पिछले कुछ हफ्तों में भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प पैटर्न देखने को मिला है. एक के बाद एक आंदोलन और उसके बाद सरकार की ओर से रियायतें. पहले छात्र आंदोलन के दबाव में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा और अब मध्य प्रदेश में किसानों के आंदोलन के बाद मोहन यादव सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ा.

इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या अब सरकारें केवल तब फैसले लेती हैं, जब जनता सड़कों पर उतरती है? और कृषि मंत्री के गृह राज्य मध्य प्रदेश में आखिर ऐसा क्या है कि किसानों को बार-बार आंदोलन का रास्ता चुनना पड़ रहा है?

भोपाल क्यों पहुंचे हजारों किसान?

27 जुलाई को मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों से हजारों किसान ट्रैक्टर-ट्रॉली लेकर भोपाल पहुंचे. किसानों की प्रमुख मांग थी कि मूंग की 100 प्रतिशत खरीद न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर की जाए और खाद वितरण के लिए लागू ई-टोकन व्यवस्था को खत्म किया जाए. किसानों का आरोप था कि सरकार सीमित मात्रा में ही एमएसपी पर खरीद करती है, जबकि बाकी उपज उन्हें खुले बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़ती है. वहीं, ई-टोकन व्यवस्था के कारण समय पर खाद नहीं मिलने से खेती प्रभावित हो रही थी और किसानों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था.

इस बार MSP का मुद्दा इतना बड़ा क्यों बन गया?

इस वर्ष मध्य प्रदेश में मूंग का उत्पादन अनुमान से कहीं अधिक हुआ है. राज्य में लगभग 14.30 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में मूंग की खेती हुई और कुल उत्पादन लगभग 20 लाख मीट्रिक टन तक पहुंचने का अनुमान है.

लेकिन सरकार ने केवल लगभग 4.5 लाख मीट्रिक टन मूंग की खरीद एमएसपी पर करने की तैयारी की थी. यानी अधिकांश किसानों को अपनी फसल खुले बाजार में बेचनी पड़ती, जहां कीमत एमएसपी से काफी कम मिल सकती थी.

यही कारण था कि किसानों ने इस बार 100 प्रतिशत एमएसपी खरीद की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन किया.

मामला बढ़ने पर मध्य प्रदेश के कृषि मंत्री ने केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर एमएसपी खरीद का लक्ष्य 4.5 लाख टन से बढ़ाकर 8 लाख टन करने की मांग की.

इसके जवाब में शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखते हुए कहा कि केंद्र सरकार पहले ही मध्य प्रदेश को देश में सबसे अधिक खरीद का लक्ष्य दे चुकी है. यदि उत्पादन इससे अधिक है, तो अतिरिक्त खरीद की व्यवस्था राज्य सरकार को करनी चाहिए.

सरकार ने क्या रियायतें दीं?

इसके बाद भोपाल में सरकार और किसान प्रतिनिधियों के बैठक हुई. बैठक राज्य सरकार ने कई अहम फैसले लिए

  • एमएसपी पर खरीद की सीमा 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत कर दी गई.
  • स्लॉट बुकिंग की अंतिम तिथि 30 जुलाई से बढ़ाकर 10 अगस्त कर दी गई.
  • खरीद की अंतिम तिथि 10 अगस्त से बढ़ाकर 20 अगस्त कर दी गई.
  • खाद वितरण के लिए लागू ई-टोकन व्यवस्था पर फिलहाल रोक लगा दी गई.

इन घोषणाओं के बाद किसानों ने आंदोलन समाप्त कर दिया और अपने घर लौट गए. हालांकि उनकी सबसे बड़ी मांग 100 प्रतिशत एमएसपी खरीद—अब भी पूरी नहीं हुई है.

