दांतों को स्वस्थ रखने की बात आती है तो सबसे पहले ब्रश, फ्लॉस और माउथवॉश का ख्याल आता है. लेकिन सिर्फ इतना ही काफी नहीं है.

हम क्या खाते हैं, इसका असर हमारे दांतों और मुंह की सेहत पर भी पड़ता है.

यह तो हम सभी जानते हैं कि ज्यादा मीठा खाने से दांतों में कैविटी हो सकती है. इसकी वजह मुंह में मौजूद कुछ बैक्टीरिया हैं. ये चीनी का इस्तेमाल करके एसिड बनाते हैं. यही एसिड धीरे-धीरे दांतों की ऊपरी परत यानी इनेमल को नुकसान पहुंचाता है.

लेकिन बात सिर्फ इस पर नहीं है कि हमें क्या नहीं खाना चाहिए. यह भी जरूरी है कि हम अपनी डाइट में क्या शामिल करते हैं.

कुछ फल, चाय, चीज़ और फर्मेंटेड फूड मुंह में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया के लिए फायदेमंद हो सकते हैं.

मुंह के अंदर भी होती है बैक्टीरिया की एक दुनिया

हमारे मुंह में करीब 700 तरह के बैक्टीरिया पाए जाते हैं. इसके अलावा वायरस, फंगस और कई दूसरे सूक्ष्मजीव भी मौजूद होते हैं. इन सभी को मिलाकर ओरल माइक्रोबायोम कहा जाता है.

हर सूक्ष्मजीव की अपनी जगह होती है. कुछ दांतों पर रहते हैं. कुछ जीभ पर होते हैं. वहीं कुछ दांतों और मसूड़ों के बीच की छोटी जगहों में पाए जाते हैं.

इनमें कुछ बैक्टीरिया हमारे लिए नुकसानदेह होते हैं.

उदाहरण के लिए, स्ट्रेप्टोकोकस म्यूटन्स दांतों की सतह पर पाया जाता है. इसे चीनी पसंद होती है. यह चीनी को एसिड में बदल देता है.

यह एसिड धीरे-धीरे दांतों के इनेमल को नुकसान पहुंचाता है. लंबे समय में इससे दांतों में कैविटी हो सकती है.

लेकिन मुंह में सिर्फ नुकसान पहुंचाने वाले बैक्टीरिया नहीं होते.

वेयलोनेला, एक्टिनोमाइसीस और स्ट्रेप्टोकोकस और नाइसेरिया की कुछ प्रजातियां फायदेमंद हो सकती हैं. ये नुकसानदेह बैक्टीरिया को मुंह में ज्यादा बढ़ने से रोकने में मदद कर सकते हैं.

यानी हमारे मुंह में अच्छे और नुकसानदेह बैक्टीरिया के बीच लगातार एक तरह का संतुलन बना रहता है.

जब मुंह का बैक्टीरियल संतुलन बिगड़ता है

दांत बाहर से भले ही चिकने दिखाई दें, लेकिन बहुत छोटे स्तर पर उनकी सतह पर कई दरारें और खांचे होते हैं. यही जगहें बैक्टीरिया के लिए रहने की जगह बन सकती हैं.

अगर दांतों की ठीक से सफाई न की जाए तो दांतों और मसूड़ों के बीच छोटी-छोटी जेब जैसी जगहें बन सकती हैं.

इन जगहों पर ऑक्सीजन कम होती है. ऐसे माहौल में पॉर्फाइरोमोनास जिंजिवालिस जैसे बैक्टीरिया बढ़ सकते हैं. यह बैक्टीरिया मसूड़ों की बीमारी से जुड़ा है.

रिसर्च में मुंह के खराब बैक्टीरियल संतुलन को दिल की बीमारी, डायबिटीज, डिप्रेशन, अल्जाइमर, रूमेटाइड आर्थराइटिस और कुछ दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं से भी जोड़ा गया है.

हाल के वर्षों में ओरल माइक्रोबायोम और आंत और अग्न्याशय के कैंसर के बीच संभावित संबंध को लेकर भी रिसर्च हुई है.

एक स्टडी में वैज्ञानिकों ने लोगों की लार में मौजूद सूक्ष्मजीवों की जांच की. बाद में उनके कैंसर के जोखिम को देखा गया.

जिन लोगों के मुंह में दांतों की सड़न से जुड़े कुछ बैक्टीरिया या कैंडिडा यीस्ट पाए गए, उनमें अग्न्याशय के कैंसर का जोखिम ज्यादा देखा गया.

हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि ये बैक्टीरिया सीधे कैंसर का कारण बनते हैं. वैज्ञानिक अभी इनके बीच के संबंध को समझने की कोशिश कर रहे हैं.

वैज्ञानिकों के मुताबिक, मुंह में अलग-अलग तरह के सूक्ष्मजीवों का होना अच्छी बात हो सकती है. माइक्रोबायोम में जितनी ज्यादा विविधता होगी, उसका संतुलन उतना बेहतर हो सकता है.

सिर्फ ब्रश करना ही काफी नहीं

यहां एक बात समझना जरूरी है.

