हरि अनंत , हरि कथा अनंता. गंगा के किनारे बसे मोकामा के टाल इलाके में कानून की किताबें नहीं, बल्कि एक 'समानांतर सत्ता' और जनता दरबार का फरमान चलता है. यह कहानी है बिहार के उस बाहुबली की, जिसके दरबार में पुलिस से पहले फैसले होते हैं और जिसका तिलिस्म ऐसा है कि समर्थक और विरोधी, दोनों ही उसे खौफ और सम्मान से 'छोटे सरकार' बुलाते हैं. जब ग्रामीण बिहार में लग्जरी गाड़ियां सपना हुआ करती थीं, तब यह शख्स अपनी करोड़ों की मर्सिडीज छोड़कर, विशेष रूप से बनवाई गई और अपने पसंदीदा घोड़े 'बादल' द्वारा खींची जाने वाली शाही बग्घी पर सवार होकर विधानसभा पहुंचता था. शौक भी ऐसे कि माफिया डॉन भी कहें, भाई थोड़ा हमें भी सिखाओ! AC में रहने वाले मारवाड़ी घोड़े, मेहमानों से हाथ मिलाता हाथी और शान से दिखाया जाने वाला पालतू अजगर.जिसे छिपाकर नहीं, बल्कि शान से प्रदर्शित किया जाता था.                       सोचिए, एक ऐसा आदमी जो हमेशा आँखों पर  काला चश्मा और बेदाग सफेद लिबास पहने रहता है. एक ऐसा शख्स जो चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने, हर बहस, हर रील और हर सियासी चर्चा में किसी ना किसी  तरह अपनी जगह बना ही लेता है. आखिर इस काले चश्मे के पीछे ऐसा कौन सा राज छिपा है, जो सत्ता के गलियारों से लेकर मोकामा की गलियों तक खौफ और भरोसे का एक अजीब सा तिलिस्म बुनता है?                                                                                 कोई इन्हें बाहुबली कहता है, कोई खौफ का दूसरा नाम, तो कोई अपने इलाके का मसीहा या रॉबिनहुड. घोड़ों और बग्घियों का शौकीन यह शख्स जब चलता है, तो उसके पीछे सिर्फ समर्थकों की भीड़ के साथ विवादों का एक गहरा साया भी चलता है. और जबसे डिजिटल मीडिया आया है तबसे तो भाईसाहब वो मीम के शानदार कंटेंट बन चुके हैं. कभी अपनी ऑन कैमरा गाली से चर्चे में रहे तो कभी ब्लंट जबाव से. कभी अपनी पत्नी को ख़राब विधायक बताकर ट्रेंड में रहे तो कभी पत्रकारो के जटिल सवाल के ब्लंट जबाव देकर. एक पत्रकार के सवाल पर उन्होंने जबाव दिया था कि वो एमपी इसीलिए बनना चाहते हैं क्यूँकि उनको दिल्ली जाने के लिए फ्लाइट मिलेगी.     लेकिन इस सामंती उदारता और शाही ठसक  के पीछे एक ऐसा रक्तिम इतिहास छिपा है, जिसे सुनकर रूह कांप जाए. महज 9 साल की उम्र में पहली बार जेल की हवा खाने से लेकर, दशकों तक चले उस भीषण गैंगवार तक का सफर, जहां एके-47 की गोलियों से छलनी होने के बाद भी ठेले पर लादकर ले जाए गए इस बाहुबली ने मौत को मात दे दी थी. उनके जीवन के पन्नों में 38 संगीन आपराधिक मामले, कॉरपोरेट रंगदारी, और राष्ट्रीय मीडिया के पत्रकारों को घर में बंधक बनाकर बेरहमी से पीटने जैसे खौफनाक अध्याय दर्ज हैं.

यह  दास्तान,  बिहार की राजनीति का वह सबसे बड़ा विरोधाभास है, जहां संगीन आरोपों में जेल की सलाखों के पीछे बैठे होने के बावजूद मोकामा की जनता उन्हें 2025 में 28 हज़ार से अधिक वोटों के भारी अंतर से जिताकर लगातार छठी बार अपना सरताज चुनती है. और अब, अक्टूबर 2026 में अपनी ही सत्ताधारी पार्टी से 6 साल के लिए निष्कासित होने के बाद, यह बाहुबली एक नई बगावत का शंखनाद कर चुका है–"अपनी ही पार्टी बनाएंगे ना!" बाहुबल, खून-खराबे, रॉबिन हुड की छवि और अटूट राजनीतिक वर्चस्व से बुनी अनंत सिंह की यह अनसुनी कहानी, लोकतंत्र के उस स्याह सच को बेनकाब करती है जिसे आप न तो अनदेखा कर सकते हैं, और न ही कभी भूल सकते हैं.

