नई दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नेता आशुतोष रांका और सौरव दास की न्यायिक हिरासत के मामले में नया अपडेट आया है. दिल्ली हाई कोर्ट दोनों की याचिका पर 21 अक्टूबर को तत्काल सुनवाई के लिए तैयार हो गया है. याचिका में स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) रितु राज की अदालत के उस आदेश को चुनौती दी गई है, जिसमें 19 अक्टूबर को दोनों की हिरासत दो दिन और बढ़ा दी गई थी.
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की कोशिश के दौरान हिरासत में लिए गए दोनों नेताओं के वकीलों ने मामले का ज़िक्र तत्काल सुनवाई के लिए हाई कोर्ट में किया, जिसके बाद अदालत ने इसे 21 अक्टूबर को सूचीबद्ध करने की अनुमति दे दी. दोनों की मौजूदा हिरासत भी आज ही समाप्त हो रही है और उन्हें एसईएम अदालत में पेश किया जाएगा. सीजेपी की लीगल हेड रत्ना सिंह ने ‘X’ पर लिखा था कि पार्टी मामले की जल्द सुनवाई की मांग करेगी.
अदालत ने हिरासत बढ़ाने के दो मुख्य कारण बताए. पहला कारण दोनों का पिछला आचरण, क़ानून के प्रति अनादर और शांति भंग होने की गंभीर आशंका है. दूसरा कारण यह है कि उनकी ओर से पेश किए गए ज़मानती अदालत को योग्य नहीं लगे. सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को शनिवार को SEM अदालत से रिहाई मिल चुकी है. उन्हें 16 अक्टूबर को कनॉट प्लेस में 'लहरा दो तिरंगा' प्रदर्शन से ठीक पहले उस जगह से हिरासत में लिया गया था, जहाँ वे ठहरे हुए थे.
10 अक्टूबर की कार्रवाई और पीस बॉन्ड
मामले की शुरुआत 10 अक्टूबर को हुई. दिल्ली पुलिस का कहना है कि सीजेपी नेताओं ने बिना अनुमति के सोशल मीडिया पर प्रदर्शन का आह्वान किया था. पुलिस के मुताबिक़ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से क़ानून-व्यवस्था बिगड़ सकती थी, इसलिए दीपके, रांका और दास को उसी दिन दिल्ली एयरपोर्ट से हिरासत में ले लिया गया.
अगले दिन यानी 11 अक्टूबर को तीनों को SEM अदालत में पेश किया गया. वहाँ उन्होंने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 136 के तहत 50,000 रुपये का निजी मुचलका और ज़मानती बॉन्ड भरा. इसमें उन्होंने एक साल तक शांति बनाए रखने का वादा किया. इसी वादे के आधार पर उन्हें रिहा कर दिया गया.
क़ानूनी भाषा में इसे 'पीस बॉन्ड' कहा जाता है. यह एक लिखित वादा होता है, जिसमें व्यक्ति तय समय तक शांति बनाए रखने और ऐसा कोई काम न करने की सहमति देता है जिससे क़ानून-व्यवस्था बिगड़े.
बॉन्ड के उल्लंघन का आरोप
पुलिस का दावा है कि रिहा होते ही इन नेताओं ने दोबारा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए लोगों को बुलाना शुरू कर दिया. मामले के शिकायतकर्ता सब-इंस्पेक्टर मोहित भाटी ने अदालत को बताया कि 13 अक्तूबर की सुबह रांका और दास जेडीयू कार्यालय के परिसर से कूदकर जंतर-मंतर पहुँचे और वहाँ नारेबाज़ी करने लगे.
14 अक्टूबर को SEM महेश कुमार मीना ने पहला रिमांड आदेश दिया. इसमें दोनों को 'अड़ियल और आक्रामक' बताया गया और कहा गया कि उनमें ‘कोई पछतावा नहीं दिख रहा है’. आदेश के अनुसार दोनों का पिछला आचरण दिखाता है कि वे अधिकारियों के वैध निर्देशों का पालन नहीं करते और आम लोगों को अवैध प्रदर्शन के लिए उकसाने पर अड़े हैं. इन टिप्पणियों और शांति भंग होने की आशंका के आधार पर अदालत ने BNSS की धारा 130 के तहत नोटिस जारी किया और दोनों को पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया.
19 अक्तूबर का आदेश
19 अक्टूबर को दोनों को दोबारा अदालत में पेश किया गया. SEM रितु राज ने अपने आदेश में कहा कि दोनों ने ‘जानबूझकर बॉन्ड का उल्लंघन किया है और शांति भंग की है’. अदालत ने यह भी कहा कि उनके व्यवहार से लगता है कि ‘उनके मन में क़ानून के प्रति कोई सम्मान नहीं है’. अदालत के मुताबिक़ प्रतिबंध हटाए जा चुके इलाक़ों में भी प्रदर्शन का आह्वान करके दोनों ने यही प्रवृत्ति दोहराई है, इसलिए उनके शांति बनाए रखने के आश्वासन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.
