चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफ़नामे में कहा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े बड़े फ़ैसले मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों ने मिलकर लिए थे. आयोग का यह भी कहना है कि हलफ़नामा खुद तीनों सदस्यों के सर्वसम्मत फ़ैसले के बाद दाखिल किया गया है. लेकिन इंडियन एक्सप्रेस के विश्लेषण के मुताबिक असल सवाल यह नहीं है कि फ़ैसलों को बाद में मंज़ूरी मिली या नहीं, बल्कि यह है कि क्या दोनों आयुक्तों को आयोग के नाम पर हो रही कार्रवाइयों की जानकारी पहले से दी जा रही थी.

हलफ़नामा और उसकी पृष्ठभूमि
यह हलफ़नामा उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरु ने दाखिल किया है. यह राहुल गांधी और विपक्ष के अन्य नेताओं की उन याचिकाओं के जवाब में आया है, जो इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के आधार पर दायर हुई थीं. रिपोर्ट में कहा गया था कि आयुक्त एस. एस. संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े मुद्दों पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से मतभेद के चलते कैबिनेट सचिव से संपर्क किया था. विपक्ष का आरोप है कि ज्ञानेश कुमार ने सरकार के कहने पर अकेले SIR का फ़ैसला किया. 

आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया है. उसके अनुसार 24 जून 2025 को देशभर में SIR कराने का फ़ैसला तीनों सदस्यों ने सर्वसम्मति से लिया था और उसमें कोई मतभेद नहीं था. कैबिनेट सचिव को लिखे गए पत्रों के बारे में आयोग का कहना है कि उनके आधार पर लगाए गए आरोप ग़लत समझ पर टिके हैं और पत्र प्रशासनिक मामलों से जुड़े थे.

नोट्स की हैसियत पर आयोग का तर्क
हलफ़नामे में कहा गया है कि फ़ैसले की प्रक्रिया में मुख्य चुनाव आयुक्त, आयुक्त या किसी अधिकारी की अलग राय सामने आ सकती है, पर सभी राय पर विचार के बाद ही फ़ैसला होता है. आयोग के मुताबिक किसी आयुक्त का सुझाव, टिप्पणी या सवाल 2023 के क़ानून की धारा 18 के तहत आयोग का फ़ैसला नहीं माना जाता. क़ानून सर्वसम्मति को प्राथमिकता देता है, पर तीन सदस्यों के आयोग में बहुमत से फ़ैसले का रास्ता भी खुला रखता है.

इंडियन एक्सप्रेस का कहना है कि यह दलील तब पूरा जवाब होती, जब दोनों आयुक्तों ने फ़ैसलों से पहले आपत्ति दर्ज की होती. अख़बार के मुताबिक दस महीनों में दर्ज 14 नोट्स में से ज़्यादातर फ़ैसलों के बाद लिखे गए. यानी फ़ैसला हो चुका था, सिस्टम बन चुका था, आदेश जारी हो चुका था या मामला दाखिल हो चुका था, और नोट में दर्ज है कि आयुक्तों को इसकी जानकारी नहीं दी गई.

फ़ॉर्म 6 का विवाद
फ़ॉर्म 6 मतदाता सूची में नाम जुड़वाने का वैधानिक फ़ॉर्म है. आयोग ने हलफ़नामे में कहा है कि इसे केवल केंद्र सरकार बदल सकती है और SIR आदेशों से इसमें कोई संशोधन नहीं हुआ. उसके अनुसार SIR में सिर्फ़ एक घोषणा-पत्र जोड़ा गया, जिससे दावे और आपत्ति की अवधि में मतदाता को दस्तावेज़ देने की ज़रूरत नहीं पड़ती. आयोग इसे फ़ॉर्म 6 से अलग दस्तावेज़ बताता है.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक मई में जोशी ने दर्ज किया था कि नियमों में संशोधन के बिना फ़ॉर्म नहीं बदला जा सकता, और संधू ने इससे सहमति जताई थी. फिर भी जुलाई में ऑनलाइन फ़ॉर्म में बदलाव हुआ. संधू को इसका पता अख़बार की रिपोर्ट से चला और अगस्त में उन्होंने घोषणा को ‘अनधिकृत और अवैध’ लिखा. हलफ़नामा खुद मानता है कि ऑनलाइन घोषणा जिस रूप में दिखी, उससे ऐसा लग सकता था कि फ़ॉर्म 6 बदल दिया गया है, और कुछ कदमों को सुधारने की ज़रूरत है. आयोग के ER डिवीज़न ने 21 अक्टूबर को ऑनलाइन प्रक्रिया में फ़ॉर्म 6 और SIR घोषणा को अलग करने का फ़ैसला किया है, पर हलफ़नामा यह नहीं बताता कि जुलाई में यह बदलाव किसने मंज़ूर किया.

ECINet, गोवा और तकनीकी सवाल
हलफ़नामे के अनुसार मतदाता सूची की क़ानूनी ज़िम्मेदारी निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) की है और उसके आदेश के बिना कोई नाम न जुड़ता है, न हटता है. आयोग ने IIT मुंबई और IISc बेंगलुरु के विशेषज्ञों वाली समिति और नए IT मॉड्यूल की पहले से जाँच की व्यवस्था की भी जानकारी दी है.