सिर्फ दांतों को ब्रश करने से ओरल माइक्रोबायोम पूरी तरह स्वस्थ नहीं रहता.

क्योंकि हम जो खाते हैं, उसका असर मुंह में रहने वाले बैक्टीरिया पर भी पड़ता है.

हमारी डाइट यह तय करने में भूमिका निभा सकती है कि मुंह में कौन से बैक्टीरिया ज्यादा बढ़ेंगे और कौन से कम होंगे.

सबसे पहले ज्यादा चीनी वाली चीजों को कम करना चाहिए. कैविटी पैदा करने वाले बैक्टीरिया चीनी का आसानी से इस्तेमाल करते हैं.

प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट भी कम लेना बेहतर है. इनमें सफेद ब्रेड, बिस्किट, केक, क्रैकर्स और प्रेट्ज़ेल जैसे खाद्य पदार्थ शामिल हैं.

दूसरी तरफ, फायदेमंद बैक्टीरिया को बढ़ावा देने वाली चीजें खाना भी मदद कर सकता है.

अच्छे बैक्टीरिया नुकसानदेह बैक्टीरिया के साथ खाने और जगह के लिए मुकाबला करते हैं. इससे नुकसानदेह बैक्टीरिया के लिए बढ़ना मुश्किल हो सकता है.

कुछ अच्छे बैक्टीरिया ऐसे पदार्थ भी बनाते हैं, जो नुकसानदेह सूक्ष्मजीवों पर असर डाल सकते हैं.

हरी सब्जियां क्यों हो सकती हैं फायदेमंद?

अगर आप अपने ओरल माइक्रोबायोम को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो हरी पत्तेदार सब्जियों को डाइट में शामिल करना अच्छा विकल्प हो सकता है.

केला, पालक, चुकंदर और मूली जैसी चीजों में नाइट्रेट पाया जाता है.

मुंह में मौजूद कुछ बैक्टीरिया नाइट्रेट को नाइट्राइट में बदलते हैं. इसके बाद शरीर में इससे ऐसे पदार्थ बन सकते हैं, जिनसे नाइट्रिक ऑक्साइड तैयार होता है.

नाइट्रिक ऑक्साइड रक्त वाहिकाओं को फैलाने में मदद करता है. इससे ब्लड प्रेशर कम करने और दिल और रक्त वाहिकाओं की सेहत में मदद मिल सकती है.

एक स्टडी में ज्यादा उम्र के लोगों को दो हफ्तों तक दिन में दो बार नाइट्रेट से भरपूर चुकंदर का जूस दिया गया. इस दौरान उनके ब्लड प्रेशर में कमी देखी गई.

लहसुन भी एक दिलचस्प उदाहरण है.

लहसुन खाने से सांसों में बदबू हो सकती है. लेकिन इसमें एलिसिन नाम का एक रसायन होता है. यह कैविटी और मसूड़ों की बीमारी से जुड़े कुछ बैक्टीरिया पर असर डाल सकता है.

चाय और फलों में मौजूद पॉलीफेनॉल भी काम के

पौधों से मिलने वाले कई खाद्य पदार्थों में पॉलीफेनॉल नाम के प्राकृतिक पदार्थ पाए जाते हैं.

ये एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करते हैं. ये पौधों को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं.

इनका फायदा इंसानों को भी मिल सकता है.

रिसर्च में पाया गया है कि चाय में मौजूद पॉलीफेनॉल कैविटी और मसूड़ों की बीमारी से जुड़े कुछ नुकसानदेह बैक्टीरिया को दबाने में मदद कर सकते हैं.

ये बैक्टीरिया को आपस में चिपकने और दांतों पर जमा होने से भी रोक सकते हैं.

कुछ फलों, खासकर गहरे रंग वाले बेरीज में भी पॉलीफेनॉल अच्छी मात्रा में होते हैं.

क्रैनबेरी जूस को लेकर हुई रिसर्च में भी पाया गया कि यह दांतों पर प्लाक बनने को कम करने में मदद कर सकता है. साथ ही, यह कैविटी और मसूड़ों की बीमारी से जुड़े कुछ बैक्टीरिया के विकास को सीमित कर सकता है.

शहद में भी पॉलीफेनॉल पाए जाते हैं. कुछ अध्ययनों में इसे प्लाक और कैविटी से जुड़े बैक्टीरिया के खिलाफ मददगार पाया गया है.

चीज़ और फर्मेंटेड फूड भी हो सकते हैं मददगार

चीज़ भी मुंह के माइक्रोबायोम के लिए फायदेमंद हो सकती है.

इटली में हुए एक छोटे अध्ययन में नौ लोगों को लगातार पांच दिनों तक रोजाना ग्राना पडानो चीज़ दी गई.

अध्ययन के बाद उनके मुंह में मौजूद बैक्टीरिया के समुदाय में कुछ बदलाव देखे गए.

कैविटी से जुड़े एस. म्यूटन्स की मात्रा कम हुई. वहीं, स्वस्थ मुंह में पाए जाने वाले एस. सेंग्विनिस की मात्रा बढ़ी.

चीज़ का एक और फायदा है.