अनंत सिंह का उभार : बड़े सरकार की विरासत, छोटे सरकार का उदय

बाहुबली. ये शब्द अक्सर अनंत सिंह के साथ जोड़ा जाता है. लेकिन अनंत सिंह का बाहुबली से 'छोटे सरकार' बनने तक का सफर रातों-रात तय नहीं हुआ था. यह बिहार की उस बदलती राजनीति और सामाजिक संक्रमण का  परिणाम था, जहां सत्ता की शून्यता को बाहुबल ने भर दिया था.   अनंत सिंह की कहानी समझने के लिए पहले उनके परिवार की कहानी समझिए.क्योंकि राजनीति में कुछ लोगों को अपनी पहचान बनाने के लिए जमीन तलाशनी पड़ती है, जबकि कुछ लोगों को जमीन विरासत में मिल जाती है. फिर उस पर अपनी इमारत खड़ी करना उनका काम होता है.       सामाजिक पृष्ठभूमि और बाहुबल का जन्म मोकामा का गंगा तटीय क्षेत्र,  दशकों से भूमिहार जाति के वर्चस्व और गैंगवार का गवाह रहा है. 1990 के दशक में जब लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में पिछड़ी जातियों का उभार हुआ और मंडल आयोग की राजनीति हावी हुई, तब पारंपरिक रूप से हावी रहने वाले सवर्ण विशेषकर भूमिहार खुद को हाशिए पर महसूस करने लगे. और फिर जब राज्य व्यवस्था सुरक्षा देने में विफल रही, तब अपनी जातियों के रक्षक के रूप में सवर्ण बाहुबलियों का जन्म हुआ, और अनंत सिंह का राजनीतिक उभार इसी सामाजिक संक्रमण की ही उपज था.

अनंत सिंह का जन्म 1 जुलाई 1961 को मोकामा के लदमा  गांव के एक बेहद दबंग परिवार में हुआ था. अपराध की दुनिया से उनका नाता इतनी कम उम्र में जुड़ गया था कि स्थानीय लोगों के अनुसार, महज 9 वर्ष की आयु में ही उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा था. पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि 1979 में उनके खिलाफ पहली बार हत्या का मुकदमा दर्ज हुआ, जो उनके हिंसक जीवन की एक शुरुआत मात्र थी.

लेकिन असली खेल, उनके बड़े भाई दिलीप सिंह की छत्रछाया में हुआ. 1980 के दशक में दिलीप सिंह मोकामा के एक बड़े भूमिहार बाहुबली के रूप में उभरे और 1990 में विधायक बनकर लालू सरकार में मंत्री भी बने. इसी दौर में युवा अनंत सिंह अपने भाई के प्रमुख रणनीतिकार बन गए, जहां उन्होंने बूथ कैप्चरिंग, रंगदारी और जातीय गोलबंदी के गुर सीखे. वर्ष 1986 में उनके एक और बड़े भाई विरंची सिंह की बेरहमी से हत्या कर दी गई, जिसने अनंत सिंह को प्रतिशोध की आग में जला दिया और वे अपराध की दुनिया में और भी गहरे उतर गए.