इंडियन एक्सप्रेस की पड़ताल के मुताबिक जोशी ने 29 मई को ही डेटाबेस के केंद्रीकरण पर चिंता जताकर IIT के बाहरी विशेषज्ञ वाली समिति का सुझाव दिया था. संधू ने जुलाई में इसका समर्थन किया था और 14 अगस्त को लिखा कि इन नोटों का क्या हुआ, यह उन्हें पता नहीं. हलफ़नामा समिति को सितंबर के फ़ैसले के रूप में पेश करता है और मई के सुझाव का ज़िक्र नहीं करता. अप्रैल में संधू ने यह भी दर्ज किया था कि IT विभाग ने कई नए मॉड्यूल और पोर्टल बना दिए, जो आयोग के सामने लाए ही नहीं गए, और उन्हें इसकी जानकारी सिर्फ़ मीडिया से मिली.

गोवा का मामला इसकी मिसाल है. आयोग के मुताबिक 97 मतदाताओं के नाम हटने के आरोप की जाँच में BLO के घर-घर जाने पर पता चला कि 97 में से 88 पहले ही फ़ॉर्म 6 भर चुके थे. बाकी नौ में से छह देश से बाहर थे और तीन के पास पुर्तगाली पासपोर्ट था. लेकिन अख़बार के मुताबिक यह बाद की घटना है. फ़रवरी में राज्य के चुनाव कार्यालय ने सात दिन में आठ बार अनुरोध किया था कि सॉफ़्टवेयर हटाए गए नाम बहाल करने दे, और आयोग के अपने उप चुनाव आयुक्त ने लिखा था कि ‘IT सिस्टम ज़रूरी कार्रवाई को रोक नहीं सकता.’ हलफ़नामा यह नहीं बताता कि फ़रवरी में सॉफ़्टवेयर ने ऐसा क्यों नहीं होने दिया.

पश्चिम बंगाल की अपीलें
हलफ़नामे में कहा गया है कि मतदाताओं को सूची में बहाल करने वाले आदेशों के ख़िलाफ़ अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के अधिकारियों ने दायर कीं और ये मामले ‘आयोग के सामने नहीं लाए गए.’ आयोग का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत अधिकारियों को इसका अधिकार था.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 7 अगस्त को जोशी के कार्यालय ने इस पर ‘तथ्यात्मक स्थिति’ माँगी थी. पाँच दिन बाद संधू ने पाँच सवाल पूछे और दर्ज किया कि जोशी के पास ब्योरा नहीं है. संधू के नोट में यह भी है कि बंगाल की मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने कहा था कि उन्हें भी इसकी जानकारी नहीं है. अब हलफ़नामा कहता है कि अपीलें उन्हीं के कार्यालय के अधिकारियों ने दायर कीं और 22 अक्टूबर के पत्र का हवाला देता है. यह भी नहीं बताया गया कि लाखों अपीलें लगभग एक जैसे आधारों पर कैसे दायर हुईं, क्या किसी मामले की अलग से जाँच हुई, और इतना बड़ा काम आयोग के नाम पर, आयोग को बताए बिना कैसे चला.

जुलाई का आदेश और दस्तावेज़ों का मुद्दा
आयोग के मुताबिक 28 जुलाई को प्रतिनियुक्ति पर आए अतिरिक्त सचिव स्तर के एक IAS अधिकारी ने काम के आंतरिक बँटवारे का आदेश जारी किया. 29 जुलाई को दोनों आयुक्तों ने इस आदेश और अधिकारी के आचरण पर कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे. 30 जुलाई के संयुक्त निर्देश के बाद वह आदेश कभी लागू नहीं हुआ.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार यही एक मौक़ा था, जब दोनों आयुक्तों ने सवाल पूछने के बजाय कार्रवाई की. जोशी के पत्र में दर्ज है कि प्रशासन विभाग से फ़ाइल माँगने पर वह उन्हें नहीं दी गई. 

आंतरिक दस्तावेज़ों के बारे में आयोग ने कहा है कि उसने कोई नोट या फ़ाइल किसी समाचार एजेंसी को जारी या अधिकृत नहीं की. 

अब यह हलफ़नामा सुप्रीम कोर्ट में आयोग का सामूहिक पक्ष है. कसौटी यह होगी कि उसमें बताए गए स्पष्टीकरण और सुधार के कदम रिकॉर्ड में दर्ज ख़ास सवालों का जवाब देते हैं या नहीं. दोनों आयुक्तों की चिंता बार-बार इसी बात पर थी कि फ़ैसले हो जाने के बाद उन्हें पता चला. इंडियन एक्सप्रेस के विश्लेषण के मुताबिक आयोग को अब भी इसी का जवाब देना है. 

 

-ममता सिंह 

"चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफ़नामे में कहा है कि मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े बड़े फ़ैसले मुख्य चुनाव आय…"