चंडीगढ़: पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) ने बड़ी जीत हासिल की है. अध्यक्ष पद पर ABVP के अंकित बिधान की जीत ऐसे समय हुई है, जब पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं.
ऐसे में कैंपस की यह जीत भाजपा और संघ परिवार के लिए पंजाब के युवाओं के बीच अपनी पकड़ के लिहाज से अहम मानी जा रही है.
हाल के महीनों में युवाओं के बीच बेरोजगारी, शिक्षा व्यवस्था, परीक्षाओं और पेपर लीक जैसे मुद्दों को लेकर नाराजगी देखने को मिली है. ऐसे माहौल में पंजाब यूनिवर्सिटी जैसे अहम कैंपस में ABVP की जीत को संगठन के लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत माना जा रहा है.
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पंजाब यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव के आँकड़े
इस बार पंजाब यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष पद के लिए चार उम्मीदवार मैदान में थे. ABVP के अंकित बिधान के अलावा NSUI के गुरमान सिंह सिद्धू, AAP समर्थित ASAP के आदिल बरार और SATH के दर्शप्रीत सिंह चुनाव लड़ रहे थे.
मतगणना के दौरान बिधान ने लगातार बढ़त बनाए रखी. एक चरण में उन्हें 2,879 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी आदिल बरार को 2,323 और NSUI के गुरमान सिंह सिद्धू को 2,034 वोट मिले थे.
बिधान हरियाणा के रहने वाले हैं और पंजाब यूनिवर्सिटी में शोधार्थी हैं. ABVP ने उन्हें छात्र हितों और संगठनात्मक गतिविधियों में सक्रिय चेहरे के तौर पर अध्यक्ष पद के लिए उतारा था.
पंजाब यूनिवर्सिटी में दूसरी बार ABVP का दबदबा
पंजाब यूनिवर्सिटी की छात्र राजनीति में ABVP का प्रभाव पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा है. संगठन ने इससे पहले भी अध्यक्ष पद हासिल किया था. इस बार लगातार दूसरी बार शीर्ष पद पर कब्जा संगठन के लिए खास तौर पर अहम माना जा रहा है.
ऐतिहासिक रूप से कैंपस में NSUI और दूसरे क्षेत्रीय छात्र संगठनों की मजबूत मौजूदगी रही है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में ABVP ने संगठनात्मक स्तर पर अपना आधार मजबूत किया है.
ABVP की रणनीति केवल चुनाव के समय सक्रिय होने की बजाय पूरे साल कैंपस में छात्र मुद्दों से जुड़े रहने पर केंद्रित रही है. संगठन से जुड़े नेताओं का दावा है कि छात्र हित, साफ छवि और लगातार कैंपस गतिविधियों को प्राथमिकता देने से उन्हें छात्रों के बीच समर्थन मिला.
SOI के साथ गठबंधन ने बदला चुनावी समीकरण
इस चुनाव में ABVP को अकाली दल के छात्र संगठन SOI का समर्थन भी मिला. SOI ने अध्यक्ष पद पर अपना उम्मीदवार नहीं उतारा और ABVP के अंकित बिधान को समर्थन दिया. दोनों संगठनों का यह साथ पंजाब की छात्र राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
इस गठजोड़ ने चुनावी समीकरण को प्रभावित किया और ABVP के पक्ष में वोटों के एकीकरण की संभावना मजबूत हुई. पंजाब में अगले विधानसभा चुनाव से पहले छात्र राजनीति में बना यह समीकरण इसलिए भी चर्चा में है कि कैंपस के राजनीतिक गठबंधन कई बार राज्य की व्यापक राजनीतिक दिशा के संकेत भी देते हैं.
क्या युवाओं की नाराजगी का नैरेटिव बदला?
हाल के छात्र आंदोलनों को लेकर एक नैरेटिव बना था कि युवा मतदाताओं और छात्रों के बीच भाजपा और संघ परिवार को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। खासकर परीक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर छात्रों की नाराजगी ने इस बहस को और हवा दी.
लेकिन पंजाब यूनिवर्सिटी का चुनाव एक अलग तस्वीर पेश करता है. यहां ABVP ने न केवल मुकाबला किया बल्कि अध्यक्ष पद पर जीत भी हासिल की . हालांकि, किसी एक विश्वविद्यालय के चुनाव परिणाम को पूरे देश के युवाओं के राजनीतिक रुझान का प्रमाण मानना सही नहीं होगा.
फिर भी यह नतीजा इतना जरूर बताता है कि कैंपस राजनीति में ABVP का संगठनात्मक नेटवर्क कमजोर नहीं हुआ है. बल्कि पंजाब यूनिवर्सिटी जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में लगातार प्रभाव बनाए रखना उसके लिए एक अहम उपलब्धि है.
पंजाब की आगामी राजनीति के लिए क्यों अहम?
पंजाब यूनिवर्सिटी का छात्र संघ चुनाव सिर्फ कैंपस तक सीमित राजनीतिक मुकाबला नहीं है . यहां छात्र संगठनों के बीच होने वाली प्रतिस्पर्धा अक्सर राज्य की राजनीति से भी जुड़ जाती है.
इस बार ABVP-SOI की साझेदारी, NSUI की चुनौती और AAP समर्थित छात्र संगठन की मौजूदगी ने मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया था .ऐसे में ABVP की जीत संगठन के लिए सिर्फ एक छात्र चुनाव की सफलता नहीं, बल्कि पंजाब में अपने राजनीतिक-संगठनात्मक प्रभाव को बनाए रखने का संकेत भी है.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह जीत आने वाले समय में पंजाब के युवाओं और छात्र राजनीति के बीच भाजपा-समर्थित संगठनों के लिए व्यापक समर्थन में बदल पाएगी, या यह फिलहाल सिर्फ कैंपस की सीमाओं तक सीमित एक चुनावी सफलता साबित होगी.
-ममता सिंह
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