चंडीगढ़: पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस स्टूडेंट्स काउंसिल (PUCSC) चुनाव से एक दिन पहले, 30 अगस्त को यूनिवर्सिटी गुरुद्वारे से एक ऐसी घोषणा हुई जिसने राज्य की राजनीति में चल रही बड़ी बहस को कैंपस के भीतर ज़िंदा कर दिया.
शिरोमणि अकाली दल से जुड़े छात्र संगठन स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया (SOI) ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के साथ गठबंधन का ऐलान करते हुए उसके अध्यक्ष पद के उम्मीदवार अंकित बिधान को समर्थन देने की घोषणा की.
यह गठबंधन ‘छात्र कल्याण, कैंपस एकता और विकास’ के नाम पर किया गया, और इसे 'सिख-हिंदू एकता' के प्रतीक के रूप में पेश किया गया.
दिलचस्प यह है कि SOI का अपना उम्मीदवार इस बार नामांकन में ही खारिज हो गया था, जिसके बाद संगठन ने चुनावी मैदान से बाहर बैठने के बजाय ABVP के पक्ष में खड़ा होना चुना.
ABVP को पहले से ही HIMSA और ISA का ‘बिना शर्त’ समर्थन हासिल था, और अब SOI के जुड़ने से उसका चुनावी गणित और मजबूत हो गया है.
यह गठबंधन इसलिए भी अहम है क्योंकि SOI और ABVP पहले भी 2016 में एक साथ आ चुके हैं, तब INSO और HPSO को मिलाकर एक बड़ा मोर्चा बना था, जिसने पीयूष आनंद को अध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया था और दूसरे स्थान पर रहा था.
उस गठबंधन में शामिल INSO, चौटाला परिवार से जुड़ा संगठन था, यानी बादल और चौटाला परिवारों के पुराने राजनीतिक व पारिवारिक रिश्तों की झलक कैंपस की राजनीति में भी दिखी थी. SOI के लिए यह गठबंधन 2019 के बाद चुनावी मैदान में वापसी जैसा भी है, जब चेतन चौधरी ने आखिरी बार PUCSC अध्यक्ष पद जीता था.
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम का समय बेहद मौके पर है. शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी का 23 साल पुराना गठबंधन 2020 में कृषि कानूनों को लेकर टूट गया था. छह साल बाद, 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले, दोनों पार्टियों के फिर साथ आने की अटकलें एक बार फिर ज़ोर पकड़ रही हैं, और यही वजह है कि PU में बना यह छोटा-सा छात्र गठबंधन बड़े राजनीतिक संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
राज्य स्तर पर गठबंधन की अटकलें: बातचीत किस मोड़ पर है
पिछले कुछ हफ्तों में सामने आई रिपोर्टों को देखें तो अकाली-भाजपा गठबंधन को लेकर तस्वीर उतनी साफ नहीं है जितनी PU के गठबंधन में दिखी. अगस्त की शुरुआत में सुखबीर सिंह बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में हुई मुलाकात ने अटकलों को नई हवा दी थी.
इसके बाद ANI के सूत्रों के हवाले से खबरें आईं कि दोनों पार्टियों के बीच सीट-बंटवारे को लेकर बातचीत अंतिम चरण में पहुंच चुकी है, और इस बार भाजपा राज्य में ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाना चाहती है, जो 2020 से पहले के समीकरण से बिल्कुल उलट है, जब अकाली दल पंजाब में वरिष्ठ साझीदार हुआ करता था.
इस अनुमान को इस बात से भी बल मिला कि अकाली दल ने कई ग्रामीण सीटों पर अपनी तैयारियां धीमी कर दी हैं, जबकि भाजपा राज्य की सभी 117 सीटों पर संगठन खड़ा करने में जुटी है.
द ट्रिब्यून की 30 अगस्त की एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह बातचीत सिर्फ सुखबीर बादल की अगुवाई वाले मूल अकाली दल तक सीमित नहीं है. सुखबीर से अलग हुआ अकाली दल (पुनर्जीवित) गुट भी भाजपा के साथ NDA में शामिल होने की संभावनाएं टटोल रहा है. इस गुट में बीबी जागीर कौर, गुरप्रताप सिंह वडाला, प्रेम सिंह चंडूमाजरा और गोबिंद सिंह लोंगोवाल जैसे नेता शामिल हैं, जो 2025 में सुखबीर बादल पर अकाल तख्त के सुधार निर्देशों की अनदेखी का आरोप लगाकर पार्टी से अलग हुए थे.
