दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को 2020 के दिल्ली दंगों की कथित बड़ी साजिश से जुड़े मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं. गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम, यानी UAPA के तहत चल रहे इस मामले में यह तीसरी बार है जब हाईकोर्ट ने दोनों को राहत देने से इनकार किया है. जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस दिनेश भट्ट की खंडपीठ ने कहा कि तसलीम अहमद और खालिद सैफी की भूमिका उमर खालिद और शरजील इमाम से अलग है, इसलिए दोनों उनके साथ समानता (पैरिटी) के आधार पर जमानत नहीं मांग सकते. पीठ ने उसी FIR से जुड़े अतहर खान बनाम दिल्ली सरकार मामले का भी जिक्र किया, जिसमें अदालत पहले उनकी भूमिका की जांच कर चुकी थी और उसी आधार पर उन्हें जमानत नहीं दी गई थी.

निचली अदालत से हाईकोर्ट तक का सफर
दोनों आरोपियों ने यह अपील एनआईए अधिनियम, 2008 की धारा 21 के तहत दायर की थी. इसमें उन्होंने निचली अदालत के 4 जुलाई के आदेश को चुनौती दी थी. उस दिन कड़कड़डूमा कोर्ट के अतिरिक्त सेशंस जज समीर बाजपेयी ने कहा था कि उसके पास सुप्रीम कोर्ट के 5 जनवरी के आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. अदालत ने यह भी माना था कि ये याचिकाएं ट्रायल कोर्ट में सुनवाई योग्य ही नहीं हैं.

आरोपियों की दलील
खालिद और इमाम की याचिकाओं का एक बड़ा आधार सुप्रीम कोर्ट का सैयद इफ्तिखार अंद्राबी वाले मामले में दिया गया फैसला था, जिसमें शीर्ष अदालत की एक अन्य पीठ ने जनवरी 2026 में इन दोनों की जमानत खारिज किए जाने पर सवाल उठाए थे. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह परिस्थितियों में बदलाव है, जिसके आधार पर उन्हें नए सिरे से जमानत मिलनी चाहिए. इससे पहले मई में जस्टिस अरविंद कुमार की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने भी यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले की व्याख्या को लेकर अलग-अलग पीठों के बीच ‘धारणागत टकराव’ की बात कही थी और यह मुद्दा बड़ी पीठ को भेजा था.

दिल्ली पुलिस का विरोध
दिल्ली पुलिस ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया. पुलिस ने दोनों को दंगों का ‘मास्टरमाइंड’ बताया और कहा कि जमानत याचिकाएं ‘अवैध’ हैं और अदालत को 'गुमराह' करने की कोशिश हैं. पुलिस का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 के अपने फैसले में भी इन्हें कथित मास्टरमाइंड बताया था, इसलिए इनकी हिरासत उचित है. पुलिस ने यह भी कहा कि आरोपियों ने शीर्ष अदालत के निर्देशों को गलत तरीके से समझा है. सुप्रीम कोर्ट ने नई जमानत याचिका की छूट तब दी थी, जब संरक्षित गवाहों की गवाही पूरी हो जाए या आदेश के एक साल बीत जाएं, इनमें से जो पहले हो.

सुप्रीम कोर्ट का 5 जनवरी का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को जमानत दे दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम को राहत नहीं दी थी. अदालत का कहना था कि दोनों के खिलाफ यूएपीए के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है.

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे 23 फरवरी 2020 को भड़के थे. दिल्ली पुलिस के अनुसार इनमें 53 लोगों की मौत हुई और सैकड़ों लोग घायल हुए. शरजील इमाम को 28 जनवरी 2020 को सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान दिए गए भाषणों के मामले में बिहार के जहानाबाद से गिरफ्तार किया गया था, जबकि उमर खालिद को सितंबर 2020 में बड़ी साजिश के मामले में गिरफ्तार किया गया. यह मामला एफआईआर 59/2020 से जुड़ा है, जिसकी जांच दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल कर रही है. खालिद की जमानत याचिका को निचली अदालत ने मार्च 2022 में और हाईकोर्ट ने अक्टूबर 2022 में खारिज किया था. इसके बाद 2 सितंबर 2025 को हाईकोर्ट ने खालिद, इमाम और सात अन्य आरोपियों की जमानत याचिकाएं ठुकरा दी थीं. दिसंबर 2025 में खालिद को अपनी बहन की शादी में शामिल होने के लिए 15 दिन की अंतरिम जमानत जरूर मिली थी. दोनों आरोपी करीब छह साल से जेल में हैं और मुकदमे की सुनवाई अब तक पूरी नहीं हुई है.

अब आगे क्या?
हाईकोर्ट के ताजा फैसले के बाद दोनों के पास अब सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता बचा है. यूएपीए जैसे कड़े कानूनों में मुकदमे में देरी और लंबी हिरासत के आधार पर जमानत मिलनी चाहिए या नहीं, इस पर कानूनी बहस जारी है और बड़ी पीठ के सामने लंबित मुद्दे का असर भी आगे इस मामले पर पड़ सकता है.

 

-ममता सिंह 

 

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