आने वाले वर्षों में लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, ग्रेफाइट और दुर्लभ मृदा तत्व (Rare Earth Elements) भारत की आर्थिक और रणनीतिक ताकत के लिए बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं. इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, मोबाइल, सेमीकंडक्टर, रक्षा उपकरण और अक्षय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों की बढ़ती जरूरतों के बीच इन खनिजों की मांग लगातार बढ़ रही है.
ऐसे में भारत अब केवल देश के भीतर खनिज खोजने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि विदेशों में भी महत्वपूर्ण खनिजों की संपत्तियां हासिल करने की तैयारी तेज कर रहा है.
केंद्रीय कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने नई दिल्ली में आयोजित सीआईआई ग्लोबल समिट में कहा कि भारत के निजी क्षेत्र द्वारा विदेशों में महत्वपूर्ण खनिजों की संपत्तियां हासिल करना अब समय की मांग है. उनका कहना है कि इससे देश की आयात पर निर्भरता कम करने और आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिलेगी.
सिर्फ सरकारी कंपनियों के भरोसे नहीं रह सकता भारत
भारत में महत्वपूर्ण खनिजों की खोज और विदेशों में खनिज संपत्तियां हासिल करने में अब तक सरकारी कंपनियों की प्रमुख भूमिका रही है. लेकिन आने वाले समय में खनिजों की बढ़ती जरूरत को देखते हुए सरकार निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाना चाहती है.
किशन रेड्डी के अनुसार, भारतीय निजी कंपनियों को खनिज-संपन्न देशों में खनन, जमीन अधिग्रहण और खनिज प्रसंस्करण से जुड़े अवसर तलाशने चाहिए. इस काम में भारत के दूतावास और संबंधित देशों के साथ सरकारी स्तर पर सहयोग भी उपलब्ध कराया जा सकता है.
इसका उद्देश्य केवल विदेशों से खनिज खरीदना नहीं है. भारत ऐसी व्यवस्था बनाना चाहता है, जिसमें खनिज की खदान से लेकर उसके प्रसंस्करण और तैयार उत्पाद के निर्माण तक पूरी आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित हो.
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लिथियम पर भारत की खास नजर
इन महत्वपूर्ण खनिजों में लिथियम भारत के लिए सबसे अहम है. इलेक्ट्रिक वाहनों और ऊर्जा भंडारण के लिए इस्तेमाल होने वाली बैटरियों में लिथियम प्रमुख कच्चा माल है. भारत में इसकी उपलब्धता सीमित होने के कारण देश को लंबे समय तक आयात पर निर्भर रहना पड़ सकता है. सरकार विदेशों में लिथियम के संसाधन हासिल करने पर जोर दे रही है.
भारत ने अर्जेंटीना में पांच लिथियम ब्लॉक हासिल किए हैं, जहां खनिज की खोज का काम जारी है. इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया और चिली जैसे खनिज-संपन्न देशों के साथ भी बातचीत चल रही है. अगर भारत विदेशों में पर्याप्त लिथियम संसाधन सुरक्षित करने में सफल रहता है, तो इससे भविष्य में देश के इलेक्ट्रिक वाहन और बैटरी उद्योग को कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है.
ई-कचरे से भी निकलेगा कीमती खनिज
सरकार का जोर केवल नई खदानों पर नहीं है. पुराने इलेक्ट्रॉनिक सामान और बैटरियों को दोबारा उपयोग में लाकर महत्वपूर्ण खनिज निकालने की योजना भी बनाई जा रही है. इसे 'अर्बन माइनिंग' कहा जाता है. यानी शहरों में जमा ई-कचरे को ही खनिजों का एक नया स्रोत बनाया जाए.
राष्ट्रीय महत्वपूर्ण खनिज मिशन के तहत सरकार ने पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के लिए ₹36,000 करोड़ की प्रोत्साहन योजना शुरू की है. इसका उद्देश्य पुनर्चक्रण के माध्यम से देश की जरूरत का लगभग 25 से 30 प्रतिशत महत्वपूर्ण खनिज हासिल करने की क्षमता विकसित करना है.
शुरुआती ₹1,500 करोड़ के आवंटन चरण में 125 आवेदकों में से 58 पुनर्चक्रण संस्थाओं को छांटा गया है. इससे भारत में ई-कचरे से लिथियम, कोबाल्ट, निकेल और अन्य उपयोगी खनिज निकालने का कारोबार तेजी से बढ़ सकता है.
चार राज्यों में बनेंगे खनिज प्रसंस्करण संयंत्र
विदेशों से खनिज हासिल करना सिर्फ पहला कदम है। बड़ी चुनौती इन खनिजों का प्रसंस्करण और शुद्धीकरण है. इसीलिए सरकार आयात किए गए, देश में निकाले गए और पुनर्चक्रण से प्राप्त कच्चे माल को प्रसंस्कृत करने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में चार खनिज प्रसंस्करण संयंत्र स्थापित कर रही है. इन संयंत्रों के जरिए भारत कच्चे खनिजों को अधिक उपयोगी और मूल्यवान सामग्री में बदलने की अपनी क्षमता बढ़ाना चाहता है.
चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश
महत्वपूर्ण खनिजों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में चीन की मजबूत स्थिति भारत के लिए बड़ी चुनौती है. खासकर दुर्लभ मृदा तत्वों के प्रसंस्करण और शोधन में चीन की भूमिका काफी बड़ी है. ऐसे में भारत के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति केवल औद्योगिक जरूरत नहीं, बल्कि रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी बन गई है.
भारत की मौजूदा रणनीति तीन स्तरों पर काम करती दिखाई दे रही है -देश में खनिजों की खोज, विदेशों में खनिज संपत्तियों का अधिग्रहण और पुराने उत्पादों से खनिजों का पुनर्चक्रण. इसके साथ प्रसंस्करण संयंत्रों की क्षमता बढ़ाकर भारत अपनी निर्भरता को और कम करना चाहता है.
इलेक्ट्रिक वाहन से रक्षा उद्योग तक पड़ेगा असर
महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति का सीधा असर भारत के कई तेजी से बढ़ते उद्योगों पर पड़ेगा. इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी निर्माण, मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, रक्षा और विमानन उद्योग इन खनिजों पर काफी हद तक निर्भर हैं. अगर भारत इन खनिजों की आपूर्ति श्रृंखला सुरक्षित कर लेता है, तो घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा मिलने के साथ इन क्षेत्रों में विदेशी निर्भरता भी घट सकती है.
'खदान से कारखाने तक' पूरी श्रृंखला बनाने की तैयारी
किशन रेड्डी का निजी क्षेत्र को विदेशों में महत्वपूर्ण खनिज संपत्तियां हासिल करने का संदेश इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा है।.भारत अब केवल खनिज आयात करने वाला देश नहीं रहना चाहता. लक्ष्य है कि विदेशों और भारत में खनिज संसाधन हासिल किए जाएं, उनका देश में प्रसंस्करण हो, पुनर्चक्रण को बढ़ावा मिले और अंत में इन्हीं कच्चे माल से भारत में उच्च मूल्य वाले उत्पाद तैयार किए जाएं.
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