वर्चस्व की लड़ाई अनंत सिंह के सीधे राजनीति में आने के पीछे एक बड़ी वजह वर्चस्व की लड़ाई थी. वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में उनके  भाई जो वर्तमान में मंत्री थे दिलीप सिंह को एक अन्य भूमिहार बाहुबली सूरजभान सिंह ने निर्दलीय चुनाव लड़कर हरा दिया. सूरजभान सिंह की इस जीत से अनंत सिंह के परिवार के वर्चस्व को गहरा धक्का लगा. अपने परिवार की इसी खोई हुई राजनीतिक जमीन और प्रतिष्ठा को वापस पाने के लिए अनंत सिंह ने खुद सीधे राजनीति में कदम रखने का फैसला किया.                                                                                       उनके इस फैसले को पहचान दिलाई नीतीश कुमार ने.  नीतीश कुमार उस समय बाढ़ और नालंदा से चुनाव लड़ रहे थे और उन्हें बाढ़ सीट पर भूमिहार मतदाताओं को एकजुट करने के लिए एक ऐसे चेहरे की तलाश थी, जिसका जमीन पर खौफ और सम्मान दोनों हो. अनंत सिंह ने नीतीश कुमार को समर्थन दिया और घर-घर जाकर वोट मांगे. भले ही नीतीश कुमार वह चुनाव हार गए, लेकिन अनंत सिंह की वफादारी ने उन्हें गहराई तक प्रभावित किया.                                               नतीजतन, फरवरी 2005 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले नीतीश कुमार ने उन्हें जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल कर लिया. अनंत सिंह ने अपनी वफादारी साबित करने के लिए नीतीश कुमार को चांदी के सिक्कों से तौल दिया था और 2005 में जदयू को सत्ता में लाने के लिए लालू प्रसाद यादव के खिलाफ अपने बाहुबल और बूथ कैप्चरिंग का जमकर इस्तेमाल किया. जिसका नतीजा ये निकला की  2005  और 2010 में मोकामा से जदयू के टिकट पर भारी मतों से जीत हासिल कर अनंत सिंह ने अपने 'छोटे सरकार' होने के तमगे को राजनीतिक रूप से पूरी तरह वैध कर लिया.

गैंगवार : ख़ून संघर्ष से बाहुबली तक 

ये तो हो गई राजनीति की बात, लेकिन अनंत सिंह का जीवन केवल राजनीतिक दांव-पेच तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मोकामा के टाल क्षेत्र में वर्चस्व को लेकर हुई भीषण गैंगवार और खूनी लड़ाइयों के इतिहास से भरा पड़ा है. उनकी इन कहानियों में उनके प्रतिद्वंद्वियों के साथ हुए हिंसक टकराव सबसे अधिक भयावह हैं.                                                                              और इस क़िस्सों में अनंत सिंह की दुश्मनी का  सबसे प्रमुख नाम 'बिहार केसरी' का खिताब जीत चुके पहलवान विवेका सिंह उर्फ विवेका पहलवान का आता है. हैरानी की बात यह है कि दोनों एक ही गांव लदमा के रहने वाले थे और आपस में दूर के रिश्तेदार यानी गोतिया भी थे. इसके बावजूद पारिवारिक विवाद और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने एक ऐसी दुश्मनी को जन्म दिया जो दशकों तक चली. हुआ ये कि 1986 में अनंत सिंह के बड़े भाई विरंची सिंह की हत्या के बाद इस खूनी गैंगवार की शुरुआत हुई थी. तनाव तब चरम पर पहुंच गया जब 2006 में पटना के बेऊर इलाके में विवेका के करीबी संजीत पहलवान की हत्या कर दी गई, जिसका सीधा शक अनंत सिंह के गुट पर गया.

इस दुश्मनी का सबसे खौफनाक मंजर 2009 में लदमा गांव में देखने को मिला, जब विवेका पहलवान के गुट ने अनंत सिंह के घर में घुसकर हमला बोल दिया. इस हमले में विवेका के भाई संजय सिंह ने अनंत सिंह के शरीर में एके-47 की गोली उतार दी थी. हालत यह थी कि लहूलुहान अनंत सिंह को अस्पताल ले जाने के लिए कोई एंबुलेंस तक नहीं मिली और उन्हें एक ठेले पर लादकर ले जाना पड़ा, जहां चमत्कारिक रूप से उनकी जान बच गई. उसी वर्ष पटना में संजय सिंह की भी हत्या हो गई, जिसमें अनंत सिंह का नाम प्रमुखता से उछला. इसके अलावा सोनू-मोनू गैंग के साथ हुई एक मुठभेड़ में 60-70 राउंड गोलियां चलीं और इस दशकों में  लंबे गैंगवार में दोनों पक्षों के करीब दो दर्जन लोग मारे गए. हालांकि, 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ललन सिंह की मध्यस्थता से दोनों में अघोषित सुलह हुई और हाल ही में विवेका पहलवान का हृदय गति रुकने से निधन हो गया, जिस पर अनंत सिंह ने शोक भी जताया.

'छोटे सरकार' की अनसुनी कहानियाँ : लालू का घोड़ा और छोटे सरकार की जिद

अनंत सिंह ने मोकामा में जानबूझकर अपनी एक ऐसी रहस्यमयी छवि गढ़ी है, जो खौफ और सामंती उदारता  का एक बेहद जटिल मिश्रण है. उनके जीवन का यह अध्याय उनके उस तिलिस्म को उजागर करता है जिसने उन्हें एक बाहुबली से जनता का मसीहा बना दिया.

