राजस्थान के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी बना दिया है, लेकिन आंकड़ों की बारीकी से पड़ताल करें तो तस्वीर उतनी साफ नहीं जितनी पहली नजर में दिख रही है. ‘वन स्टेट-वन इलेक्शन’ के तहत पहली बार राज्य की सभी 309 शहरी निकायों में एक साथ वोटिंग हुई, जिसे भजनलाल शर्मा सरकार के लिए पहली बड़ी परीक्षा माना जा रहा था.
नतीजे क्या कहते हैं
10 हजार से ज्यादा वार्डों में से बीजेपी को 4,179, कांग्रेस को 3,613 और निर्दलीयों को 2,273 वार्डों में जीत मिली. वोट प्रतिशत के लिहाज से बीजेपी को 35.19% और कांग्रेस को 34.25% वोट मिले, यानी दोनों के बीच सिर्फ 0.94% का फासला रहा.
निर्दलीय उम्मीदवारों को 27% से ज्यादा वोट मिले, जिससे मुकाबला कई जगह तिकोना हो गया था.
309 निकायों में से बीजेपी को सिर्फ 85 में और कांग्रेस को 45 में स्पष्ट बहुमत मिला. बाकी 145 निकायों में किसी भी बड़ी पार्टी को बहुमत नहीं मिला, जहां अब बोर्ड बनाने के लिए निर्दलीयों की भूमिका अहम होगी.
बीजेपी का दावा
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने नतीजों को अपनी सरकार के ढाई साल के कामकाज और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की जीत बताया है. उन्होंने खुद 10 शहरों में रोड शो किए थे. प्रधानमंत्री मोदी ने भी इसे ‘डबल इंजन’ सरकार पर जनता की मुहर करार दिया है. पार्टी यह भी बता रही है कि पिछले चुनावी दौर के मुकाबले इस बार वार्डों की संख्या करीब 37% बढ़ी है, और बीजेपी की सीटें 57% बढ़ीं जबकि कांग्रेस की सिर्फ 19% सीटें बढ़ीं हैं.
कांग्रेस का पलटवार
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने वोट शेयर के मामूली अंतर को उभारते हुए कहा कि पार्टी बीजेपी से सिर्फ एक प्रतिशत से भी कम पीछे रही है. उन्होंने वार्डों के परिसीमन पर भी सवाल उठाए, यह दावा करते हुए कि मुस्लिम, दलित और ओबीसी बहुल इलाकों के वार्ड आकार में बड़े रखे गए जबकि परंपरागत बीजेपी वोटरों वाले वार्ड छोटे रखे गए, ताकि नतीजे प्रभावित किए जा सकें. कांग्रेस ने अजमेर, पाली और बीकानेर जैसे बीजेपी के परंपरागत गढ़ों में बढ़त हासिल की है.
अंदरूनी नाराज़गी के संकेत
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नतीजे शर्मा सरकार के खिलाफ बढ़ती सत्ता-विरोधी लहर की तरफ इशारा करते हैं. बीते ढाई साल में सरकार पर फैसले टालने और प्रतिक्रियावादी रवैया अपनाने के आरोप लगते रहे हैं, चाहे वह मंत्री किरोड़ी लाल मीणा के इस्तीफे का मामला हो, सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा रद्द करने का विवाद हो, या खुद निकाय चुनाव टालने का फैसला हो. कई मुद्दों पर सरकार को अदालत की फटकार भी झेलनी पड़ी.
शौर्य दिवस मनाने की घोषणा को दो बार वापस लेना, स्कूलों में सार्थक नाम अभियान और राम कथा जैसे फैसलों की वापसी भी सरकार की अनिश्चितता की मिसाल के तौर पर गिनाई जा रही है. हाल ही में जयपुर के बागरू में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधिमंडल पर हमले के बाद सरकार की प्रतिक्रिया पर भी सवाल उठे थे.
सीएम और पार्टी अध्यक्ष के घर में झटका
मुख्यमंत्री शर्मा के गृह क्षेत्र भरतपुर की 65-वार्ड वाली नगर निगम में निर्दलीयों ने 36 वार्ड जीतकर बीजेपी (20) और कांग्रेस (7) दोनों को पीछे छोड़ दिया. बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के गृह क्षेत्र पाली में कांग्रेस को 29, बीजेपी को 21 और निर्दलीयों को 15 वार्डों में जीत मिली. वसुंधरा राजे के प्रभाव वाले झालावाड़ नगर परिषद में भी बीजेपी को कांग्रेस के मुकाबले करारी शिकस्त झेलनी पड़ी.
आगे की राह
राजस्थान में पिछले तीन दशकों से हर सरकार को अगली बार सत्ता से बाहर होना पड़ा है. हालांकि निकाय चुनाव पूरी तरह उसी पैटर्न का संकेत नहीं होते, पर विश्लेषक मानते हैं कि नज़दीकी वोट शेयर, निर्दलीयों का उभार और खुद सीएम व पार्टी अध्यक्ष के गृह क्षेत्रों में हुआ नुकसान बीजेपी के लिए चेतावनी की तरह हैं.
अगला बड़ा इम्तिहान पंचायती राज चुनावों में होगा, जहां कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद लगाए बैठी है, और तब तक 2028 के विधानसभा चुनाव भी नज़दीक आते जाएंगे.
-ममता सिंह
"राजस्थान के शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के नतीजों ने बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी बना दिया है, लेकिन आंकड़ों की बारीकी से पड़ताल करें तो तस्वीर…"
