कर्नाटक में राजनीतिक अटकलों ने आधिकारिक रूप ले लिया है. भाजपा के बिहार मॉडल की तर्ज पर कर्नाटक में राजनीतिक घटनाक्रम रचे जा रहे हैं. सूत्रों के हवाले से चल रही खबरों पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने विधायकों के हवाले से खुद मुहर लगा दी है. प्राप्त जानकारियों के मुताबिक CM दोपहर तीन बजे पद से इस्तीफा दे सकते हैं.

 

लेकिन, अब इस घटनाक्रम पर एक बड़ा पेंच फंस चुका है, क्योंकि कर्नाटक के राज्यपाल थावरचंद गहलोत किसी पारिवारिक इमरजेंसी के कारण सुबह-सुबह ही इंदौर पहुंच गए हैं. अब सब इस बात पर सिर खुजा रहे हैं कि राज्यपाल की गैरमौजूदगी में CM इस्तीफा किसे देंगे.

 

संविधान के शिल्पकारों ने ऐसे हालातों के लिए भी प्रावधान बनाए हैं. भारतीय संविधान के अनुसार अगर किसी राज्य में राज्यपाल का पद निधन या किसी अन्य कारण से खाली हो जाए, या फिर राज्यपाल इस्तीफे के दौरान मौजूद न हों, तो व्यवस्था नहीं रुकती, बल्कि अतिरिक्त प्रभार वाले व्यक्ति को इस्तीफा दिया जा सकता है. आइए जानते हैं कि यह पूरी व्यवस्था काम कैसे करती है. साथ ही अनुच्छेद 156 और 160 में और क्या व्यवस्थाएं की गई हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, महाराष्ट्र समेत कई अन्य राज्यों में ऐसे हालात पहले भी बन चुके हैं.

 

 

संविधान क्या कहता है

 

जब किसी राज्य में राज्यपाल मौजूद न हों, पद खाली हो जाए, इस्तीफा दे दिया जाए या किसी कारणवश वे अपने कर्तव्यों का पालन न कर पा रहे हों, तब संविधान के अनुच्छेद 160 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि, “ऐसी किसी भी स्थिति में राष्ट्रपति, राज्यपाल के कामों के लिए ऐसा प्रबंधन कर सकेगा, जो वह ठीक समझता हो.” यानी अगर राज्यपाल का पद खाली हो जाए तो राष्ट्रपति किसी दूसरे राज्य के राज्यपाल को अतिरिक्त प्रभार दे सकते हैं या किसी व्यक्ति को कार्यवाहक के रूप में नियुक्त कर सकते हैं.

 

यह प्रावधान 26 जनवरी 1950 को ही मूल संविधान में जोड़ दिया गया था. संविधान निर्माताओं का उद्देश्य यह था कि किसी भी परिस्थिति में राज्यों का संवैधानिक कामकाज न रुके. यही कारण है कि राज्यपाल की गैरमौजूदगी में भी मुख्यमंत्री की नियुक्ति, इस्तीफा, विधानसभा सत्र बुलाने जैसे कार्य बाधित नहीं होते.

 

कर्नाटक में क्या होगा

 

कर्नाटक वाले मामले में कानून विशेषज्ञों का मानना है कि मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा राजभवन या अधिकृत माध्यम से राज्यपाल तक पहुंचा सकते हैं. राज्यपाल कहीं से भी इस इस्तीफे को मंजूरी दे सकते हैं. इसके बाद राज्यपाल मौजूदा मुख्यमंत्री को तब तक कार्यवाहक के तौर पर काम जारी रखने को कहेंगे, जब तक विधायक दल नया नेता नहीं चुन लेता. नया नेता चुने जाने के बाद उसे सरकार बनाने का न्योता दिया जाएगा और वह मुख्यमंत्री पद की शपथ लेगा.

 

सिद्धारमैया का सफर

 

अहिंदा की राजनीति करने वाले सिद्धारमैया मंडल राजनीति से निकले जमीनी पकड़ वाले नेता रहे हैं. जनता दल, जनता दल सेक्युलर और फिर 2006 में कांग्रेस का दामन थामकर वह पहली बार 2013 में मुख्यमंत्री बने. सिद्धारमैया ने 2023 में न सिर्फ दोबारा पद संभाला, बल्कि देवराज उर्स का रिकॉर्ड तोड़कर राज्य के सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री भी बने.

 

पांच दशकों की लंबी राजनीतिक पारी अब राज्यसभा के जरिए केंद्र तक भी पहुंच सकती है.
 

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