उत्तर प्रदेश के पीलीभीत विधानसभा क्षेत्र में हज़ारों मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाकर उनकी जगह फर्जी पहचान डाल दी गई. यह दावा The Reporters Collective की जांच का है, जिसके मुताबिक यह सब राज्य में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) खत्म होने के बाद हुआ. अगर विपक्षी दल इसे न पकड़ते, तो ये फर्जी वोटर आने वाले चुनाव में वोट डाल सकते थे. 

22 अक्टूबर को उत्तर प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) ने माना कि मतदाताओं के नाम बिना औपचारिक आवेदन के बदले गए. ऐसे आवेदन ज़रूरी होते हैं, क्योंकि इन्हीं से बदलाव का कागज़ी सबूत और कारण दर्ज होता है. कलेक्टिव का कहना है कि CEO के इस कबूलनामे के आठ दिन बाद भी उसके पहचाने गए 2,691 में से 2,638 फर्जी नाम पीलीभीत की वोटर लिस्ट में मौजूद थे. 

सिर्फ 55 बूथ की जांच में 2,691 नाम
पीलीभीत के 419 में से 55 बूथों का डेटा खंगालकर उन वोटरों की सूची बनाई गई जिनके नाम और माता-पिता के नाम SIR के बाद सुधार प्रक्रिया में बदले गए थे. फिर उनके EPIC यानी वोटर आईडी नंबर के सहारे इन्हें 10 अप्रैल को छपी अंतिम वोटर लिस्ट से मिलाया गया. जिन मामलों में नाम और पिता का नाम पूरी तरह बदल गया था, उन्हें अलग किया गया, हालाकी छोटी-मोटी वर्तनी की गलतियों के सुधार गिनती में नहीं लिए गए. 

उदाहरण के लिए, नदीम अहमद का नाम इसरार अहमद हो गया और पिता का नाम सूरज अहमद से बदलकर फैयाज़ खान कर दिया गया. इस तरह 55 बूथों पर 2,691 असली वोटर हटे, जो इन बूथों के कुल वोटरों का 5.7 प्रतिशत है, और ये सभी मुस्लिम मतदाता थे. हालांकि राज्य के CEO की जांच रिपोर्ट में प्रभावित लोगों की धार्मिक पहचान का ज़िक्र नहीं है. 

कुछ मिनटों में सैकड़ों नाम बदले
ज़्यादातर फर्जी वोटर (2,372) अगस्त में जोड़े गए. 19 अगस्त को 656 नाम बदले गए, और यह सब दफ्तर का समय खत्म होने के बाद शाम 6:26 से 6:34 बजे के बीच, यानी करीब साढ़े सात मिनट में हुआ. 89 असली वोटरों की जगह तो एक ही मिनट में फर्जी नाम चढ़ा दिए गए. 31 अगस्त को 523 नाम करीब 19 मिनट में बदले गए, यानी हर मिनट लगभग 27 नाम बदले जा रहे थे. 

उर्दू रिकॉर्ड ने खोली पोल
उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू तीनों में रखी जाती है. इनको खंगालने पर देखा गया कि कई मामलों में हिंदी और अंग्रेज़ी में नाम बदल दिया गया, पर उर्दू रिकॉर्ड में असली नाम बना रहा. जैसे अरिसा बी का नाम अंग्रेज़ी और हिंदी में जन्नत हो गया, लेकिन उर्दू में वह अरिसा बी ही लिखा रहा. 

ऐसे 15 मामलों की ज़मीन पर जाकर पड़ताल हुई तो हर मामले में दो सरकारी फोटो पहचान पत्र, जैसे आधार, वोटर आईडी या राशन कार्ड देखे गए. इनसे पता चला कि नए नामों का असली वोटरों से कोई लेना-देना नहीं था, जबकि असली वोटरों के दस्तावेज़ अंतिम वोटर लिस्ट की पुरानी एंट्री से मेल खाते थे. 33 साल के अखलाक को चार महीने बाद पता चला कि उसके EPIC नंबर पर अब अकील अहमद नाम दर्ज है और पिता का नाम भी बदल चुका है. अखलाक के मुताबिक उसके गांव में इस नाम का कोई आदमी नहीं रहता. 