'जनता दरबार' और रॉबिन हुड की छवि अनंत सिंह के समर्थक उन्हें 'छोटे सरकार' इसलिए कहते हैं क्योंकि वे मोकामा में एक समानांतर सत्ता या अपना खुद का 'जनता दरबार' चलाते रहे हैं. स्थानीय लोगों के छोटे-बड़े विवाद, जमीन के झगड़े, पारिवारिक मसले, यहां तक कि चोरी-डकैती के मामलों का निपटारा वे अपने इसी दरबार में करते थे. पुलिस और न्यायपालिका की सुस्त प्रक्रियाओं से परे उनकी यह त्वरित न्याय प्रणाली उन्हें स्थानीय जनता के बीच एक मसीहा बनाती थी. उनके व्यक्तित्व ने उन्हें एक 'रॉबिन हुड' की छवि प्रदान की, जहां वे किसी भी गरीब परिवार (विशेषकर निचली जातियों) की लड़की की शादी में आर्थिक मदद के लिए पहुंच जाते थे और किसी के निधन पर मातमपुर्सी जरूर करते थे. एक बार जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें अपनी भूमिहार जाति पर गर्व है, तो उनका बेबाक जवाब था, “मुझे जात-पात से मतलब नहीं. मैं सभी लोगों के साथ बैठता हूं, मैं जनता का विधायक हूं”.                                                                                       इसके अलावा अनंत सिंह ने अपने क्षेत्र  में महिलाओं के सम्मान के लिए सार्वजनिक परिवहन जैसे बसों, जीप और ऑटो में एक सख्त नियम लागू किया था कि कोई भी महिला खड़ी होकर सफर नहीं करेगी. उनका स्पष्ट आदेश था कि गाड़ियों में पहले महिलाएं बैठेंगी; यदि जगह नहीं बची तो पुरुष दूसरी गाड़ी का इंतजार करेंगे या पैदल जाएंगे. (article link )  महिलाओं की सुरक्षा को लेकर उनके इस तानाशाही लेकिन लोकलुभावन फरमान ने उन्हें महिला मतदाताओं के बीच एक रक्षक की छवि दी, जिसने उनका वोट बैंक हमेशा मजबूत रखा.                                                      अब अगर अनंत सिंह के शौक की बात करे तो वो भी किसी रियासत के राजा या हॉलीवुड के माफिया डॉन जैसे रहे हैं. एक समय में उनके पटना स्थित बंगले पर एक विशाल पालतू अजगर  रहा करता था, जिसे वे शान से प्रदर्शित करते थे, हालांकि बाद में विरोध और कानूनी पचड़ों के कारण उसे जंगल में छोड़ना पड़ा था. उन्होंने एक ऐसा हाथी भी पाल रखा था जिसे मेहमानों से हाथ मिलाना सिखाया गया था. उन्हें उन्नत नस्ल के मारवाड़ी घोड़ों का बेहद शौक है, जिनमें 'बादल' और 'लाडला' सबसे प्रसिद्ध रहे हैं और इन घोड़ों के लिए विशेष रूप से एसी कमरों की व्यवस्था की गई थी.                                                                                                                 लालू यादव का घोड़ा और विधानसभा में बग्घी की सवारी उनके पसंदीदा घोड़े 'बादल' की कहानी भी बेहद मशहूर है, जो मूल रूप से राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का हुआ करता था और वे उसे बेचना नहीं चाहते थे. लेकिन अनंत सिंह ने अपनी जिद पूरी करने के लिए 2004 के सोनपुर मेले में एक डमी ग्राहक  के जरिए उस घोड़े को खरीद लिया था, जिससे लालू यादव को गहरा झटका लगा था. ये कहानी आपने पंचायत सीरिज में जरूर देखी होगी. 

