दतिया की एक मौत, पूरे सिस्टम पर सवाल
मध्य प्रदेश के दतिया जिले से आई एक खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया है. एक अतिकुपोषित बच्ची की मौत हो गई. यह कोई इकलौती घटना नहीं है. कुछ महीने पहले ही दतिया के इंदरगढ़ इलाके में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला का शव कूड़े के वाहन में मिला था, जिसकी मौत भूख, प्यास और ठंड से हुई बताई गई. ये दोनों घटनाएं मध्य प्रदेश और देश के कई हिस्सों की तस्वीर हैं. 

आखिर कुपोषण है क्या?
कुपोषण सिर्फ भूखे रहने का नाम नहीं है, यह ऐसी स्थिति है जिसमें शरीर को सही मात्रा और सही तरह के पोषक तत्व नहीं मिल पाते. इसके अलग-अलग रूप हैं, जैसे वेस्टिंग (दुबलापन), स्टंटिंग (कद में कमी) और अंडरवेट (कम वज़न). 

दतिया की जमीनी हकीकत
मध्य प्रदेश की लगभग 97,000 आंगनवाड़ियों में बच्चों को साल में 300 दिन पोषण आहार मिलना तय है, लेकिन हकीकत में सिर्फ 170 दिन ही आहार बंट पाया, यानी तय लक्ष्य का करीब आधा. 
रीवा, सागर, देवास, शिवपुरी और होशंगाबाद समेत राज्य के सभी 7 पोषण आहार प्लांट भारी घाटे के चलते बंद हो चुके हैं, और नई व्यवस्था के लिए अब तक टेंडर तक जारी नहीं हुए. इसका सीधा असर बालाघाट से दतिया तक मासूम बच्चों पर पड़ रहा है. 

भारत में कुपोषण में सबसे आगे कौन सा राज्य?
National Family Health Survey NFHS-6 (2023-24) के मई 2026 में जारी ताज़ा आंकड़े, जो 715 जिलों के करीब 6.79 लाख परिवारों को कवर करते हैं, वो बताते हैं:

  • मध्य प्रदेश बाल कुपोषण में सबसे खराब प्रदर्शन वाला राज्य बनकर उभरा है. यहां 23.8% बच्चे वेस्टिंग (दुबलेपन) के शिकार हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत सिर्फ 19% है. NFHS-5 में यह आंकड़ा 18.9% था, यानी करीब 5 प्रतिशत अंकों की चिंताजनक बढ़ोतरी.
  • राज्य में 39.7% बच्चे कम वज़न के हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 31.8% है. NFHS-5 में यह 33% था.
  • राहत की बात यह है कि स्टंटिंग में सुधार हुआ है, 35.7% से घटकर 31.4%.
  • अंडरवेट कैटेगरी में झारखंड सबसे आगे है, यहां 41.1% बच्चे कम वज़न के हैं.  वेस्टिंग में भी झारखंड 22.3% पर है, जो केरल के 10.9% से दोगुने से भी ज़्यादा है. 

सबसे ज़्यादा कुपोषित जिले कौन से हैं?
NFHS-5 (2019-21) के मुताबिक कुछ जिले बेहद चिंताजनक स्थिति में हैं:

  • चित्रकूट (उत्तर प्रदेश): 47.5% बच्चे स्टंटिंग, 24.8% वेस्टिंग और 12% गंभीर वेस्टिंग से पीड़ित.
  • गुजरात के आदिवासी जिले: देश के 10 सबसे गंभीर कुपोषित जिलों में से 4 गुजरात में हैं, डांग (22.2%), पंचमहाल (19.7%), तापी और नर्मदा.
  • झारखंड के आदिवासी जिले: पश्चिमी सिंहभूम, दुमका, गोड्डा, साहिबगंज, सिमडेगा, चतरा और लातेहार सबसे गंभीर.
  • राजस्थान: उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, बारां जैसे आदिवासी बहुल जिलों में उच्च कुपोषण. नीति आयोग ने जयपुर, बीकानेर, अजमेर, नागौर और अलवर को भी उच्च-बोझ वाले जिलों में रखा है. 

संकट की 5 बड़ी वजहें:

1. बजट है, पर काफी नहीं
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को 2025-26 में करीब 26,889.69 करोड़ रुपये मिले, जिसमें सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 के लिए 21,960 करोड़ रुपये थे. 2026-27 में यह बढ़कर लगभग 23,100 करोड़ हुआ. लेकिन ज़रूरत सालाना 38,571 करोड़ रुपये की थी, जो अपडेटेड अनुमान में बढ़कर 48,440 करोड़ हो गई, यानी मिल रहा बजट ज़रूरत का आधा भी नहीं. 

2. बुनियादी सुविधाओं की कमी
भारत में 14 लाख से ज़्यादा आंगनवाड़ी केंद्र हैं, जहां 8 करोड़ से ज़्यादा बच्चों और महिलाओं को सुविधा मिलनी चाहिए. गुजरात की 2025 CAG ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक वहां 16,045 आंगनवाड़ी केंद्रों की कमी है, और मौजूदा हज़ारों केंद्र जर्जर इमारतों या खुले में चल रहे हैं. 

3. आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं पर बोझ, वेतन बेहद कम
इतनी जिम्मेदारियों के बदले केंद्र सरकार से कार्यकर्ता को सिर्फ 4,500 रुपये और सहायिका को 2,250 रुपये मिलते हैं. राज्यों की मदद जोड़कर भी यह 6,000 से 15,000 रुपये के बीच ही पहुंचता है. 

4. स्तनपान का घटता चलन
6 महीने तक विशेष स्तनपान की दर NFHS-5 के 63.7% से घटकर NFHS-6 में 55.8% रह गई है.  उत्तर प्रदेश में यह 59.7% से गिरकर सिर्फ 34.6% रह गई, जबकि केरल में यह 55.5% से बढ़कर 72.7% हो गई, जो बताता है कि समस्या प्रसव के बाद की देखभाल और जागरूकता की है. 

5. बच्चों को सही आहार न मिलना
6-23 महीने के बच्चों में सही मात्रा, विविधता और आवृत्ति वाला आहार सिर्फ 15.3% को मिल रहा है (NFHS-5 में यह 11% था). यानी छह में से पांच बच्चे अब भी ज़रूरी आहार से वंचित हैं. राजस्थान में यह दर सिर्फ 8.7% और बिहार में 11.9% है. 

बड़ी तस्वीर
दुनिया में सबसे ज़्यादा कुपोषित लोग भारत में रहते हैं. 70 करोड़ से ज़्यादा भारतीय खाद्य असुरक्षा से जूझ रहे हैं, और 20.6 करोड़ बच्चे शिक्षा, स्वास्थ्य या पोषण तक पहुंच से महरूम हैं. दतिया की बच्ची की मौत महज़ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि इस पूरे सिस्टम की नाकामी का चेहरा है. 

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