मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में जिला और सत्र अदालत ने मुस्कान और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाई है. 14 अक्टूबर को जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश हुए दोनों दोषियों को यह सजा सुनाई. मार्च 2025 में सामने आए इस मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था. लेकिन क्या अदालत से मौत की सजा मिलते ही दोनों को फांसी दे दी जाएगी? ऐसा नहीं है. अभी हाईकोर्ट में सुनवाई से लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपील और दया याचिका तक के कानूनी रास्ते बाकी हैं. वहीं, मुस्कान की बेटी के भविष्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.
क्या था मेरठ का नीला ड्रम हत्याकांड?
सौरभ राजपूत मर्चेंट नेवी में काम कर चुके थे और लंदन से भारत लौटे थे. पुलिस के मुताबिक, 3 मार्च 2025 को मेरठ में उनकी हत्या कर दी गई थी. इस मामले में मुस्कान और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला पर हत्या का आरोप लगा था. पुलिस जांच में दोनों की भूमिका सामने आने के बाद 19 मार्च 2025 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.
जांच के दौरान सामने आया कि हत्या के बाद सौरभ के शव के टुकड़े करके उन्हें एक नीले ड्रम में रखा गया था. ड्रम को सीमेंट से बंद कर दिया गया था. इस घटना के सामने आने के बाद पूरे देश में मामले की चर्चा हुई.
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने गवाहों और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर अपना पक्ष रखा. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मुकदमे में 22 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और 126 बार सुनवाई हुई. 30 सितंबर 2026 को अदालत ने मुस्कान और साहिल को हत्या समेत संबंधित अपराधों में दोषी करार दिया था. इसके बाद सजा तय करने के लिए अलग से सुनवाई हुई और 14 अक्टूबर को दोनों को मौत की सजा सुनाई गई.
क्या अब सीधे दी जाएगी फांसी?
अदालत से मौत की सजा मिलने का मतलब यह नहीं है कि दोषियों को तुरंत फांसी दे दी जाएगी. भारतीय कानून में मृत्युदंड के मामलों में आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी करना जरूरी होता है.
हाईकोर्ट में होगी मौत की सजा की पुष्टि: जिला एवं सत्र अदालत से मिली मौत की सजा को लागू करने से पहले हाईकोर्ट की पुष्टि जरूरी है. हाईकोर्ट मामले के साक्ष्यों और फैसले की समीक्षा करेगा. वह सजा की पुष्टि कर सकता है, उसे कम कर सकता है या कानून के मुताबिक दूसरा फैसला दे सकता है.
सुप्रीम कोर्ट में अपील का विकल्प: अगर हाईकोर्ट भी मौत की सजा की पुष्टि करता है, तो मुस्कान और साहिल सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं. इसके अलावा, परिस्थितियों के मुताबिक समीक्षा याचिका जैसे कानूनी विकल्प भी उपलब्ध हो सकते हैं.
राष्ट्रपति और राज्यपाल के पास दया याचिका: न्यायिक प्रक्रिया के बाद भी दोषियों के पास संवैधानिक दया याचिका का विकल्प हो सकता है. संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति और अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को दया याचिका दी जा सकती है. इसके जरिए सजा कम करने या माफ करने समेत राहत की मांग की जा सकती है.
इसलिए अभी यह कहना संभव नहीं है कि मुस्कान और साहिल को फांसी कब दी जाएगी. इसके लिए अदालतों में लंबित कानूनी प्रक्रिया और उपलब्ध विकल्पों का नतीजा सामने आना जरूरी है.
मुस्कान की बेटी का क्या होगा?
इस मामले में मुस्कान की बेटी के भविष्य को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सजा सुनाए जाने से पहले मुस्कान ने अपनी बेटी से मिलने की इच्छा जताई थी. हालांकि, बच्ची की मौजूदा स्थिति और उसकी देखभाल को लेकर आधिकारिक जानकारी की पुष्टि जरूरी है.
कानून के मुताबिक, मां को सजा मिलने से बच्चे की अभिरक्षा अपने आप तय नहीं हो जाती. बच्ची की देखभाल किसके जिम्मे होगी, इसका फैसला उसकी सुरक्षा और सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखकर किया जाता है. परिवार का कोई उपयुक्त सदस्य उसकी देखभाल कर सकता है. जरूरत पड़ने पर संबंधित बाल कल्याण प्राधिकरण भी मामले में हस्तक्षेप कर सकता है.
फिलहाल, बच्ची की मौजूदा अभिरक्षा और आगे की व्यवस्था को लेकर किसी आधिकारिक आदेश की पुष्टि के बिना निश्चित तौर पर कुछ कहना सही नहीं होगा.
आगे क्या होगा?
सौरभ राजपूत हत्याकांड में जिला अदालत ने मुस्कान और साहिल को मौत की सजा सुना दी है. हालांकि, यह कानूनी प्रक्रिया का अंतिम पड़ाव नहीं है. अब हाईकोर्ट में मौत की सजा की पुष्टि और उसके बाद उपलब्ध न्यायिक विकल्पों पर आगे की स्थिति निर्भर करेगी. ऐसे में इस मामले में अगला बड़ा घटनाक्रम हाईकोर्ट की कार्यवाही और दोषियों की ओर से उठाए जाने वाले कानूनी कदम होंगे.
"मेरठ के चर्चित सौरभ राजपूत हत्याकांड में जिला और सत्र अदालत ने मुस्कान और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाई है. 14 अक्टूबर को जिला जज अरविंद …"













