भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी और पूंजी के प्रवाह को लेकर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ताजा आंकड़ों ने एक दिलचस्प रुझान उजागर किया है. एक तरफ जहाँ आम जनता और कारोबारी जगत में लेन-देन के लिए इस्तेमाल होने वाली नकदी में एक साल में 12.33% की मजबूती देखी गई है, वहीं दूसरी तरफ वाणिज्यिक बैंकों द्वारा RBI के पास जमा रखी जाने वाली राशि 12.20% घटी है. 

इन परस्पर विरोधी रुझानों के बावजूद, विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों में आई तेजी के दम पर देश की कुल Reserve Money (M0) में सालाना आधार पर 7.38% की वृद्धि दर्ज की गई है.

बाजार में नकदी का प्रवाह मजबूत

Reserve Money की वृद्धि में सबसे बड़ा योगदान चलन में मौजूद नकदी का रहा है. 31 अगस्त 2026 तक बाजार में घूम रही नकदी ₹42.86 लाख करोड़ रही, जो पिछले साल की इसी अवधि से ₹4.71 लाख करोड़ अधिक है. 

हालांकि, अगर पिछले पखवाड़े  से तुलना करें तो इसमें ₹4,727 करोड़ (0.11%) की मामूली गिरावट आई है, जो अल्पकालिक उतार-चढ़ाव को दर्शाती है. समग्र रूप से, सालाना आधार पर  डबल- डिजिट (12.33%) की वृद्धि यह बताती है कि अर्थव्यवस्था में खुदरा लेन-देन और नकद मांग मजबूत बनी हुई है.

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RBI के पास क्यों घटी बैंकों की जमा राशि?

आंकड़ों का सबसे ध्यान खींचने वाला पहलू यह है कि बैंकों द्वारा RBI के पास रखा जाने वाला पैसा घटा है. सालाना गिरावट: 31 अगस्त 2026 को यह आंकड़ा ₹8.68 लाख करोड़ रहा, जो एक साल पहले की तुलना में ₹1.21 लाख करोड़ (12.20%) कम है. हालांकि, पिछले पखवाड़े की तुलना में इसमें ₹42,296 करोड़ (5.12%) का सुधार ज़रूर देखा गया है. 

आम आदमी के लिए इसका क्या अर्थ है?

बैंकों की RBI में जमा राशि घटने का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि आम ग्राहकों के बैंक खातों का पैसा कम हो गया है. यह आंकड़ा केवल बैंकों के अंतर-बैंकिंग लिक्विडिटी प्रबंधन और RBI के पास अनिवार्य/अतिरिक्त रिजर्व (CRR आदि) के रूप में रखी जाने वाली लिक्विडिटी को दर्शाता है. सरल शब्दों में कहें तो बाजार में लेनदेन के लिए पैसे की कोई कमी नहीं है, लेकिन बैंकों और केंद्रीय बैंक के बीच की लिक्विडिटी व्यवस्था एक नए संतुलन की ओर इशारा कर रही है.

 

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