भारत की राजधानी दिल्ली में इस समय दुनिया के कई बड़े नेता जुटे हुए हैं. वजह है BRICS समिट. BRICS का नाम आपने जरूर सुना होगा. लेकिन सवाल ये है कि आखिर ये संगठन इतना खास क्यों है? और क्यों दुनिया के इतने सारे देश अब इसका हिस्सा बनना चाहते हैं? BRICS की शुरुआत 2009 में हुई थी. तब इसे BRIC कहा जाता था. इसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन शामिल थे. इसके एक साल बाद यानी 2010 में दक्षिण अफ्रीका भी इससे जुड़ गया. इसके बाद इसका नाम BRICS हो गया. लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई.
आज BRICS का दायरा काफी बढ़ चुका है. मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, यूएई और इंडोनेशिया जैसे देश भी इससे जुड़ चुके हैं. यानी अब ये सिर्फ पांच देशों का समूह नहीं रह गया है.
और
सबसे बड़ी बात ये है कि कई और देश भी BRICS के साथ जुड़ना चाहते हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक, 40 से ज्यादा देशों ने किसी न किसी रूप में BRICS के साथ जुड़ने में दिलचस्पी दिखाई है. तो सवाल है कि आखिर ऐसा क्या है BRICS में, जिसकी वजह से इतने देश इसकी तरफ देख रहे हैं? और क्या BRICS सच में दुनिया का नया पावर सेंटर बन सकता है?
सबसे पहले समझिए BRICS है क्या?
BRICS को आसान भाषा में ऐसे समझिए. ये तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं का एक बड़ा मंच है. इसका मकसद है कि ये देश आपस में व्यापार बढ़ाएं. निवेश बढ़ाएं. एक-दूसरे के साथ मिलकर काम करें. और वैश्विक स्तर पर अपनी आवाज को मजबूत करें. BRICS को अक्सर G7 के मुकाबले भी देखा जाता है. G7 में दुनिया की बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं. वहीं BRICS में मुख्य रूप से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का दबदबा है. BRICS की एक और बड़ी कोशिश है डॉलर पर निर्भरता कम करना. यही वजह है कि इस समय ‘डी-डॉलराइजेशन’ की चर्चा सबसे ज्यादा हो रही है.
आखिर डी-डॉलराइजेशन क्या है?
इसे एक आसान उदाहरण से समझिए. अगर दो BRICS देश आपस में व्यापार करते हैं, तो कोशिश ये है कि वे हर बार डॉलर का इस्तेमाल न करें. वे अपनी-अपनी करेंसी में भी लेन-देन कर सकें. इससे अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी बैंकिंग सिस्टम पर निर्भरता कम हो सकती है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि BRICS ने अपनी कोई एक कॉमन करेंसी बना ली है.
ऐसा अभी नहीं हुआ है. इसके लिए सबसे जरूरी चीज है आपसी भरोसा. क्योंकि अलग-अलग देशों की अपनी अर्थव्यवस्था, अपनी करेंसी और अपने हित हैं. यही वजह है कि दिल्ली में हो रहा BRICS समिट सिर्फ नेताओं की मुलाकात नहीं है. इसके पीछे एक बड़ी तस्वीर है. ये तस्वीर है दुनिया के बदलते आर्थिक और राजनीतिक संतुलन की.
इतने देश BRICS से जुड़ना क्यों चाहते हैं?
इसके पीछे कई वजहें हैं. सबसे बड़ी वजह है अमेरिका और डॉलर का दबदबा. हाल के वर्षों में टैरिफ और ट्रेड पॉलिसी को लेकर अमेरिका के फैसलों का असर पूरी दुनिया पर देखने को मिला है. ऐसे में कई देश चाहते हैं कि उनके पास व्यापार और वित्त के दूसरे विकल्प भी हों.
