भारत के बड़े शहरों में अपना घर खरीदना लगातार महंगा होता जा रहा है. लेकिन घरों की कीमत बढ़ने की वजह केवल सीमेंट, स्टील और मज़दूरी की बढ़ती लागत नहीं है. पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि मकानों की कीमत निर्माण लागत की तुलना में काफी तेज गति से बढ़ी है.
रियल एस्टेट सलाहकार कंपनी ANAROCK के अनुसार, 2021 से 2025 के बीच देश के सात प्रमुख शहरों में आवासीय संपत्तियों की औसत कीमत 59% बढ़ी. इसी अवधि में घर बनाने की औसत निर्माण लागत में 34% की वृद्धि हुई. 58 लाख का घर 92 लाख रुपये का हुआ
2021 में प्रमुख शहरों में आवासीय संपत्तियों की औसत कीमत करीब 5,826 रुपये प्रति वर्ग फुट थी. 2025 में यह बढ़कर 9,260 रुपये प्रति वर्ग फुट हो गई.
इसका सीधा असर समझने के लिए 1,000 वर्ग फुट के घर का उदाहरण लें. 2021 में इसकी औसत कीमत करीब 58.3 लाख रुपये बैठती थी. 2025 में इसी औसत दर पर इसकी कीमत बढ़कर करीब 92.6 लाख रुपये हो गई. यानी पांच साल में कीमत में करीब 34 लाख रुपये का अंतर आया.
निर्माण लागत इतनी नहीं बढ़ी
अब दूसरी तरफ निर्माण लागत को देखें. 2021 में एक सामान्य से बेहतर आवासीय परियोजना को बनाने की औसत लागत करीब 2,681 रुपये प्रति वर्ग फुट थी. 2025 में यह बढ़कर 3,604 रुपये प्रति वर्ग फुट हो गई.
यानी निर्माण लागत में लगभग 34% की वृद्धि हुई, जबकि मकानों की बिक्री कीमत 59% बढ़ गई. वार्षिक आधार पर मकानों की कीमत करीब 12% की दर से बढ़ी, जबकि निर्माण लागत की वृद्धि दर करीब 6.9% रही.
ये भी पढ़ें: अगस्त में ऑटो बाजार ने बनाया नया रिकॉर्ड, पेट्रोल को पहली बार पीछे छोड़ गए वैकल्पिक ईंधन
फिर घर इतने महंगे क्यों हुए?
ANAROCK के अनुसार, मकानों की कीमत में हुई वृद्धि का करीब 66% हिस्सा निर्माण खर्च से जुड़ा है. लेकिन बाकी 34% वृद्धि के पीछे जमीन की कीमत, डेवलपर का मार्जिन और मांग-आपूर्ति जैसे कारण हैं. खास तौर पर जमीन की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हुई है. 2021 से 2026 की पहली छमाही तक सात प्रमुख शहरों में जमीन की कीमतें लगभग 50% से 120% तक बढ़ीं.
दिल्ली-एनसीआर में जमीन के दाम करीब 70% से 130%, जबकि बेंगलुरु में 60% से 120% तक बढ़ने का अनुमान है. बेहतर सड़क, मेट्रो और दूसरी बुनियादी सुविधाओं वाले इलाकों में जमीन की कीमतों पर इसका असर और ज्यादा पड़ा है.
पश्चिम एशिया का तनाव भी बढ़ा रहा है लागत
घर बनाने की लागत पर अब पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का भी असर पड़ रहा है. ANAROCK का अनुमान है कि इस संकट ने निर्माण लागत पर 8% से 10% तक अतिरिक्त दबाव डाला है.
स्टील की कीमत करीब 20% बढ़ी है और टीएमटी सरिया की कीमत लगभग 72,000 रुपये प्रति टन तक पहुंच गई है. ईंधन और निर्माण स्थल से जुड़ी परिवहन लागत में 15% से 20% की वृद्धि हुई है.
टाइल, कांच और हार्डवेयर जैसे तैयार माल की कीमतें भी 8% से 12% बढ़ी हैं. बिजली, प्लंबिंग और दूसरी तकनीकी सेवाओं से जुड़ी MEP लागत में 9% से 13% की वृद्धि हुई है.
सबसे ज्यादा असर आम खरीदार पर
बढ़ती जमीन और निर्माण लागत का सबसे बड़ा असर उन लोगों पर पड़ रहा है जो पहली बार घर खरीदना चाहते हैं. कीमत बढ़ने का मतलब है कि खरीदार को ज्यादा अग्रिम राशि जुटानी होगी और बड़ा गृह ऋण लेना पड़ेगा. इससे मासिक ईएमआई भी बढ़ेगी.
दूसरी तरफ डेवलपर भी दबाव में हैं. जिन परियोजनाओं के घर पहले ही बिक चुके हैं, उनमें बढ़ी हुई लागत को ग्राहकों पर डालना आसान नहीं है. इससे डेवलपर का मुनाफा घट सकता है. नई परियोजनाओं में कीमत बढ़ाने की गुंजाइश जरूर है, लेकिन मध्यम और कम आय वाले खरीदारों की क्षमता इसकी सीमा तय करती है.
यानी आने वाले समय में घरों की कीमत का सवाल सिर्फ निर्माण सामग्री की महंगाई का नहीं रहेगा. जमीन की कीमत, शहरों का विस्तार, बुनियादी ढांचा, मांग और डेवलपर की लागत ये सभी मिलकर तय करेंगे कि आम आदमी के लिए अपना घर कितना महंगा होगा.
ये भी पढ़ें: GDP Growth पर उठे सवालों के बीच सरकार की सफाई, 7.8% बनाम 2.6% की बहस में क्या है पूरा मामला?
"भारत के बड़े शहरों में अपना घर खरीदना लगातार महंगा होता जा रहा है. लेकिन घरों की कीमत बढ़ने की वजह केवल सीमेंट, स्टील और मज़दूरी की बढ़ती ला…"
