजनिक हुई थी, तब पार्टी ने इससे दूरी बनाई थी और यूपी भाजपा के मुख्य प्रवक्ता दिनेश प्रताप सिंह ने एबीपी न्यूज से कहा था कि यह पार्टी या संगठन का ऐप नहीं है. दावा यह भी है कि ऐप को कुछ दिनों के लिए निष्क्रिय किया गया था. आलोचक इसे भाजपा के अपने ‘सरल’ जैसे ऐप, AI-Calling और चैटबॉट के समानांतर चुनावी तंत्र के रूप में देखते हैं, जिसकी कमान सीधे मुख्यमंत्री के पास रहेगी. पार्टी की ओर से इन दावों पर अब तक कोई ताजा स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है.

2027 से पहले बड़ा सवाल
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सवाल यही रहेगा कि जिन नामों के कटने की बात कही जा रही है, उनकी वास्तविक संख्या और कारण क्या हैं, और क्या जवाबदेही सिर्फ कार्यकर्ताओं के अभियान पर छोड़ी जा सकती है, या आयोग को भी स्थिति स्पष्ट करनी होगी.

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