BRICS उन्हें ऐसा ही एक मंच देता है. यहां देश आपस में व्यापार बढ़ा सकते हैं. निवेश कर सकते हैं. और बड़े प्रोजेक्ट्स में एक-दूसरे का साथ दे सकते हैं. यही वजह है कि 2023 से 2026 के बीच 40 से ज्यादा देशों ने BRICS में शामिल होने या पार्टनर बनने में दिलचस्पी दिखाई है. इनमें एशिया, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और मिडिल ईस्ट के कई देश शामिल हैं.
BRICS ने पार्टनर देशों की कैटेगरी भी बनाई है. इसका मतलब ये है कि किसी देश को तुरंत फुल मेंबर बने बिना भी समूह के साथ काम करने का मौका मिल सकता है. इससे BRICS का दायरा और बड़ा हो रहा है.
लेकिन BRICS के सामने चुनौती भी है
जितना बड़ा BRICS होगा, उतने ज्यादा देशों के साथ व्यापार और निवेश के मौके मिलेंगे. भारत के लिए भी ये बड़ा फायदा हो सकता है.
लेकिन दूसरी तरफ एक चुनौती भी है. ज्यादा देश यानी ज्यादा हित. ज्यादा हित यानी ज्यादा मतभेद की संभावना. हर देश के अपने आर्थिक और राजनीतिक हित हैं. इसलिए इतने बड़े समूह में हर मुद्दे पर एक राय बनाना आसान नहीं होगा. यानी BRICS का बड़ा होना उसकी ताकत भी है और चुनौती भी.
भारत के लिए इसका क्या मतलब है?
अब सबसे जरूरी सवाल. भारत को इससे क्या फायदा होगा? अगर BRICS देश आपस में अपनी करेंसी में ज्यादा व्यापार करते हैं, तो डॉलर के उतार-चढ़ाव का असर कुछ हद तक कम हो सकता है. इसका असर व्यापार पर पड़ सकता है. और लंबे समय में इसका फायदा आम लोगों तक भी पहुंच सकता है. दूसरा बड़ा फायदा है एनर्जी.
BRICS में तेल और गैस उत्पादक देश भी हैं. ऐसे में इन देशों के साथ मजबूत रिश्ते भारत की एनर्जी सिक्योरिटी के लिए अहम हो सकते हैं.
अगर एनर्जी सप्लाई ज्यादा स्थिर रहती है, तो महंगाई को कंट्रोल करने में भी मदद मिल सकती है.
इसके अलावा BRICS का New Development Bank भी महत्वपूर्ण है.
ये बैंक सड़क, एनर्जी, हेल्थ और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे प्रोजेक्ट्स के लिए फंड देता है. भारत में भी कई प्रोजेक्ट्स को इससे मदद मिली है. यानी BRICS सिर्फ बैठकों और बयानों तक सीमित नहीं है. इसका असर जमीन पर होने वाले प्रोजेक्ट्स और निवेश पर भी पड़ सकता है.
तो क्या BRICS दुनिया का नया पावर सेंटर बन रहा है?
देखा जाए तो BRICS का असर लगातार बढ़ रहा है. नए देश इससे जुड़ रहे हैं. व्यापार बढ़ाने की कोशिश हो रही है. डॉलर पर निर्भरता कम करने की बात हो रही है. और विकासशील देशों को एक साथ लाने की कोशिश भी जारी है.
यही वजह है कि अमेरिका समेत पश्चिमी देशों की नजर भी BRICS पर है.
खासकर तब, जब दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बदल रही है.
हालांकि BRICS के सामने कई चुनौतियां हैं. सभी सदस्य देशों के हित एक जैसे नहीं हैं. ऐसे में इस समूह को एक मजबूत और लंबे समय तक टिकने वाले संगठन में बदलना आसान नहीं होगा. लेकिन एक बात साफ है. BRICS अब सिर्फ एक संगठन नहीं रह गया है. ये दुनिया की बदलती अर्थव्यवस्था और बदलते पावर बैलेंस की एक बड़ी तस्वीर बन चुका है.
"भारत की राजधानी दिल्ली में इस समय दुनिया के कई बड़े नेता जुटे हुए हैं. वजह है BRICS समिट. BRICS का नाम आपने जरूर सुना होगा. लेकिन सवाल ये है…"
