भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की 62वीं बैठक 3 से 5 अगस्त 2026 तक आयोजित की गई. बैठक की अध्यक्षता आरबीआई के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने की. बैठक में डॉ. नागेश कुमार, श्री सौगत भट्टाचार्य, प्रो. राम सिंह, डॉ. पूनम गुप्ता और श्री इंद्रनील भट्टाचार्य शामिल हुए. वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, घरेलू महंगाई और विकास दर के आकलन के बाद समिति ने सर्वसम्मति से रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर यथावत रखने का निर्णय लिया. साथ ही मौद्रिक नीति का रुख भी यथावत रखा गया.
क्या होती है रेपो दर?
रेपो दर वह ब्याज दर होती है जिस पर भारतीय रिज़र्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक ऋण उपलब्ध कराता है. जब रेपो दर बढ़ती है तो बैंकों के लिए उधार लेना महंगा हो जाता है, जिसका असर होम लोन, ऑटो लोन और अन्य ऋणों की ब्याज दरों पर पड़ता है. वहीं रेपो दर घटने पर बैंकों की उधारी सस्ती होती है, जिससे आम लोगों को भी कम ब्याज दर पर ऋण मिलने की संभावना बढ़ जाती है.
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क्या-क्या रहेगा अपरिवर्तित?
एमपीसी के फैसले के अनुसार इस बार भी प्रमुख नीतिगत दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
- रेपो दर: 5.25 प्रतिशत
- स्थायी जमा सुविधा (SDF): 5.00 प्रतिशत
- सीमांत स्थायी सुविधा (MSF): 5.50 प्रतिशत
- बैंक रेट: 5.50 प्रतिशत
महंगाई क्यों बनी RBI की चिंता?
आरबीआई के अनुसार जून 2026 में खुदरा महंगाई (CPI) बढ़कर 4.4 प्रतिशत पर पहुंच गई. इसकी मुख्य वजह खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में तेजी रही. हालांकि, कोर महंगाई अभी भी अपेक्षाकृत नियंत्रित बनी हुई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि व्यापक स्तर पर मांग आधारित महंगाई का दबाव अभी सीमित है.
केंद्रीय बैंक का अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में औसत खुदरा महंगाई 5.0 प्रतिशत रह सकती है. दूसरी तिमाही में यह 4.7 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 5.9 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 5.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है. आरबीआई का मानना है कि एल-नीनो, कमजोर मानसून और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव आगे भी महंगाई को प्रभावित कर सकते हैं.
आम आदमी पर क्या होगा असर?
रेपो दर में कोई बदलाव नहीं होने से फिलहाल होम लोन, ऑटो लोन और अन्य ऋणों की EMI में तत्काल बदलाव की संभावना नहीं है. बैंक जमा पर मिलने वाली ब्याज दरों में भी निकट भविष्य में बड़े बदलाव की उम्मीद कम है.
हालांकि, यदि खाद्य पदार्थों और ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी जारी रहती है तो रोजमर्रा की वस्तुएं महंगी हो सकती हैं. इसका असर विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के मासिक बजट पर पड़ सकता है.
वैश्विक जोखिमों पर RBI की नजर
आरबीआई ने कहा है कि आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था पर कई बाहरी जोखिमों का असर पड़ सकता है. इनमें प्रमुख हैं-
- पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव
- कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव
- एल-नीनो और कमजोर मानसून
- वैश्विक व्यापार और सप्लाई चेन से जुड़ी अनिश्चितताएँ
इन्हीं जोखिमों को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने फिलहाल ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने का फैसला किया है.
वास्तविक GDP का अनुमान
आरबीआई ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है. पहली तिमाही में 7.0 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.4 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान है.
केंद्रीय बैंक का मानना है कि मजबूत घरेलू मांग, बुनियादी ढांचा निवेश और सेवा क्षेत्र की वृद्धि अर्थव्यवस्था को सहारा देती रहेगी, हालांकि वैश्विक परिस्थितियां अब भी चुनौती बनी हुई हैं.
आरबीआई ने इस बार स्पष्ट संकेत दिया है कि उसकी प्राथमिकता महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक वृद्धि को समर्थन देना है. फिलहाल केंद्रीय बैंक ने 'वेट एंड वॉच' की रणनीति अपनाई है. यदि आने वाले महीनों में महंगाई, मानसून और वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव होता है तो अक्टूबर 2026 की अगली मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों पर नया फैसला लिया जा सकता है.
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