इसके अलावा जब ग्रामीण बिहार में लग्जरी गाड़ियां कम  थीं, तब वे मर्सिडीज और 2 करोड़ रुपये की टोयोटा लैंड क्रूजर में घूमा करते थे. दिसंबर 2013 में वे अपनी करोड़ों की मर्सिडीज छोड़, दिल्ली से विशेष रूप से बनवाई गई आधुनिक लाइट्स और म्यूजिक सिस्टम वाली शाही बग्घी जिसे घोड़ा 'बादल' खींचता था, पर सवार होकर बिहार विधानसभा सत्र में पहुंचे थे. पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने हाजिरजवाबी से कहा था, "मैंने इसे दिल्ली से बनवाया है. मुझे जानवरों से प्यार है, और वैसे भी इस बग्घी में कोई ईंधन नहीं लगता". शक्ति प्रदर्शन का आलम यह था कि 2004 में एक न्यू ईयर पार्टी के दौरान उन्हें सार्वजनिक रूप से एके-47  लहराते हुए भी देखा गया था.

राजनीतिक सफर और दल-बदल: कभी नीतीश का साथ तो कभी लालू के हाथ 

अनंत सिंह का राजनीतिक उत्कर्ष और पतन बिहार की बदलती गठबंधन राजनीति का एक सटीक बैरोमीटर है  2004 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार की मदद करने के बाद, अनंत सिंह को फरवरी 2005 में जनता दल यूनाइटेड में शामिल किया गया था. उन्होंने 2005 और 2010 में जदयू के टिकट पर मोकामा से भारी जीत दर्ज की और सत्ता का पूरा संरक्षण प्राप्त किया. लेकिन 2015 आते-आते राजनीतिक हवा बदल गई जब नीतीश कुमार ने अपने धुर विरोधी लालू प्रसाद यादव के साथ 'महागठबंधन' बना लिया, तो लालू यादव के दबाव और बाढ़ में पुटुस यादव हत्याकांड में गिरफ्तारी के बाद, जदयू ने अनंत सिंह को टिकट देने से इनकार कर दिया. इसके जवाब में अनंत सिंह ने सितंबर 2015 में जदयू छोड़ दी और जेल में रहते हुए निर्दलीय उम्मीदवार, डीजल पंप चुनाव चिह्न  के रूप में चुनाव लड़कर जदयू के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार को 18,361 वोटों से करारी शिकस्त दी. इस जीत ने साबित कर दिया कि मोकामा में अनंत सिंह का ब्रांड किसी भी राजनीतिक दल से बड़ा है.                                                                हालात बदले और 2025 में अनंत सिंह एक बार फिर जदयू के टिकट पर चुनाव लड़े. दुलरचंद यादव की हत्या के आरोप में जेल जाने के बावजूद उन्होंने 2025 का चुनाव 28 हजार से अधिक वोटों से जीता. लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा में सबसे बड़ा भूचाल अक्टूबर 2026 में आया. विधान परिषद (MLC) चुनाव में जदयू ने उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी नीरज कुमार को उम्मीदवार बनाया, जिसके खिलाफ अनंत सिंह ने खुला विद्रोह कर दिया. 2015 की अदावत और 2025 के चुनावों में कथित भीतरघात का बदला लेने के लिए उन्होंने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के समर्थित उम्मीदवार डॉ. अनुज सिंह का खुलेआम साथ दिया और उनके लिए रोड शो किए. इस घोर अनुशासनहीनता और शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ बयानबाजी के कारण 24 अक्टूबर 2026 को जदयू ने अनंत सिंह और उनकी पत्नी नीलम देवी को 6 साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया.

पार्टी ने सिर्फ निष्कासन पर ही संतोष नहीं किया, बल्कि संविधान की 10वीं अनुसूची ,दल-बदल विरोधी कानून के तहत अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता रद्द करने की औपचारिक सिफारिश विधानसभा अध्यक्ष को सौंप दी. इसके अतिरिक्त, नीलम देवी से राज्य मंत्री का दर्जा भी छीन लिया गया. इस कार्रवाई के बाद 25-26 अक्टूबर 2026 को मीडिया के सामने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए अनंत सिंह ने अपनी खुद की नई राजनीतिक पार्टी बनाने का ऐतिहासिक ऐलान कर दिया. उन्होंने जदयू के पतन की भविष्यवाणी करते हुए बेबाकी से कहा, "मुझे कोई पछतावा नहीं है. मैं अपनी खुद की पार्टी बनाऊंगा". यह पूरा घटनाक्रम इस बात का सटीक उदाहरण है कि क्षेत्रीय क्षत्रप और बाहुबली नेता केवल एक सीमा तक ही पार्टी के प्रति वफादार रहते हैं; जब उनका व्यक्तिगत हित टकराता है, तो वे पूरी पार्टी संरचना को चुनौती देने से तनिक भी पीछे नहीं हटते.