लेकिन सवाल अब भी बाकी है

यह आंदोलन खत्म जरूर हो गया, लेकिन अपने पीछे कई गंभीर सवाल छोड़ गया है. जब मध्य प्रदेश को कृषि प्रधान राज्य कहा जाता है, किसानों के लिए दर्जनों योजनाएं चलाई जाती हैं और हर सरकार खुद को किसान हितैषी बताती है, तो फिर हर कुछ वर्षों में किसान एमएसपी, फसल खरीद, मुआवजे और खाद जैसी बुनियादी मांगों को लेकर सड़क पर उतरने के लिए मजबूर क्यों होते हैं? सवाल यह भी है कि क्या सरकार की योजनाओं और किसानों की जमीनी हकीकत के बीच कोई बड़ा अंतर है? या फिर सरकारें केवल आंदोलन के दबाव में ही नीतियों और फैसलों में बदलाव करने को मजबूर होती हैं?

मध्य प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा—किसान

अगर मध्य प्रदेश की राजनीति के इतिहास पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि किसान केवल एक वोट बैंक नहीं, बल्कि प्रदेश की चुनावी राजनीति का सबसे बड़ा केंद्र रहे हैं. विपक्ष के बड़े आंदोलन अक्सर खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों को लेकर होते हैं, वहीं सत्ता पक्ष भी खुद को किसान हितैषी साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ता. 

एक तरफ कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी सोयाबीन के दाम बढ़ाने की मांग को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हैं, तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री मोहन यादव खुद को किसान पुत्र बताते हैं, लेकिन जमीन खरीद से जुड़े विपक्ष के आरोपों को लेकर भी उन्हें घेरा जाता है. यही वजह है कि मध्य प्रदेश में किसान सिर्फ कृषि व्यवस्था का हिस्सा नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति का सबसे अहम मुद्दा बने हुए हैं.

 

2018 का चुनाव और मंदसौर की याद

मध्य प्रदेश में किसानों की राजनीतिक ताकत का सबसे बड़ा उदाहरण 2018 का विधानसभा चुनाव माना जाता है. इससे एक साल पहले 2017 में मंदसौर में किसानों का बड़ा आंदोलन हुआ था, जिसमें किसानों ने अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया था. इस दौरान दूध सड़कों पर बहाया गया, फल और सब्जियां फेंकी गईं और सरकार के खिलाफ व्यापक आक्रोश देखने को मिला. आंदोलन के दौरान किसानों और पुलिस के बीच टकराव हुआ, जिसमें पुलिस फायरिंग में छह किसानों की मौत हो गई. 

यह घटना पूरे प्रदेश की राजनीति का केंद्र बन गई. इसके बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में किसानों से जुड़े मुद्दे सबसे बड़ी चुनावी बहस बने और 15 साल बाद कांग्रेस मध्य प्रदेश की सत्ता में वापसी करने में सफल रही. मंदसौर की घटना ने यह साबित कर दिया कि मध्य प्रदेश में किसान केवल एक आर्थिक वर्ग नहीं, बल्कि एक ऐसा सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा हैं, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं.

अब आगे क्या?

फिलहाल किसानों को आंशिक राहत मिल गई है और आंदोलन समाप्त हो चुका है. लेकिन मूल प्रश्न अभी भी कायम है.

क्या भविष्य में भी किसानों को अपनी मांगें मनवाने के लिए बार-बार सड़कों पर उतरना पड़ेगा?

क्या एमएसपी, खरीद व्यवस्था, खाद वितरण और फसल प्रबंधन जैसी समस्याओं का कोई स्थायी समाधान निकलेगा?

या फिर मध्य प्रदेश की राजनीति में किसान केवल चुनावी मौसम का सबसे बड़ा मुद्दा बने रहेंगे और हर कुछ वर्षों बाद आंदोलन, आश्वासन और समझौते का यही चक्र दोहराया जाता रहेगा?

यही वह बहस है, जिसका जवाब केवल सरकार नहीं, बल्कि पूरी कृषि नीति और राजनीतिक व्यवस्था को देना होगा.


 

"पिछले कुछ हफ्तों में भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प पैटर्न देखने को मिला है. एक के बाद एक आंदोलन और उसके बाद सरकार की ओर से रियायतें. पहले छा…"