नई दिल्ली, 22 अगस्त: दिल्ली-एनसीआर में swine flu (H1N1) के मामलों में तेज़ी से इज़ाफ़ा हो रहा है. इस साल अब तक 1,700 से ज़्यादा कन्फ़र्म्ड केस सामने आ चुके हैं. यह आंकड़ा स्वास्थ्य अधिकारियों के हवाले से न्यूज़ एजेंसी पीटीआई ने शुक्रवार को जारी किया.

प्रदूषण के मौसम में स्वाइन फ्लू पहचानना क्यों मुश्किल हो गया है?
दिल्ली में हर साल सर्दियों की शुरुआत के साथ दो चीज़ें एक साथ आती हैं, ख़राब हवा और फ्लू का मौसम. दिक्क़त यह है कि दोनों के लक्षण लगभग एक जैसे दिखते हैं: खांसी, गले में जलन, और सांस लेने में तकलीफ़. 
यही ओवरलैप लोगों को (और कई बार डॉक्टरों को भी शुरुआती स्टेज पर) यह तय करने में उलझा देता है कि परेशानी प्रदूषण की वजह से है या वायरल इंफेक्शन की. नतीजा यह होता है कि जो 15 फ़ीसदी मरीज़ गंभीर स्थिति में जा सकते हैं, वे अक्सर सही समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते, क्योंकि वे अपनी खांसी को "बस प्रदूषण है" मानकर टाल देते हैं.

क्या है स्वाइन फ्लू
फोर्टिस गुरुग्राम में इंटरनल मेडिसिन के प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉक्टर सतीश कौल के मुताबिक़, H1N1 दरअसल इंफ्लुएंज़ा-A वायरस का ही एक सबटाइप है, जिसे आमतौर पर स्वाइन फ्लू कहा जाता है. इसी परिवार में H3N2 और H9N1 जैसे अन्य टाइप भी शामिल हैं.
यह वायरस शरीर में दाख़िल होकर नाक, गले और छाती यानी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट को प्रभावित करता है, और गंभीर स्थिति में निमोनिया व रेस्पिरेटरी फेल्योर तक की नौबत आ सकती है.

कैसे फैलता है यह वायरस
डॉक्टर कौल के अनुसार, H1N1 मुख्यतः ड्रॉपलेट इंफेक्शन से फैलता है, यानि खांसने-छींकने से निकलने वाली बूंदों के ज़रिए. ऑफिस या सार्वजनिक जगहों पर टेबल, दरवाज़े के हैंडल जैसी सतहों को छूने से भी यह वायरस एक व्यक्ति से दूसरे तक पहुंच सकता है.

दिल्ली विशेष रूप से क्यों प्रभावित
दिल्ली एक घनी आबादी वाला महानगर है, जहां सार्वजनिक परिवहन और बाज़ारों में भीड़ बहुत ज़्यादा रहती है, इससे ड्रॉपलेट इंफेक्शन का ख़तरा बढ़ जाता है. साथ ही, दिल्ली में डायबिटीज़, दिल और फेफड़ों की पुरानी बीमारी वाले लोग तथा बुज़ुर्ग और गर्भवती महिलाओं की बड़ी आबादी है, जिन्हें स्वाइन फ्लू से ज़्यादा ख़तरा रहता है, इसलिए यहां गंभीर मामले भी ज़्यादा दिखते हैं. 

बदलता मौसम भी है वजह 
डॉक्टरों के मुताबिक़, इस साल मानसून के दौरान दिल्ली-एनसीआर में उमस और तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव की वजह से H1N1 के मामलों में उछाल आया है, क्योंकि अधिक नमी और तापमान में बदलाव से संक्रमण तेज़ी से फैलते हैं. 
दिल्ली में हर साल दो सीज़न में केस बढ़ते देखे गए हैं, मानसून (जुलाई-अगस्त) और सर्दी (जनवरी-फ़रवरी), क्योंकि इन दोनों दौर में तापमान और नमी में तेज़ बदलाव होता है, जो वायरस को सक्रिय रहने में मदद करता है.

लक्षण: ज़्यादातर मामलों में मामूली, लेकिन 15% में ख़तरनाक
करीब 85% संक्रमित लोगों में सर्दी, खांसी, बुखार और बदन दर्द जैसे लक्षण दिखते हैं, जो 3-5 दिन में अपने आप ठीक हो जाते हैं, हालांकि खांसी और थकान एक-दो हफ़्ते तक बनी रह सकती है. प्रदूषण की वजह से इस साल यह अवधि और लंबी खिंच सकती है.

बाक़ी 15% मामलों में स्थिति गंभीर हो सकती है. डॉक्टर कौल के मुताबिक़, अगर सांस लेने में तकलीफ़, बलगम में ख़ून, हाथ-पैर नीले पड़ना या सांस की रफ़्तार बढ़ जाए, तो तुरंत अस्पताल की इमरजेंसी में दिखाना चाहिए. इसे नज़रअंदाज़ करना मरीज़ को ICU तक पहुंचा सकता है, और कुछ मामलों में जान भी जा सकती है.

कैसे करें बचाव?
ऐसे में सबसे ज़रूरी है कि लोग सतर्क रहें और शुरुआती लक्षणों को हल्के में न लें. भीड़भाड़ वाली जगहों पर मास्क पहनना और बार-बार हाथ धोना, ख़ासकर सार्वजनिक सतहों को छूने के बाद, संक्रमण से बचने का सबसे आसान तरीक़ा है. 
खांसते या छींकते वक़्त मुंह ढकना भी उतना ही ज़रूरी है, ताकि वायरस दूसरों तक न फैले. हल्के लक्षण दिखने पर भी लापरवाही बरतने के बजाय डॉक्टर से सलाह लेना बेहतर है, क्योंकि प्रदूषण भरे इस मौसम में लक्षणों को पहचानना पहले से ही मुश्किल हो गया है. 

 

-ममता सिंह 

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