निष्कर्ष : रॉबिनहुड या बाहुबली 

अनंत कुमार सिंह उर्फ 'छोटे सरकार' का जीवन और उनका यह राजनीतिक सफर भारतीय लोकतंत्र की उन गहरी और चिंताजनक विसंगतियों को बेनकाब करता है, जहां कानून का राज और आपराधिक वर्चस्व एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं. उनका उभार केवल एक अपराधी का राजनेता बन जाना भर नहीं है; यह उस सामाजिक संरचना का प्रत्यक्ष परिणाम है जिसमें राज्य  की संस्थाएं जब सामाजिक न्याय, समानता या सुरक्षा प्रदान करने में पूरी तरह विफल रहती हैं, तब बाहुबली एक 'समानांतर सत्ता' के रूप में अपनी जगह बना लेते हैं.                                                     अनंत सिंह ने मोकामा क्षेत्र में खौफ के साथ-साथ एक सामंती संरक्षक की जो रहस्यमयी छवि गढ़ी, चाहे वह उनका त्वरित न्याय देने वाला 'जनता दरबार' हो, गरीबों की शादियों में मदद करना हो, या महिलाओं के लिए परिवहन के सख्त नियम तय करना हो, उसने उन्हें जनता के बीच एक मसीहा का दर्जा दे दिया. यही कारण है कि हत्याओं के दर्जनों मुकदमों, एके-47 जैसे हथियारों की बरामदगी, पत्रकारों पर बर्बर हमले और जेल जाने के बावजूद, मोकामा के मतदाता उन्हें बार-बार भारी मतों से चुनते रहे हैं. 2025 में जेल की  सलाखों के पीछे से 28,000 से अधिक वोटों के अंतर से उनकी लगातार छठी जीत इसी जन-मनोविज्ञान का सबसे बड़ा प्रमाण है.                                 अक्टूबर 2026 में जदयू से उनका 6 साल के लिए निष्कासन, उन पर लटकती दल-बदल कानून की तलवार, और अपनी नई पार्टी बनाने की उनकी  घोषणा बिहार की राजनीति में एक नए और बेहद अस्थिर अध्याय की शुरुआत है. यह पूरा घटनाक्रम इस बात की तस्दीक करता है कि क्षेत्रीय क्षत्रप या बाहुबली नेता केवल एक सीमा तक ही पार्टी अनुशासन के प्रति उत्तरदायी होते हैं. जब उनका व्यक्तिगत हित और वर्चस्व पार्टी के आधिकारिक रुख से टकराता है, तो वे पूरी पार्टी संरचना को चुनौती देने से तनिक भी पीछे नहीं हटते.                                                             अंततः, अनंत सिंह की ये 'अनसुनी कहानियां' हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि क्या हमारा लोकतंत्र केवल मतदान की एक यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह गया है, या यह उस कड़वे सामाजिक यथार्थ का प्रतिबिंब है जहां जातिगत सुरक्षा और बाहुबल आज भी सुशासन और विकास के तमाम वादों पर भारी पड़ते हैं. यह एक ऐसा खौफनाक सच है कि जब तक समाज में जातिगत ध्रुवीकरण और राज्य की प्रशासनिक शून्यता मौजूद रहेगी, तब तक बिहार की राजनीति में 'छोटे सरकार' जैसे किरदारों की प्रासंगिकता और उनका तिलिस्म अटूट बना रहेगा.

क्योंकि असली सवाल यह नहीं है कि अनंत सिंह का कुर्ता कितना सफेद है, उनकी गाड़ी कितनी महंगी है या उनके घोड़े कितने शानदार हैं. असली सवाल यह है कि मोकामा में उनकी राजनीतिक पकड़ कैसे बनी, किन परिस्थितियों में कायम रही और आने वाले समय में उसका भविष्य क्या होगा. और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा निचोड़ है. बिहार की राजनीति में कभी-कभी नेताओं  की पार्टी बदल जाती है, लेकिन उसके प्रभाव का सवाल वहीं का वहीं रहता है. अब देखना यह है कि छोटे सरकार अपनी अगली राजनीतिक चाल किस दिशा में चलते हैं.

क्योंकि मोकामा की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है.

"हरि अनंत , हरि कथा अनंता. गंगा के किनारे बसे मोकामा के टाल इलाके में कानून की किताबें नहीं, बल्कि एक 'समानांतर सत्ता' और जनता दरबार का फरमान…"