पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद से तृणमूल कांग्रेस के भीतर जो हलचल शुरू हुई थी वह अब खुलकर सामने आ गई है. जिस पार्टी ने इतने लंबे समय तक बंगाल पर राज किया वह अब अंदर से दरकती नजर आ रही है. 

हालात देखकर लग रहा है कि बंगाल में वही होने वाला है जो महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के साथ हुआ था. सरकार से बाहर हो जाने के बाद से ही ममता बनर्जी की पकड़ पार्टी पर कमजोर होती जा रही हैं.

चुनाव नतीजों ने पलट दी तस्वीर

हाल ही में आए विधानसभा चुनाव परिणामों में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटें जीतीं. वहीं ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) महज 80 सीटों पर सिमट गई. यह नतीजे पार्टी के लिए बड़ा झटका थे. इसके बाद 30 मई को टीएमसी ने एक बैठक बुलाई लेकिन 80 में से सिर्फ 20 विधायक ही पहुंचे. 

बाकी 60 विधायक नदारत रहे. पार्टी ने आधिकारिक तौर पर सफाई दी कि 29 तारीख को कल्याण बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले की वजह से विधायक कोलकाता नहीं पहुंच पाए. लेकिन सूत्रों की मानें तो असली वजह कुछ और ही है.

जाली हस्ताक्षर का मामला और दो विधायकों का निष्कासन

इसी बीच एक और विवाद सामने आया. टीएमसी के दो विधायकों ऋतब्रता बंदोपाध्याय और संदीपन साहा ने विधानसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर दावा किया कि उनके हस्ताक्षर जाली हैं. यह सुनते ही तृणमूल कांग्रेस ने दोनों विधायकों को पार्टी से निष्कासित कर दिया. इस मामले में अध्यक्ष ने सीआईडी (CID) जांच बैठा दी है. सीआईडी ने अभिषेक बनर्जी को बुलाया था लेकिन वह नहीं गए और समय मांगा. अब उन्हें 8 जून को फिर से बुलाया गया है.

50 विधायकों की बगावत, तीन बड़ी मांगें

निलंबित टीएमसी नेता रिजू दत्त ने खुलासा किया कि ऋतब्रता बंदोपाध्याय के नेतृत्व में करीब 50 तृणमूल विधायक एक होटल में मिले. फोन पर भी बातचीत हुई और शाम को विधायक छात्रावास में बैठक हुई. इसके बाद यह विधायक एकजुट होकर विधानसभा अध्यक्ष से मिले और तीन मांगें रखीं.

पहली मांग यह कि उनके पास दो तिहाई बहुमत है इसलिए असली तृणमूल कांग्रेस वही हैं. 

दूसरी मांग यह कि विपक्ष के नेता ऋतब्रता बंदोपाध्याय होने चाहिए न कि शोभनदेब चट्टोपाध्याय.

तीसरी मांग यह कि दो तिहाई बहुमत होने की वजह से पार्टी का चुनाव चिन्ह भी उनके पास होना चाहिए. 

यह वही फार्मूला है जो महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना के साथ अपनाया था.

अभिषेक और ममता दोनों पर निशाना

रिजू दत्ता ने साफ कहा कि अभिषेक बनर्जी को जिम्मेदारी लेनी होगी. जिन लोगों को अभिषेक बनर्जी ने हाथ पकड़कर पार्टी में लाया उन्होंने पार्टी को ही धोखा दिया. ममता बनर्जी को भी जिम्मेदारी लेनी होगी. उन्होंने यह भी कहा कि बागी विधायक आई-पैक से नाराज हैं और अभिषेक बनर्जी से नाराज हैं. 

आई-पैक वही चुनाव प्रबंधन कंपनी है जो बंगाल में ममता बनर्जी के लिए चुनाव संभाल रही थी. ममता बनर्जी के कहने पर ही अखिलेश यादव ने भी आई-पैक के साथ काम करने का फैसला लिया था लेकिन अब यूपी से भी खबर है कि उन्होंने आई-पैक से किनारा कर लिया है.

भाजपा फिलहाल तमाशा देख रही है

सूत्रों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी अभी इस मामले में सीधे दखल नहीं देना चाहती. वह देखना चाहती है कि लड़ाई कहां तक जाती है. अगर 80 में से 40 से ज्यादा विधायक बागी खेमे में आ गए तो वह अपना विधायक दल का नेता खुद चुन सकते हैं. उसके बाद भाजपा तय करेगी कि इन बागी विधायकों के साथ मिलकर क्या रणनीति बनानी है.

सांसदों को टूटने से बचाने की कोशिश

एक तरफ जहां ममता बनर्जी बागी विधायकों पर कार्रवाई कर रही हैं वहीं अपने सांसदों को लेकर वह नरम रुख अपना रही हैं. वजह यह है कि केंद्र सरकार महिला आरक्षण और परिसीमन को लेकर एक नया बिल लाने की तैयारी में है. ऐसे में ममता नहीं चाहतीं कि उनके सांसद उनसे दूर हों. लेकिन खबर यह भी है कि कई सांसद अभी भी भाजपा के संपर्क में हैं.

ममता बनर्जी ने 2 जून को एक बड़े प्रदर्शन का ऐलान किया है. अब देखना यह होगा कि क्या वह अपना बंगाल का किला बचा पाती हैं या फिर टीएमसी का वही हश्र होता है जो महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी का हुआ था.

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