केंद्र सरकार के नए प्रस्तावित नियमों को लेकर पशु अधिकार संगठनों का विरोध बढ़ गया है. सरकार ने 'पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला में इस्तेमाल होने वाले पशुओं के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार पर नियंत्रण और निगरानी) नियम, 2026' का मसौदा जारी किया है. इस पर आम लोगों और विशेषज्ञों से 5 नवंबर 2026 तक सुझाव और आपत्तियां मांगी गई हैं.
समय-सीमा नजदीक आने के साथ ही इस मसौदे के खिलाफ सोशल मीडिया पर अभियान तेज हो गया है. पीपल फॉर एनिमल्स (PFA), पीपल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (PETA) इंडिया और करुणा फाउंडेशन जैसे संगठनों ने लोगों से इस प्रस्ताव का विरोध करने की अपील की है. ये संगठन लोगों से सरकार की ईमेल आईडी cpcsea-mef@gov.in पर अपनी आपत्तियां भेजने को कह रहे हैं.
मंजूरी की प्रक्रिया आसान बनाना चाहती है सरकार
द ट्रिब्यून की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार इन नए नियमों के जरिए फार्मा कंपनियों, मेडिकल और शैक्षणिक संस्थानों में जानवरों पर होने वाले प्रयोगों की मंजूरी की प्रक्रिया आसान करना चाहती है. नए मसौदे में संस्थानों की अपनी समिति (IAEC) को कुछ तरह के प्रयोगों की मंजूरी देने का अधिकार देने की बात कही गई है. इससे हर प्रयोग के लिए केंद्रीय समिति से मंजूरी लेने की जरूरत कम हो सकती है और रिसर्च में लगने वाला समय बच सकता है.
मेनका गांधी ने भी जताया विरोध
पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) की संस्थापक और पूर्व केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी ने भी इस मसौदे का विरोध किया है. वह 1998 के पुराने नियमों का मसौदा तैयार करने वाली समिति की प्रमुख सदस्यों में शामिल थीं. उन्होंने बताया कि PFA इस मसौदे को लेकर अपनी आपत्तियां सरकार को भेज चुका है.
गांधी का कहना है कि नए मसौदे के कुछ नियम वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के खिलाफ हैं. इससे जानवरों को मिलने वाली मौजूदा सुरक्षा कमजोर हो सकती है. उनका मानना है कि इन नियमों से जानवरों पर होने वाले प्रयोगों की निगरानी की जिम्मेदारी सरकारी समिति के बजाय उन संस्थानों के पास ज्यादा चली जाएगी, जहां ये प्रयोग किए जाते हैं.
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पुराने और नए नियमों में क्या बदलेगा?
पुराने नियमों के तहत जानवरों पर होने वाले प्रयोगों की निगरानी और उन्हें मंजूरी देने में केंद्रीय समिति (CCSEA) की अहम भूमिका थी. नए मसौदे में संस्थानों के अंदर काम करने वाली समिति (IAEC) को ज्यादा अधिकार देने का प्रस्ताव है.
नए मसौदे के मुताबिक, हल्के और मध्यम स्तर के प्रयोगों को IAEC मंजूरी दे सकेगी. हालांकि, कुछ खास तरह के प्रयोगों के लिए केंद्रीय समिति (CCSEA) की मंजूरी जरूरी रहेगी. पशु अधिकार संगठनों को चिंता है कि इससे प्रयोग करने वाले संस्थानों की अपनी समितियों के पास ज्यादा अधिकार आ जाएंगे और निगरानी कमजोर हो सकती है.
जानवरों की खरीद पर भी उठे सवाल
जानवरों की खरीद को लेकर भी नए मसौदे में बदलाव का प्रस्ताव है. पुराने नियमों के तहत प्रयोगशालाओं को जानवर पंजीकृत ब्रीडर्स और विक्रेताओं से खरीदने से जुड़े नियमों का पालन करना होता था. नए मसौदे में कुछ खास परिस्थितियों में गैर-पंजीकृत संस्थानों या खुले बाजार से भी जानवर खरीदने की अनुमति देने की बात कही गई है. हालांकि, इसके लिए IAEC की पहले से मंजूरी और कुछ दूसरी शर्तें भी रखी गई हैं.
PETA इंडिया के विज्ञान एवं अनुसंधान नीति सलाहकार डॉ. नूपुर जैन ने भी इस मसौदे पर आपत्ति जताई है. पशु अधिकार संगठनों को डर है कि जानवरों की खरीद से जुड़े नियम आसान होने पर उन्हें गलत तरीके से पकड़कर प्रयोगशालाओं तक पहुंचाया जा सकता है.
सरकार का कहना है कि इन नए नियमों से दवाओं और वैज्ञानिक शोध से जुड़े प्रयोगों की मंजूरी जल्दी मिल सकेगी. इससे रिसर्च में होने वाली देरी कम होगी. वहीं, पशु अधिकार संगठनों का मानना है कि इन बदलावों से जानवरों की सुरक्षा पर असर पड़ सकता है. इसलिए वे सरकार से इस मसौदे को वापस लेने की मांग कर रहे हैं.
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"केंद्र सरकार के नए प्रस्तावित नियमों को लेकर पशु अधिकार संगठनों का विरोध बढ़ गया है. सरकार ने 'पशुओं के प्रति क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला में…"













