राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा पहली बार जारी किए गए जिला-स्तरीय श्रम बल आंकड़ों (PLFS Report) का यदि बारीक विश्लेषण किया जाए, तो यह केवल रोज़गार के आंकड़े नहीं हैं, बल्कि यह भारत के क्षेत्रीय आर्थिक मॉडल (Regional Economic Disparities) और नीतिगत असमानताओं का एक बड़ा पर्दाफाश है.
जहाँ एक ओर गुजरात का सूरत और हिमाचल का हमीरपुर रोज़गार और महिला भागीदारी के मामले में 'रोल मॉडल' बनकर उभरे हैं, वहीं दूसरी ओर बिहार, उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के कुछ जिले गंभीर आर्थिक मंदी और सामाजिक गतिहीनता की कहानी बयां कर रहे हैं.
'सूरत मॉडल' बनाम 'दरभंगा मॉडल': विकास का दोहरा चरित्र
NSO के आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि भारत के 100 सबसे आबादी वाले जिलों में विकास की असमानता कितनी गहरी है.
सूरत का आर्थिक इंजन: गुजरात के सूरत जिले में श्रम बल भागीदारी (LFPR) 68.6% और श्रमिक जनसंख्या अनुपात (WPR) 67.8% है, जो देश के शीर्ष 100 सबसे आबादी वाले जिलों में सबसे अधिक है. यह दर्शाता है कि कपड़ा और हीरा उद्योग जैसी श्रम-गहन (labour-intensive) विनिर्माण गतिविधियाँ स्थानीय आबादी को काम देने में सफल रही हैं.
दरभंगा में गहराती मंदी: इसके ठीक उलट, बिहार का दरभंगा 100 सबसे बड़े जिलों में सबसे निचले पायदान पर है. यहाँ LFPR और WPR के न्यूनतम स्तर यह साबित करते हैं कि पूर्वी भारत में स्थानीय रोजगार सृजन का ढांचा बेहद कमजोर बना हुआ है.
ये भी पढ़ें: VB-G RAM G: 125 दिन रोजगार की गारंटी, फिर भी जुलाई में काम की मांग में 39.2% की गिरावट?
महिला श्रम भागीदारी का कड़वा सच: दिल्ली और बिहार क्यों पिछड़े?
सरकारी रिपोर्ट के अनुसार देश के 57.8% जिलों में महिला LFPR 40% या उससे अधिक है, लेकिन ज़मीनी विषमता चौंकाने वाली है-सबसे बड़ा सवाल:यदि हिमाचल का हमीरपुर 80% से अधिक महिलाओं को काम से जोड़ सकता है, तो देश की राजधानी दिल्ली का पूर्वी जिला केवल 18.9% पर क्यों सिमटा हुआ है? यह शहरी नीति और महिला सुरक्षा पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है.
बेरोज़गारी दर (0.9%) का रहस्य: क्या सच में नौकरियां हैं या 'अदृश्य बेरोज़गारी'?
रिपोर्ट के मुताबिक, पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना और बिहार के अररिया में बेरोज़गारी दर केवल 0.9% दर्ज की गई है. लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि ग्रामीण और कम-विकसित क्षेत्रों में "कम बेरोज़गारी दर" का मतलब यह नहीं है कि वहाँ उच्च वेतन वाली नौकरियां उपलब्ध हैं.
इसका वास्तविक अर्थ यह है कि वहाँ के लोग अदृश्य बेरोज़गारी या अत्यंत कम पारिश्रमिक वाले असंगठित कार्यों में संलग्न रहने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि उनके पास भुखमरी से बचने के लिए कोई अन्य विकल्प नहीं है.
युवा NEET संकट: 23.7% जिलों में युवा न पढ़ाई में हैं, न काम में
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू NEET दर (Not in Employment, Education or Training) है:
केरल का एर्नाकुलम (9.6%) और कर्नाटक का बेंगलुरु शहरी (15.0%) यह दिखाता है कि जहाँ शिक्षा प्रणाली और सर्विस सेक्टर का बुनियादी ढांचा मजबूत है, वहाँ युवा सही रास्ते पर हैं. लेकिन, देश के 23.7% जिलों में NEET दर 30% से अधिक है.
इसका सीधा मतलब यह है कि लगभग हर चौथे जिले में 15 से 29 वर्ष की आयु का लगभग एक-तिहाई युवा न तो पढ़ाई कर रहा है, न कोई हुनर सीख रहा है और न ही किसी रोज़गार से जुड़ा है. यह 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' के लिए एक गंभीर चेतावनी है.
नीतिगत प्राथमिकताओं को बदलने का समय
NSO द्वारा जारी यह नया जिला-स्तरीय डेटा केवल संख्याओं का खेल नहीं है. यह नीति निर्माताओं के लिए एक चेतावनी है कि पूरे देश के लिए 'एक ही नीति' (One-Size-Fits-All) लागू नहीं की जा सकती. जब तक बिहार के दरभंगा और दिल्ली के शहरी इलाकों में महिलाओं और युवाओं के लिए अवसर नहीं बनाए जाएंगे, तब तक आर्थिक विषमता की यह खाई भर पाना असंभव है.
"राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा पहली बार जारी किए गए जिला-स्तरीय श्रम बल आंकड़ों (PLFS Report) का यदि बारीक विश्लेषण किया जाए, तो …"
