अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और शिपिंग लागत में भारी बढ़ोतरी से भारत की सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के मुनाफे पर दबाव बढ़ गया है. ब्रोकरेज फर्म Jefferies की रिपोर्ट Energy Market Letter: Volume XXII के अनुसार, मौजूदा लागत के आधार पर तेल कंपनियों को पेट्रोल की बिक्री पर करीब ₹26 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹30 प्रति लीटर तक मार्केटिंग नुकसान होने का अनुमान है.

रिपोर्ट में भारतीय कच्चे तेल की बास्केट की कीमत लगभग 125 डॉलर प्रति बैरल बताई गई है. कच्चे तेल की महंगी खरीद और बढ़ती परिवहन लागत के कारण तेल कंपनियों के लिए पेट्रोल-डीजल की बिक्री से लागत की भरपाई करना मुश्किल हो रहा है.

पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर कितना नुकसान?

Jefferies के अनुमान के मुताबिक, 15 दिनों के औसत मूल्य निर्धारण चक्र के आधार पर पेट्रोल पर लगभग ₹26 प्रति लीटर और डीजल पर लगभग ₹30 प्रति लीटर का मार्केटिंग नुकसान हो रहा है.

मार्केटिंग मार्जिन का संबंध मुख्य रूप से ईंधन की बिक्री से मिलने वाली कीमत और उसे खरीदने या तैयार करने तथा बाजार तक पहुंचाने की लागत के बीच के अंतर से है. जब लागत बढ़ती है और खुदरा कीमतों में उसी अनुपात में बदलाव नहीं होता, तो कंपनियों का मार्जिन घट जाता है.

पश्चिम एशिया के तनाव से बढ़ा शिपिंग खर्च

कच्चे तेल की कीमतों के साथ-साथ समुद्री परिवहन की लागत भी तेल कंपनियों के लिए चुनौती बन रही है. रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच फ्रेट रेट में एक सप्ताह के दौरान लगभग 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. संघर्ष की शुरुआत के मुकाबले शिपिंग दरें करीब आठ गुना तक पहुंचने का अनुमान भी रिपोर्ट में दिया गया है.

समुद्री परिवहन महंगा होने से आयातित कच्चे तेल की कुल लागत बढ़ सकती है. इसका असर उन कंपनियों पर अधिक पड़ सकता है जो बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करती हैं और जिनके पास बढ़ी हुई लागत को तत्काल उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की सीमित गुंजाइश है.

IOCL, BPCL और HPCL पर क्या होगा असर?

भारत की प्रमुख सरकारी तेल विपणन कंपनियों में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन (IOCL), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (HPCL) शामिल हैं.

यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं और खुदरा ईंधन कीमतों में पर्याप्त बदलाव नहीं होता, तो इन कंपनियों के विपणन मार्जिन और नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ सकता है. हालांकि, तीनों कंपनियों पर असर एक जैसा होना जरूरी नहीं है. उनकी रिफाइनिंग क्षमता, कच्चे तेल की खरीद, उत्पाद मिश्रण और अन्य परिचालन परिस्थितियां भी परिणामों को प्रभावित करती हैं.

क्या पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं?

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से ईंधन की घरेलू कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है, लेकिन खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी अपने आप तय नहीं होती. कीमतों पर सरकारी कर, बाजार की परिस्थितियां, तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति और नीतिगत फैसलों का भी प्रभाव पड़ता है.

यदि लागत का दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो सरकार के सामने करों में बदलाव, तेल कंपनियों को राहत देने या अन्य नीतिगत विकल्पों पर विचार करने की स्थिति बन सकती है. हालांकि, किसी विशेष कदम की घोषणा या लागू होने की पुष्टि के बिना ऐसे उपायों को संभावित विकल्प के रूप में ही देखा जाना चाहिए.

 

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