वैश्विक अनिश्चितताओं और आर्थिक सुस्ती की आहट के बावजूद भारतीय कंपनियों का विदेशों में कारोबार फैलाने का जज़्बा कायम है. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा जारी अगस्त 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय कॉरपोरेट्स का आउटवर्ड फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट (OFDI) सालाना आधार पर (YoY) 23.28% बढ़कर 3.84 अरब डॉलर (लगभग ₹32,000 करोड़) के स्तर पर पहुंच गया है. अगस्त 2025 में यह आंकड़ा 3.11 अरब डॉलर था.
हालांकि, मासिक आधार पर तुलना करें तो जुलाई 2026 के $5.77 अरब के मुकाबले अगस्त में इसमें कुछ नरमी देखी गई है.
गारंटी और इक्विटी का दिखा दबदबा
आरबीआई के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय कंपनियों ने विदेशों में अपनी साख और पूंजी दोनों का मज़बूती से इस्तेमाल किया है:
- जारी की गई गारंटी (Guarantees Issued): $2.23 अरब (कुल निवेश का 58.2%) - इससे यह साफ है कि भारतीय पैरेंट कंपनियां अपनी विदेशी इकाइयों (JVs/WOS) के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय गारंटी दे रही हैं.
- इक्विटी (Equity): $1.14 अरब (29.7%) - प्रत्यक्ष पूंजी निवेश का बड़ा हिस्सा विनिर्माण और तकनीक सेक्टर में गया.
- ऋण (Loan): $46.42 करोड़ (12.1%) - विदेशी सब्सिडियरीज़ को सीधे दिए गए कर्ज का हिस्सा.
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सोलर इंडस्ट्रीज़ और जिंदल पावर ने मारी बाज़ी
अगस्त 2026 के दौरान वैश्विक बाज़ार में दांव लगाने वाली शीर्ष भारतीय कंपनियों में रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र का दबदबा रहा:
- सोलर इंडस्ट्रीज़ इंडिया लिमिटेड : $79.50 करोड़ के कुल प्रतिबद्धता के साथ पहले स्थान पर रही.
- जिंदल पावर लिमिटेड : $52.22 करोड़ के निवेश के साथ दूसरे स्थान पर.
- भारत पेट्रोरिसोर्सेज़ लिमिटेड : ऊर्जा परिसंपत्तियों के लिए $40.45 करोड़ प्रतिबद्ध किए.
- टाटा कम्युनिकेशंस : $28.87 करोड़.
- ओवेंस कॉर्निंग इंडिया : $22.50 करोड़.
मॉरीशस और नीदरलैंड्स बने पहली पसंद
टैक्स दक्षता और वैश्विक वित्तीय केंद्रों तक आसान पहुंच के कारण भारतीय कंपनियों का झुकाव पारंपरिक पसंदीदा गंतव्यों की ओर बना हुआ है:
- मॉरीशस: $1.39 अरब (कुल निवेश का 36% से अधिक) के साथ शीर्ष गंतव्य रहा.
- नीदरलैंड्स : $70.65 करोड़ के साथ दूसरे नंबर पर.
- ब्रिटेन : $41.26 करोड़।
- सिंगापुर : $39.84 करोड़।
- अमेरिका: $25.40 करोड़।
मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर आगे
क्षेत्रवार आवंटन को देखें तो मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ने सबसे ज्यादा $1.08 अरब का निवेश आकर्षित किया. इसके बाद वित्तीय, बीमा एवं बिजनेस सर्विसेज का नंबर रहा, जहां $72.27 करोड़ का निवेश हुआ.
कृषि और खनन में $57.61 करोड़, जबकि बिजली, गैस और जल आपूर्ति में $52.47 करोड़ का विदेशी निवेश दर्ज किया गया.
क्या हैं इसके मायने?
आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि भारतीय कंपनियों का विदेशी गारंटी और इक्विटी बढ़ाना यह दर्शाता है कि वे केवल घरेलू बाज़ार तक सीमित नहीं रहना चाहतीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी मजबूत पकड़ बनाना चाहती हैं. विनिर्माण और ऊर्जा क्षेत्र की कंपनियों का आक्रामक विस्तार यह संकेत देता है कि भारत से बहुराष्ट्रीय कंपनियों का उभरना अब एक दीर्घकालिक रुझान बन चुका है.
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