बिहार की सियासत में एक बार फिर बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है. उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर मंडरा रहा संकट फिलहाल टलता नजर आ रहा है. बीजेपी ने इस संवैधानिक अड़चन को खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. इसी कड़ी में बीजेपी के विधान परिषद सदस्य (MLC) देवेश कुमार ने अपने पद से इस्तीफा देकर सियासी हलचल तेज कर दी है.
बिहार विधान परिषद के सभापति से मिलकर अपना इस्तीफा सौंपा है. उनका कार्यकाल 16 मार्च 2027 तक था. वह 17 मार्च 2021 को बिहार विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए थे. लेकिन अचानक दिए गए उनके इस्तीफे को मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर देखा जा रहा है.
देवेश कुमार के इस्तीफे के पीछे दीपक प्रकाश की एंट्री?
राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा है कि देवेश कुमार अपनी एमएलसी की सीट दीपक प्रकाश के लिए खाली कर रहे हैं. माना जा रहा है कि इसी सीट के जरिए राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) कोटे से मंत्री बने दीपक प्रकाश को विधान परिषद पहुंचाने की तैयारी है. दरअसल, हाल में हुए विधान परिषद चुनाव में दीपक प्रकाश को जगह नहीं मिल पाई थी. इसके कारण वे फिलहाल न तो विधानसभा के सदस्य हैं और न ही विधान परिषद के. ऐसे में उनके मंत्री पद पर संवैधानिक सवाल खड़े हो गए थे. बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि दीपक प्रकाश को जल्द से जल्द किसी सदन का सदस्य बनाया जाए, ताकि मंत्री पद को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान हो सके. देवेश कुमार के इस्तीफे को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है.
अनुच्छेद 164(4) को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मामला
सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 164(4) के संदर्भ में मामला तो चल रहा है, पर दीपक प्रकाश के मंत्री पद पर बने रहने को लेकर कानूनी विवाद अभी खत्म नहीं हुआ है. उनके दोबारा मंत्री बनने को चुनौती देते हुए कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है. याचिका में कहा गया है कि दीपक प्रकाश इस समय किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं, जिससे उनके मंत्री पद की शपथ लेने की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठता है. ये जानने के लिए कि मामला संविधान के अनुच्छेद 164(4) से कैसे जुड़ा है, ध्यान दें कि इसके अनुसार, अगर किसी को मंत्री बनाया जाता है और वो विधायक या विधान परिषद के सदस्य नहीं हैं, तो उसे छह महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना होता है. याचिकाकर्ता का कहना है कि दीपक प्रकाश ने पहली बार 20 नवंबर 2025 को मंत्री पद संभाला और फिर सरकार बदलने के बाद 7 मई 2026 को उन्होंने फिर से मंत्री पद की शपथ ली. याचिका में यह तर्क दिया गया है कि गैर-विधायक मंत्री के लिए तय छह महीने की समयसीमा दोबारा शुरू नहीं की जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बिहार सरकार, दीपक प्रकाश और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है और अदालत ने यह भी पूछा है कि जब दीपक प्रकाश किसी सदन के सदस्य नहीं हैं, तो वो छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री पद पर कैसे बने रह सकते हैं?
बीजेपी की रणनीति और आगे का रास्ता
सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के बाद, बीजेपी ने इस संवैधानिक मुश्किल को हल करने के लिए तेजी से अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. माना जा रहा है कि देवेश कुमार का इस्तीफा इसी दिशा में एक कदम है.
अब चर्चा है कि खाली हुई एमएलसी सीट के जरिए दीपक प्रकाश को विधान परिषद में भेजा जा सकता है. इसके अलावा, कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि मार्च 2027 में राज्यपाल कोटे से एक और सीट खाली होने पर भी उन्हें विधान परिषद में स्थान मिल सकता है.
वहीं, देवेश कुमार के इस्तीफे के बाद उन्हें संगठन या सरकार में किसी महत्वपूर्ण भूमिका देने की अटकलें भी बढ़ गई हैं.
उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका पर भी नजर
पूरे घटनाक्रम में उपेंद्र कुशवाहा की भूमिका पर चर्चा बनी हुई है. अभी तक तो उन्होंने एनडीए के खिलाफ कोई नाराजगी नहीं दिखाई है, लेकिन उनका राजनीतिक सफर कई बार नए समीकरणों और बड़े फैसलों का गवाह रहा है.
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बीजेपी और एनडीए आने वाले समय में कुशवाहा को केंद्र की राजनीति में बड़ा जिम्मेदारी देकर बिहार में नए समीकरण बनाने की कोशिश कर सकते हैं.
कुछ चर्चाओं की मानें, तो नीतीश कुमार द्वारा छोड़ी गई एमएलसी सीट दीपक प्रकाश को दी जा सकती है. इसके साथ ही, यह भी कहा जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा को केंद्र में मंत्री बनाकर बिहार की राजनीति में नई भूमिका दी जा सकती है.
इससे अलग, यह भी सुना जा रहा है कि उपेंद्र कुशवाहा की पत्नी विधायक पद से इस्तीफा दे सकती हैं, और उस सीट से दीपक प्रकाश चुनाव में उतर सकते हैं. बावजूद इसके, बीजेपी की अंतिम रणनीति क्या होगी, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है.
कौन हैं दीपक प्रकाश?
दीपक प्रकाश न तो विधायक रहे हैं और न ही बिहार विधान परिषद के सदस्य. फिर भी, राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने उन्हें राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) कोटे से मंत्री पद की शपथ दिलाई.
शपथ लेने के बाद, दीपक ने पत्रकारों से बातचीत में बताया कि उनके पिता उपेंद्र कुशवाहा उनके सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं और उन्होंने उनके प्रेरणा से ही राजनीति में कदम रखा. उन्होंने ये भी कहा कि मंत्री बनने की जानकारी उनके लिए भी अचानक आई थी.
राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अनुसार, दीपक प्रकाश का जन्म 1989 में हुआ और उन्होंने 2011 में सिक्किम मणिपाल यूनिवर्सिटी से बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने लगभग दो साल तक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में काम किया और फिर अपना खुद का काम शुरू किया.
पार्टी के दावों के मुताबिक, दीपक 2019-20 से राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन सार्वजनिक मंचों पर उनकी राजनीतिक सक्रियता ज्यादा दिखाई नहीं दी. इसी कारण मंत्री बनने के बाद उनके राजनीतिक अनुभव और पहचान को लेकर कई सवाल उठे हैं.
अब, देवेश कुमार के इस्तीफे ने दीपक प्रकाश के लिए विधान परिषद में पहुंचने का रास्ता थोड़ा आसान कर दिया है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई के चलते इस मामले पर अंतिम फैसला अभी आना बाकी है.
"बिहार की सियासत में एक बार फिर बड़ा सियासी घटनाक्रम सामने आया है. उपेंद्र कुशवाहा के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री दीपक प्रकाश के मंत्री पद…"
