श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ़्रेंस के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है. वह लंबे समय से पार्टी नेतृत्व से नाराज़ चल रहे थे. न्यूज एजेंसी PTI के मुताबिक़ उन्होंने संकेत दिया है कि वो अपनी नई राजनीतिक पार्टी बना सकते हैं. उन्होंने कहा, ‘मैं सत्ता के लिए अपने सम्मान से समझौता नहीं कर सकता.’ रुहुल्लाह पहले ही घोषणा कर चुके थे कि वो 3 नवंबर को पार्टी छोड़ देंगे. उनके इस्तीफ़े से जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है. उमर सरकार ने पिछले महीने ही अपने मौजूदा कार्यकाल के दो साल पूरे किए हैं.
मंत्रिमंडल विस्तार के बाद बढ़ी नाराज़गी
27 अक्टूबर को कश्मीर के चार विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया. इनमें अली मोहम्मद सागर, मीर सैफ़ुल्लाह, शमीमा फ़िरदौस और अल्ताफ़ अहमद वानी हैं. इसके बाद उमर अब्दुल्लाह को अपनी ही पार्टी के कुछ नेताओं की आलोचना झेलनी पड़ी. पार्टी के भीतर इस तरह खुलकर नाराज़गी सामने आना आम बात नहीं है.
तीन दिन बाद, 30 अक्टूबर को पार्टी के 17 नाराज़ विधायकों ने श्रीनगर में चार घंटे तक बैठक की. बैठक के बाद उन्होंने पार्टी को शिकायतें दूर करने के लिए 15 दिन का समय दिया. ये विधायक पार्टी में ‘एकतरफ़ा फ़ैसले’ लिए जाने और ‘कुछ चुनिंदा लोगों के हिसाब से पार्टी चलाने’ से नाराज़ हैं.
श्रीनगर की ईदगाह सीट से छह बार विधायक रहे मुबारक गुल और अनंतनाग पश्चिम से विधायक अब्दुल मजीद लारनी ने मंत्रिमंडल में जगह न मिलने पर खुलकर नाराज़गी ज़ाहिर की है. नए मंत्रिमंडल में मुख्यमंत्री समेत सात मंत्री कश्मीर घाटी से हैं, जबकि जम्मू क्षेत्र से दो मंत्री बनाए गए हैं, जिनमें उपमुख्यमंत्री सुरिंदर कुमार चौधरी भी शामिल हैं. पार्टी ने विधायकों की सार्वजनिक नाराज़गी को अपने यहां मौजूद ‘अंदरूनी लोकतंत्र’ की निशानी बताया है.
क्या उमर सरकार को कोई ख़तरा है?
जम्मू यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग की पूर्व प्रोफ़ेसर रेखा चौधरी का कहना है कि उमर सरकार पर फ़िलहाल कोई ख़तरा नहीं है. उनके मुताबिक़ नाराज़ विधायकों के पार्टी से इस्तीफ़ा देने की संभावना कम है. वह कहती हैं कि नेशनल कॉन्फ़्रेंस के इतिहास में नेताओं का पार्टी के ख़िलाफ़ सार्वजनिक तौर पर नाराज़गी जताना बहुत कम देखा गया है. उन्होंने यह भी कहा कि सभी राजनीतिक दलों के पास ऐसी शिकायतें दूर करने के अपने तरीक़े होते हैं, लेकिन नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने पहले कभी ऐसी स्थिति का सामना नहीं किया.
रुहुल्लाह के पिता सैयद आगा मेहदी मुस्तफ़ा की 3 नवंबर 2000 को चरमपंथियों ने हत्या कर दी थी. उस समय वो कांग्रेस के नेता थे. 26 साल बाद रुहुल्लाह ने नेशनल कॉन्फ़्रेंस से अलग होने के लिए वही तारीख़ चुनी.
रुहुल्लाह के आरोप और अधूरे वादे
रुहुल्लाह ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह पर 2024 के विधानसभा चुनाव में मिले जनादेश से धोखा करने का आरोप लगाया है. उस चुनाव में नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने 42 सीटें जीती थीं, जिनमें से ज़्यादातर कश्मीर में थीं. भारतीय जनता पार्टी 29 सीटें जीतकर दूसरे स्थान पर रही थी और उसकी सभी सीटें जम्मू क्षेत्र से थीं.
नेशनल कॉन्फ़्रेंस ने अपने घोषणापत्र में अनुच्छेद 370 और जम्मू-कश्मीर को मिले ख़ास संवैधानिक अधिकार वापस दिलाने के लिए लड़ने का वादा किया था. पार्टी ने बिजली परियोजनाएं जम्मू-कश्मीर को सौंपे जाने, हर घर को 200 यूनिट मुफ़्त बिजली देने और एक लाख युवाओं को रोज़गार देने का भी वादा किया था. इनमें से ज़्यादातर वादे अब तक पूरे नहीं हुए हैं.
