अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में गुरुवार, 5 नवंबर को आठ साल बाद छात्र संघ चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे. आठ साल में पहली बार हो रहे इस चुनाव का इंतज़ार कैंपस की एक पूरी पीढ़ी कर रही थी. लेकिन जिन छात्राओं के सहयोग से यह चुनाव बहाल हुआ बताया जा रहा है, उसी Women’s College की करीब 4,000 छात्राओं को इसमें वोट डालने का अधिकार नहीं मिला है.
छात्राओं का कहना है कि यह gender inequality और unequal representation का मामला है. उनके मुताबिक चुनाव की बहाली की लड़ाई में महिलाएं बराबरी से शामिल रहीं, लेकिन जब फ़ैसले का समय आया, तो उनकी आवाज़ को मतदाता सूची से बाहर रखा गया. यूनिवर्सिटी के भीतर यह सवाल अब ज़ोर पकड़ रहा है कि जो छात्राएं आंदोलन का हिस्सा बनीं, उन्हें नतीजे तय करने का हक़ क्यों नहीं दिया गया.
दो छात्र संघ, दो अलग चुनाव: विवाद की जड़
इस विवाद की जड़ AMU की दोहरी व्यवस्था में है. AMU में दो समानांतर ढांचे हैं. मुख्य प्रतिनिधि संस्था AMU Students’ Union है, जबकि Women’s College में वहां पढ़ने वाली स्नातक छात्राओं का अपना अलग छात्र संघ है. इस अलग संघ के लिए चुनाव अलग से होता है. 9 अक्टूबर की अधिसूचना में Women’s College की प्रोफ़ेसर नाज़िया हसन को 2026-27 सत्र के लिए कॉलेज के अंडरग्रेजुएट छात्र संघ चुनाव का मुख्य चुनाव अधिकारी बनाया गया. यानी Women’s College की छात्राएं अपने संघ के लिए वोट डालेंगी, पर मुख्य AMU छात्र संघ के चुनाव में उनकी भागीदारी नहीं होगी.
छात्राओं और उनके समर्थकों का तर्क है कि अलग संघ होना बराबरी का विकल्प नहीं है. एक छात्रा ने The Quint में लिखे अपने लेख में कहा है कि Women’s College छात्र संघ अपने मुद्दे कॉलेज के भीतर उठा सकता है, पर उसकी भूमिका उसी दायरे तक सीमित है. उनका यह भी कहना है कि केंद्रीय संघ के ढांचे में अलग-अलग फ़ैकल्टी के निर्वाचित प्रतिनिधियों और Executive Council के नामांकनों के लिए अतिरिक्त सीटें हैं, जबकि Women’s College छात्र संघ की अध्यक्ष के लिए ऐसी कोई बराबर की सीट नहीं है. उनके मुताबिक यह संस्थागत ढांचे में महिला छात्राओं की कमज़ोर स्थिति को दिखाता है.
पहली महिला कुलपति के कार्यकाल में उठा सवाल
मामले को और संवेदनशील बनाने वाली बात यह है कि यह सब AMU की पहली महिला कुलपति के कार्यकाल में हो रहा है, जो कुलपति बनने से पहले Women’s College की प्रिंसिपल थीं. छात्राओं का सवाल है कि क्या यह ऐतिहासिक नियुक्ति महिला छात्राओं की स्थिति में कोई बदलाव ला पाएगी. छात्राओं की मांग यह नहीं है कि Women’s College का अपना छात्र संघ खत्म किया जाए. वे चाहती हैं कि अपने संघ के साथ-साथ उन्हें मुख्य संघ के चुनाव में भी वोट डालने का अधिकार मिले.
चुनाव बहाली की प्रक्रिया भी आसान नहीं रही. AMU ने विरोध प्रदर्शनों के बाद 5 नवंबर की तारीख तय की. ऐसे में आठ साल के इंतज़ार के बाद हो रहे इस चुनाव की सबसे बड़ी बहस अब यही है कि इसमें किसकी आवाज़ गिनी जाएगी और किसकी नहीं. गुरुवार को वोट तो पड़ेंगे, लेकिन Women’s College की हज़ारों छात्राओं के लिए यह सवाल बना रहेगा कि प्रतिनिधित्व की इस बहस में उन्हें बराबरी का दर्जा कब मिलेगा.
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