नई दिल्ली: वर्षों से लंबित किशाऊ बांध परियोजना को लेकर मंगलवार को केंद्र सरकार और छह राज्यों, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के बीच एक अहम समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हुए.
इस समझौते से परियोजना की लागत साझा करने और उससे मिलने वाले लाभ के बंटवारे को लेकर आठ साल से चला आ रहा गतिरोध खत्म हो गया है.
यह समझौता केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई एक बैठक में हुआ, जिसमें सभी छह राज्यों के मुख्यमंत्री मौजूद रहे, उत्तराखंड के पुष्कर सिंह धामी, हिमाचल प्रदेश के सुखविंदर सिंह सुक्खू, हरियाणा के नायब सिंह सैनी, राजस्थान के भजनलाल शर्मा, उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ और दिल्ली की रेखा गुप्ता.
बैठक में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल, केंद्रीय गृह सचिव गोविंद मोहन, जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण विभाग के सचिव के साथ सभी राज्यों के मुख्य सचिव भी शामिल हुए. MoU पर हस्ताक्षर खुद अमित शाह ने केंद्र की ओर से किए.
बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने इस समझौते को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि राजस्थान के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि राज्य लंबे समय से पानी की कमी की समस्या से जूझ रहा है.
उन्होंने ERCP, चंबल-कालीसिंध-पार्वती लिंक परियोजना, हरियाणा के साथ यमुना जल समझौते और गुजरात-मध्य प्रदेश-महाराष्ट्र-राजस्थान के बीच नर्मदा समझौते का भी जिक्र किया.
हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने भी समझौते से पहले इसे ‘ऐतिहासिक सफलता’ करार दिया. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि इस समझौते से हिमाचल को बिना किसी निवेश के हर साल करीब 600 करोड़ रुपये की आय होगी, और राज्य के हितों, अधिकारों व भविष्य से कोई समझौता नहीं किया गया है. उन्होंने कहा कि राज्य की ‘विरासत सुरक्षित रहनी चाहिए और उसे उसका पूरा हक मिलना चाहिए.’
विवाद की जड़ क्या थी?
किशाऊ परियोजना वर्षों से इसलिए अटकी हुई थी क्योंकि हिमाचल प्रदेश बिजली उत्पादन की लागत में अपना हिस्सा वहन करने को लेकर सहमत नहीं था. पहले की भाजपा सरकार ने इसके लिए 800 करोड़ रुपये देने पर सहमति जताई थी, लेकिन बाद में आई कांग्रेस सरकार ने सीमित वित्तीय संसाधनों का हवाला देते हुए इस बोझ को उठाने से इनकार कर दिया था. यह गतिरोध इस साल जून में अमित शाह की अध्यक्षता में हुई एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद सुलझा.
नई व्यवस्था के तहत परियोजना के जल घटक की 90 प्रतिशत लागत केंद्र सरकार वहन करेगी, जिससे हिमाचल प्रदेश पर इस मद में कोई वित्तीय भार नहीं पड़ेगा, पहले तय किए गए 2,000 करोड़ रुपये के हिस्से से हिमाचल को अब पूरी तरह छूट मिल गई है.
इसके बदले हिमाचल के हिस्से का पानी दिल्ली और राजस्थान को दिया जाएगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक हिमाचल को यमुना बेसिन में 378 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी तक पहुंच का आश्वासन भी मिला है.
परियोजना के बारे में
किशाऊ बांध हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में यमुना की सबसे बड़ी और सबसे लंबी सहायक नदी टौंस पर, हिमाचल और उत्तराखंड की सीमा पर बनाया जाना प्रस्तावित है. टौंस नदी उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में बंदरपूंछ ग्लेशियर से निकलती है और करीब 150 किलोमीटर बहती है. यह 236 मीटर ऊंचा कंक्रीट बांध होगा और पूरा होने पर देश के सबसे ऊंचे बांधों में गिना जाएगा.
परियोजना से 422 मेगावाट बिजली पैदा होगी, करीब 97,000 हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा मिलेगी और हर साल भाग लेने वाले राज्यों को 517 मिलियन क्यूबिक मीटर पेयजल की आपूर्ति होगी. इस बहुउद्देश्यीय परियोजना का एक अहम लक्ष्य यमुना नदी के पुनर्जीवन (rejuvenation) से भी जोड़ा जा रहा है. परियोजना की कुल अनुमानित लागत करीब 15,000 करोड़ रुपये है.
यह समझौता जल प्रबंधन, जलविद्युत उत्पादन और लाभों के समान बंटवारे को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच सहयोग मजबूत करने के साथ-साथ, ऊपरी यमुना बेसिन से जुड़े इसी तरह के अंतरराज्यीय विवादों को सुलझाने के लिए एक मॉडल के तौर पर भी देखा जा रहा है.
-ममता सिंह
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