पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच दुनिया की नजरें अब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर टिक गई हैं. ईरान और ओमान के बीच इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से जहाजों की आवाजाही के लिए नए रास्ते तय करने को लेकर समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है. 

हालांकि, ईरान ने साफ कर दिया है कि केवल ओमान के साथ समझौता होने से होर्मुज़ जलडमरूमध्य नहीं खुलेगा. इसके लिए अमेरिका को ईरान की कई शर्तें माननी होंगी. यह मामला भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा गुजरता है. 

यदि यहां जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है तो कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता कम हो सकती है. इसका असर भारत के पेट्रोल-डीजल, रसोई गैस, महंगाई, रुपये और शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है.

ईरान ने अमेरिका के सामने रखी हैं कई शर्तें

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघ़ची के अनुसार, ओमान के साथ होर्मुज़ को लेकर समझौता अंतिम चरण में है. लेकिन इस समझौते के बाद भी जलडमरूमध्य को खोलने के लिए अमेरिका को ईरान की अन्य शर्तें पूरी करनी होंगी. 

ईरान की प्रमुख मांगों में अमेरिका और इज़राइल के हमलों से हुए नुकसान का मुआवजा, ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना, सैन्य धमकियां बंद करना, खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी समुद्री नाकाबंदी हटाना और ईरान की विदेशों में जमा संपत्तियों को जारी करना शामिल है.

ईरान और अमेरिका के बीच फिलहाल प्रत्यक्ष बातचीत नहीं हो रही है. दोनों देशों के बीच संदेश मध्यस्थों के माध्यम से पहुंचाए जा रहे हैं.

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होर्मुज़ जलडमरूमध्य भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

होर्मुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक है. ईरान और ओमान के बीच स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग पश्चिम एशिया के तेल उत्पादक देशों को दुनिया के अन्य हिस्सों से जोड़ता है.

ईरान के बंद करने से पहले दुनिया के कुल तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस व्यापार का लगभग पांचवां हिस्सा इस मार्ग से गुजरता था. इसलिए यहां लंबे समय तक आवाजाही बाधित होने पर पूरी दुनिया के ऊर्जा बाजार पर असर पड़ सकता है.

भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है. ऐसे में होर्मुज़ में किसी भी तरह की बाधा भारत के लिए कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमत दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण हो जाती है.

होर्मुज़ खुला तो कच्चा तेल सस्ता हो सकता है?

अगर अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होता है और होर्मुज़ से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही बिना बाधा शुरू होती है तो कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर जोखिम कम हो सकता है.

इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम होने की संभावना है. हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि समझौता होते ही कच्चा तेल बहुत सस्ता हो जाएगा. पश्चिम एशिया में तनाव, जहाजों के बीमा की लागत और अन्य समुद्री मार्गों की स्थिति भी कीमतों को प्रभावित करेगी.

फिलहाल बाजार में इसी अनिश्चितता का असर दिखाई दे रहा है. 10 अगस्त को कच्चे तेल की कीमतों में तेज़ी आई, क्योंकि ईरान की शर्तों के कारण होर्मुज को जल्द खोलने की उम्मीदों पर कुछ दबाव आया.

रसोई गैस और रोजमर्रा की चीजों पर भी असर

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता. परिवहन महंगा होने पर सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने की लागत बढ़ सकती है. इसका असर खाद्य पदार्थों, औद्योगिक सामान और रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है.

ऊर्जा लागत में बढ़ोतरी से महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है. इसके उलट होर्मुज़ में स्थिति सामान्य होने पर ऊर्जा लागत और आपूर्ति संबंधी जोखिम घट सकते हैं, जिससे भारत को महंगाई के मोर्चे पर राहत मिल सकती है.

शेयर बाजार पर क्या असर होगा?

होर्मुज़ संकट का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है. खासकर उन क्षेत्रों पर जिनकी लागत सीधे कच्चे तेल से जुड़ी है. यदि कच्चा तेल महंगा होता है तो विमानन, रंग, रसायन, टायर और परिवहन जैसे क्षेत्रों की लागत बढ़ सकती है. इससे कंपनियों के मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है.

इसके विपरीत, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से इन क्षेत्रों को राहत मिल सकती है. तेल की कीमतों का असर केवल कंपनियों तक सीमित नहीं है. महंगा तेल देश के आयात खर्च को बढ़ाता है और रुपये पर भी दबाव डाल सकता है. इससे शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की धारणा प्रभावित हो सकती है.

यदि समझौता सफल होता है और तेल की कीमतों में गिरावट आती है तो भारत की अर्थव्यवस्था को ऊर्जा लागत के मोर्चे पर राहत मिल सकती है. लेकिन अगर बातचीत विफल होती है और होर्मुज़ में तनाव बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमत फिर तेज़ी पकड़ सकती है. ऐसी स्थिति में पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत, महंगाई, रुपये और शेयर बाजार सभी पर दबाव बढ़ सकता है.

 

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