भाजपा का दोहरा रुख़: कैडर को क्या संदेश दिया जा रहा है
इसके ठीक उलट, भाजपा नेतृत्व का सार्वजनिक रुख़ बिल्कुल अलग कहानी बयां करता है. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष ने हाल ही के अपने पंजाब दौरे में साफ तौर पर कहा कि भाजपा राज्य की सभी 117 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ेगी और खुद अपने दम पर सरकार बनाएगी.
पटियाला में हुई ज़ोनल बैठक में उन्होंने कार्यकर्ताओं से कहा कि 'पंजाब बदलाव के लिए पूरी तरह तैयार है, और भाजपा इस बदलाव को हकीकत बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है.'
केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और पंजाब भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष अश्विनी शर्मा भी पहले ही यह दोहरा चुके हैं कि पार्टी की तैयारी सभी सीटों के लिए है और अकाली दल से किसी समझौते की योजना नहीं है.
द ट्रिब्यून ने इस विरोधाभास को भाजपा कैडर की ‘दोहरी उलझन’ करार दिया है, एक तरफ संतोष का ‘अकालियों को भूल जाओ’ वाला कड़ा संदेश, और दूसरी तरफ गठबंधन की लगातार बनी हुई अटकलें.
2020 का ज़ख्म और अकाली दल की मजबूरी
गठबंधन की राह में सबसे बड़ी अड़चन वही है जिसने 2020 में इसे तोड़ा था, कृषि कानून. भले ही केंद्र ने वे कानून वापस ले लिए हों, लेकिन पंजाब के किसान तबके में भाजपा को लेकर जो अविश्वास बना, वह अब तक पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है.
ऐसे में अकाली दल के लिए भाजपा से दोबारा जुड़ना एक जोखिम भरा फैसला है, खासकर तब जब पार्टी खुद 2022 के चुनाव में महज़ तीन सीटों पर सिमटकर तीसरे नंबर पर खिसक चुकी है और अपनी खोई हुई साख फिर से बनाने की कोशिश में है.
दिलचस्प यह है कि इस बार गठबंधन की चर्चा में भाजपा की ‘बड़े भाई’ वाली भूमिका इसी आशंका को और पुख्ता करती नज़र आती है, यानी अगर गठबंधन होता भी है, तो यह अकाली दल के लिए 1997-2020 वाले दौर जैसा बराबरी का साझीदार बनना नहीं, बल्कि एक कमज़ोर स्थिति से समझौता करना होगा.
भाजपा नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह की टिप्पणी भी इसी उलझन को उजागर करती है. उनका कहना है कि भाजपा को पंजाब की राजनीति की गहरी समझ नहीं है, और अगर पार्टी को 2027 में जीतना है तो अकाली दल से गठबंधन के अलावा कोई चारा नहीं, क्योंकि अपने दम पर कैडर खड़ा करने में पार्टी को अभी दो-तीन चुनाव और लगेंगे.
PU का गठबंधन आने वाले संकेत की झलक?
मौजूदा हालात को जोड़कर देखा जाए तो गठबंधन की संभावना पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत दिखती है, मोदी-सुखबीर मुलाकात, सीट-बंटवारे की बातचीत, और अकाली दल के कई धड़ों से भाजपा का समानांतर संपर्क, ये सभी इस दिशा में इशारा करते हैं.
लेकिन भाजपा का शीर्ष नेतृत्व अभी भी सार्वजनिक तौर पर अकेले लड़ने की बात दोहरा रहा है, जो या तो असली रणनीति है या फिर बातचीत में बढ़त बनाने की चाल.
-ममता सिंह
"चंडीगढ़: पंजाब यूनिवर्सिटी कैंपस स्टूडेंट्स काउंसिल (PUCSC) चुनाव से एक दिन पहले, 30 अगस्त को यूनिवर्सिटी गुरुद्वारे से एक ऐसी घोषणा हुई जिस…"