जाँच अधिकारी ने अदालत को यह भी बताया कि उन्हें एक अज्ञात व्हाट्सएप मैसेज मिला है, जिससे संकेत मिलता है कि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का ख़तरा अब भी बना हुआ है.
हिरासत बढ़ाने का एक और बड़ा कारण बचाव पक्ष के नए ज़मानतियों का ख़ारिज होना रहा. आदेश के मुताबिक़ एक ज़मानती के बॉन्ड और आधार कार्ड की तस्वीरों में साफ़ अंतर था. एक अन्य ज़मानती दास के माता-पिता का नाम और पता जैसी बुनियादी जानकारी भी नहीं बता सकीं. अदालत ने कहा कि इन ज़मानतियों का अभियुक्तों पर कोई नियंत्रण नहीं है.
क़ानूनी विशेषज्ञ की राय
सुप्रीम कोर्ट के वकील निपुण सक्सेना के अनुसार यह पूरी प्रक्रिया BNSS के अध्याय 9 में दी गई निवारक शक्तियों का हिस्सा है. उन्होंने कहा कि धारा 126 से 143 के तहत एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका पर किसी से बॉन्ड भरवा सकता है. जब कोई इस बॉन्ड का उल्लंघन करता है, तो मजिस्ट्रेट धारा 130 के तहत जाँच शुरू करता है.
ज़मानतियों के ख़ारिज होने पर सक्सेना ने कहा कि धारा 140 मजिस्ट्रेट को यह जाँचने का अधिकार देती है कि ज़मानती योग्य है या नहीं. उनके मुताबिक़ ज़मानती वह व्यक्ति होता है जो अभियुक्त को अदालत में पेश करने के लिए ज़िम्मेदार होता है. अगर वह अभियुक्त की बुनियादी जानकारी ही नहीं दे पाता, तो मजिस्ट्रेट उसे ख़ारिज कर सकता है.
सक्सेना ने बताया कि सैद्धांतिक रूप से इन निवारक धाराओं में किसी व्यक्ति को अधिकतम छह महीने तक हिरासत में रखा जा सकता है. हालाँकि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फ़ैसलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सिर्फ़ ज़मानती न दे पाने को लंबी हिरासत का आधार नहीं बनाया जाना चाहिए.
दीपके को रिहाई मिलने और रांका-दास की हिरासत जारी रहने के सवाल पर सक्सेना ने कहा कि बीएनएसएस में मजिस्ट्रेट के पास यह अधिकार है कि वह निजी मुचलका भरवाए या ज़मानती मांगे. उनके मुताबिक़ संभवतः दीपके से नया निजी मुचलका भरवाकर उन्हें छोड़ा गया, जबकि रांका और दास के मामले में अदालत ने ज़मानती मांगे.
बचाव पक्ष की दलीलें
सीजेपी नेताओं के वकील अभिष्ट हेला ने इस प्रक्रिया में हितों के टकराव का सवाल उठाया है. उनका कहना है कि पुलिस अधिकारी ही शिकायतकर्ता हैं, वही दोनों को हिरासत में लेते हैं और फिर उसी एसईएम अदालत में पेश करते हैं, जिसे ख़ुद एसीपी रैंक का पुलिस अधिकारी चलाता है.
पीस बॉन्ड के उल्लंघन के दावे पर हेला ने कहा कि अपने मौलिक अधिकारों का इस्तेमाल करना बॉन्ड का उल्लंघन नहीं है. उनके मुताबिक़ उल्लंघन तब माना जाता है जब सार्वजनिक शांति को ख़तरा हो, जबकि जंतर-मंतर पर उस समय आम जनता मौजूद ही नहीं थी.
हेला ने दोहरे मापदंड का भी आरोप लगाया. उनके अनुसार दीपके के मामले में ज़मानतियों का इस तरह सत्यापन नहीं हुआ, जबकि दास और रांका की ओर से पेश किए गए आठ ज़मानतियों से कड़ी पूछताछ करके उन्हें ख़ारिज कर दिया गया.
-ममता सिंह
"नई दिल्ली में 'कॉकरोच जनता पार्टी' के नेता आशुतोष रांका और सौरव दास की न्यायिक हिरासत के मामले में नया अपडेट आया है. दिल्ली हाई कोर्ट दोनों …"