सॉफ्टवेयर और नियमों में तीन बड़ी खामियां
इस गड़बड़ी को तीन खामियों ने संभव बनाया: 
पहली, चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर ECINET में फॉर्म 8 यानी सुधार के आवेदन बिना ज़रूरी दस्तावेज़ों के भी प्रोसेस हो सकते थे. 
दूसरी, नियमों के मुताबिक बूथ स्तर के अधिकारी (BLO) को आवेदक के पते की मौके पर जांच करनी होती है, लेकिन निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी (ERO) इस जांच को छोड़कर खुद मंज़ूरी दे सकता है. 
तीसरी, ERO खुद ही बिना वोटर को बताए बदलाव शुरू कर सकता है, और सॉफ्टवेयर में बदलाव का रिकॉर्ड रखना अनिवार्य नहीं है. 

यानी एक ही अधिकारी बदलाव शुरू कर सकता है, जांच टाल सकता है और अंतिम मंज़ूरी भी दे सकता है, और वोटर को खबर तक नहीं होती. पीलीभीत के दो BLO ने बताया कि तहसील दफ्तर ने उन्हें कई फॉर्म 8 की जांच करने को कहा, लेकिन जांच शुरू होने से पहले ही बता दिया गया कि ये आवेदन निपटाए जा चुके हैं. कंप्यूटर ऑपरेटर ERO के लॉगिन से ECINET चलाते थे. पश्चिम बंगाल की पिछली रिपोर्टिंग में भी अधिकारियों के अपने लॉगिन कंप्यूटर ऑपरेटर से साझा करने की बात सामने आई थी. 

असली वोटर बाहर, फर्जी वोटर अंदर
जिस वोटर का नाम बदल दिया गया, उसे इसका पता तभी चलेगा जब वह वोट डालने बूथ पर पहुंचेगा और उसे बताया जाएगा कि लिस्ट में उसका नाम नहीं है. दूसरी तरफ, जोड़े गए फर्जी नाम से कोई भी नकली पहचान पत्र दिखाकर वोट डाल सकता है. चुनाव आयोग के नियमों में वोटर आईडी के अलावा 2024 के लोकसभा चुनाव में 12 अन्य पहचान पत्र मान्य थे. ऊपर से वोटर लिस्ट की तस्वीरें अक्सर धुंधली होती हैं, जिससे चेहरा मिलाना मुश्किल हो जाता है. कलेक्टिव ने महाराष्ट्र के तुलजापुर का उदाहरण दिया, जहां 2024 के विधानसभा चुनाव से पहले अधिकारियों ने 6,000 से ज़्यादा ऑनलाइन आवेदन खारिज किए, क्योंकि आवेदक बताए पते पर रहते ही नहीं थे और उन्होंने फर्जी आधार कार्ड लगाए थे. 

लाखों सुधार फॉर्म, जिनका पता नहीं
जब ECI पोर्टल से अप्रैल से सितंबर के बीच जमा हुए 12,082 सुधार फॉर्म डाउनलोड किए गए लेकिन UP CEO के अपने आंकड़ों के अनुसार इन महीनों में 33.8 लाख सुधार फॉर्म मंज़ूर हुए है. यानी लाखों फॉर्म पोर्टल पर सार्वजनिक ही नहीं हैं. चुनाव मैनुअल के मुताबिक SIR प्रक्रिया के बाहर आयोग इन्हें सार्वजनिक करने के लिए बाध्य नहीं है. जो फॉर्म सार्वजनिक हैं, उनमें सिर्फ वोटर का नाम और विधानसभा क्षेत्र है, EPIC नंबर नहीं. इसलिए आम लोग यह पता नहीं लगा सकते कि किसके नाम में, किस आधार पर बदलाव हुआ. 

यही मैनुअल और सॉफ्टवेयर पूरे देश में इस्तेमाल होते हैं, इसलिए यह खतरा सिर्फ उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं है. 

प्रशासन की कार्रवाई
राज्य CEO नवदीप रिनवा के दफ्तर के बयान के अनुसार जांच में सामने आया कि 31 मई से 29 अगस्त के बीच एक कंप्यूटर सहायक ने 13,779 फॉर्म 8 आवेदन दर्ज किए. इनमें से 10,470 एंट्री बिना भौतिक फॉर्म और सहायक दस्तावेज़ों के मंज़ूर हो गईं. दो ERO और कंप्यूटर सहायक के खिलाफ FIR दर्ज हुई है, और 10 अप्रैल के बाद इस ऑपरेटर की दर्ज की गई सभी फॉर्म 6 और फॉर्म 7 एंट्री की भी जांच के आदेश दिए गए हैं. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने मामला उठाया है, और कांग्रेस की मांग है कि कार्रवाई और आगे जाए. 

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