उमर अब्दुल्लाह ने सरकार के कथित ख़राब प्रदर्शन पर सफ़ाई देते हुए कहा है कि केंद्र शासित प्रदेश के मुख्यमंत्री के तौर पर उनके पास सीमित अधिकार हैं. नाम न छापने की शर्त पर नेशनल कॉन्फ़्रेंस के एक विधायक ने कहा, ‘अब हालात ऐसे हो गए हैं कि हमारे अपने मतदाता हमारा मज़ाक़ उड़ाते हैं. अगर हम मुफ़्त बिजली जैसे बुनियादी मुद्दे पर कुछ नहीं कर पा रहे हैं, तो फिर बड़े वादे कैसे पूरे करेंगे?’
नेतृत्व पर सवाल और फ़ारूक़ का रुख़
सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ कश्मीर में सामाजिक विज्ञान विभाग के पूर्व डीन प्रोफ़ेसर नूर अहमद बाबा का कहना है कि नेशनल कॉन्फ़्रेंस को कश्मीर में बीजेपी के ख़िलाफ़ लोगों की नाराज़गी का फ़ायदा मिला और वह सत्ता में आई. PDP समेत कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाने और जम्मू-कश्मीर का दर्जा घटाने के केंद्र सरकार के फ़ैसले का विरोध किया था. सुप्रीम कोर्ट ने इन फ़ैसलों को सही ठहराया था. प्रोफ़ेसर बाबा के मुताबिक़, सत्ता में आने के केवल दो साल बाद पार्टी ऐसी स्थिति में पहुंच गई है, जहां पिछले घोषणापत्र के वादों को रुहुल्लाह बख़ूबी उठा रहे हैं और नेतृत्व उन्हीं से दूरी बना रहा है.
उमर अब्दुल्लाह और पार्टी अध्यक्ष व उनके पिता फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने रुहुल्लाह को फ़ैसला बदलने के लिए मनाने के सुझाव को ठुकरा दिया. फ़ारूक़ अब्दुल्लाह ने तो रुहुल्लाह को अपने दम पर चुनाव लड़ने की चुनौती भी दे दी.
‘दोस्तों की मंडली’ का आरोप
एक अन्य विधायक ने नाम न छापने की शर्त पर BBC से कहा कि मुख्यमंत्री के आसपास ‘दोस्तों और नेताओं की एक मंडली’ है, जिसकी वजह से पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को किनारे किया जा रहा है. उनके मुताबिक़ इनमें से ज़्यादातर लोगों ने चुनाव तक नहीं जीता है, फिर भी पार्टी के मामलों में उनकी बात सुनी जाती है, जबकि वर्षों से पार्टी के लिए काम करने वालों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है.
प्रोफ़ेसर बाबा का मानना है कि नेतृत्व रुहुल्लाह के मामले को बेहतर तरीक़े से संभाल सकता था. उनके अनुसार जिस तरह रुहुल्लाह के साथ व्यवहार किया गया, उससे पार्टी घमंडी और लापरवाह दिखाई दी. उन्होंने कहा कि अब पार्टी के भीतर आई नई नाराज़गी बताती है कि कई नेता उसके काम करने के तरीक़े से ख़ुश नहीं हैं.
क्या पार्टी टूटने का ख़तरा है?
प्रोफ़ेसर बाबा के मुताबिक़ नेशनल कॉन्फ़्रेंस की इस खींचतान से कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों में और टूट हो सकती है, और इसका फ़ायदा बीजेपी को मिलने की संभावना है. प्रोफ़ेसर रेखा चौधरी का कहना है कि सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं, पीडीपी को भी इसका फ़ायदा होगा. उनके अनुसार नाराज़ विधायकों में मुबारक गुल और वरिष्ठ विधायक नज़ीर गुरेज़ी जैसे पुराने नेता भी हैं, और उनकी खुली नाराज़गी से पार्टी और उमर सरकार, दोनों कमज़ोर दिख रहे हैं. मुबारक गुल और नज़ीर गुरेज़ी समेत दूसरे नेताओं ने 4 नवंबर को प्रेस कॉन्फ़्रेंस करने का एलान किया है.
सत्ता में आने के बाद से उमर अब्दुल्लाह पर आरोप लगते रहे हैं कि वो बीजेपी के क़रीब जाने के लिए कश्मीर में लोगों की भावनाओं को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं. कुछ लोगों का कहना है कि आने वाले महीनों और वर्षों में उनके नेतृत्व में पार्टी के टूटने का ख़तरा पैदा हो सकता है. प्रोफ़ेसर बाबा कहते हैं कि बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि देश की राजनीति किस दिशा में जाती है. उनके मुताबिक़ सवाल यह है कि क्या जम्मू-कश्मीर में लोगों के सामने भरोसेमंद विकल्प मौजूद हैं, और इसके लिए इंतज़ार करना होगा.
"श्रीनगर से नेशनल कॉन्फ़्रेंस के सांसद आगा सैयद रुहुल्लाह ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया है. वह लंबे समय से पार्टी नेतृत्व से नाराज़ चल रहे थे…"