इसे चबाने से मुंह में ज्यादा लार बनती है. लार मुंह से अतिरिक्त चीनी हटाने में मदद करती है. साथ ही, यह एसिड के असर को भी कम करती है.

फर्मेंटेड फूड भी मददगार हो सकते हैं. इनमें ऐसे अच्छे बैक्टीरिया होते हैं, जो नुकसानदेह बैक्टीरिया से मुकाबला करते हैं.

उदाहरण के लिए, केफिर पर हुई रिसर्च में पाया गया कि यह कुछ नुकसानदेह ओरल बैक्टीरिया के विकास को रोक सकता है. यह बैक्टीरिया को चिपचिपी परत यानी बायोफिल्म बनाने से भी रोक सकता है.

कोई एक 'सुपरफूड' नहीं है

ओरल हेल्थ के लिए ऐसा कोई एक खाना नहीं है जिसे सुपरफूड कहा जा सके.

सबसे ज्यादा मायने रखता है कि हमारी पूरी डाइट कैसी है.

अगर हम बार-बार रिफाइंड चीनी और ऐसे कार्बोहाइड्रेट खाते हैं जिन्हें मुंह के बैक्टीरिया आसानी से तोड़ सकते हैं, तो इससे एसिड बनाने वाले बैक्टीरिया को बढ़ावा मिल सकता है.

इससे समय के साथ मुंह में मौजूद बैक्टीरिया का संतुलन बिगड़ सकता है.

इसके उलट, अगर डाइट में साबुत फल, सब्जियां, फाइबर, दालें और साबुत अनाज ज्यादा हों और रिफाइंड चीनी कम हो, तो यह ओरल माइक्रोबायोम के लिए बेहतर हो सकता है.

आसान भाषा में कहें तो रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट की जगह सब्जियां, साबुत फल, दालें और साबुत अनाज खाना बेहतर विकल्प हो सकता है.

मेडिटेरेनियन डाइट इसका एक उदाहरण है. इसमें फल, सब्जियां, साबुत अनाज और हेल्दी फैट को ज्यादा जगह दी जाती है.

एक हालिया स्टडी में पाया गया कि इस डाइट को ज्यादा फॉलो करने वाले लोगों में मसूड़ों की बीमारी कम गंभीर थी.

हालांकि, लाल मांस और मसूड़ों की बीमारी के बीच संबंध क्यों है, इसे लेकर अभी और रिसर्च की जरूरत है.

अच्छी डाइट के साथ ब्रश और फ्लॉस भी जरूरी

खाने की आदतें अच्छी होने के बावजूद ब्रश और फ्लॉस करना जरूरी है.

फ्लॉसिंग को कैविटी से जुड़े एस. म्यूटन्स जैसे बैक्टीरिया की कम मात्रा से जोड़ा गया है.

वहीं, दांतों और जीभ को ब्रश करने से दांतों और मसूड़ों की बीमारी से जुड़े बैक्टीरिया कम करने में मदद मिल सकती है.

माउथवॉश को लेकर अभी वैज्ञानिक यह पूरी तरह नहीं जानते कि आम माउथवॉश लंबे समय में ओरल माइक्रोबायोम पर क्या असर डालते हैं.

कुछ क्लोरहेक्सिडीन वाले माउथवॉश मुंह में मौजूद बैक्टीरिया के संतुलन को बिगाड़ सकते हैं. हालांकि, मसूड़ों की बीमारी और कुछ दूसरी ओरल समस्याओं के इलाज में डॉक्टर इन्हें थोड़े समय के लिए इस्तेमाल करने की सलाह दे सकते हैं.

तो मुंह के अच्छे बैक्टीरिया के लिए क्या खाएं?

इसके लिए किसी एक खास सुपरफूड की जरूरत नहीं है.

सबसे जरूरी है कि आपकी पूरी डाइट संतुलित हो.

हरी पत्तेदार सब्जियां ज्यादा खाएं. साबुत फल, दालें और साबुत अनाज डाइट में शामिल करें. पर्याप्त प्रोटीन भी लें.

चीज़, चाय और फर्मेंटेड फूड भी संतुलित डाइट का हिस्सा हो सकते हैं.

वहीं, मीठे पेय और बार-बार खाई जाने वाली चीनी वाली चीजों को कम करना बेहतर है.

और सबसे जरूरी बात—ब्रश और फ्लॉस करना न भूलें.

क्योंकि हमारे मुंह में रहने वाले ये छोटे-छोटे जीव दिखाई नहीं देते. लेकिन हम जो खाते हैं, उसका असर उन पर भी पड़ता है.

इसलिए अगली बार जब आपकी प्लेट में हरी सब्जियां, थोड़ा चीज़ और साथ में एक कप चाय हो, तो याद रखिए यह सिर्फ आपके शरीर के लिए नहीं है.

आपके मुंह में रहने वाले अच्छे बैक्टीरिया को भी इससे फायदा मिल सकता है.


 

" दांतों को स्वस्थ रखने की बात आती है तो सबसे पहले ब्रश, फ्लॉस और माउथवॉश का ख्याल आता है. लेकिन सिर्फ इतना ही काफी नहीं है.हम क्या खाते हैं,…"