कांग्रेस ने 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए सचिन पायलट को राज्य का नया प्रभारी बनाया है. भूपेश बघेल की जगह लेने वाले पायलट के सामने चुनौती सिर्फ चुनाव जिताने की नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बरसों से चली आ रही गुटबाजी को खत्म करने की भी है.
बदलाव की वजह
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने छह राज्यों में प्रभारी बदलने का ऐलान किया, जिसमें पंजाब की जिम्मेदारी पायलट को सौंपी गई. बघेल का कार्यकाल पंजाब इकाई में बढ़ती गुटबाजी की वजह से मुश्किलों भरा रहा था.
राज्य कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही थी, वहीं प्रताप सिंह बाजवा और एसएस रंधावा जैसे नेता भी अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में मजबूत माने जाते हैं. पार्टी हाईकमान को यह भी शिकायतें मिल रही थीं कि बघेल, वड़िंग गुट के करीब झुके हुए थे.
पायलट क्यों चुने गए
पायलट की नियुक्ति को हाईकमान की सोची-समझी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है. वे कांग्रेस के प्रमुख युवा ओबीसी चेहरों में गिने जाते हैं, और पंजाब में गुज्जर व अन्य ओबीसी समुदायों के बीच उनकी पकड़ को पार्टी के लिए फायदेमंद माना जा रहा है. इसके अलावा पायलट का पंजाब से पुराना नाता भी है. उनके पिता राजेश पायलट ने 1985 के राजीव-लोंगोवाल समझौते के बाद केंद्र और पंजाब के विभिन्न पक्षों के बीच संवाद बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई थी.
कहा जाता है कि सचिन पायलट बचपन में अपने पिता के साथ पंजाब की उच्चस्तरीय यात्राओं में शामिल रहे, जिससे उन्हें राज्य की राजनीति की शुरुआती समझ मिली.
‘पहले जीत, फिर सीएम’
कांग्रेस नेतृत्व की प्राथमिकता फिलहाल नेतृत्व के सवाल को टालकर एकजुटता बनाना है. पार्टी के भीतर यह संदेश दिया जा रहा है कि नेता मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पर बहस करने के बजाय आम आदमी पार्टी को हराने पर ध्यान दें.
यह इसलिए भी अहम है क्योंकि 2022 में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने वाली आप ही राज्य में मौजूदा सत्ताधारी दल है.
चन्नी और रंधावा जैसे नेताओं ने पायलट की नियुक्ति का स्वागत किया है, जिसे शुरुआती तौर पर सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. हालांकि विजय इंदर सिंगला सहित कई और नेता भी चुनावी तैयारियों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, जिससे संगठन के भीतर सत्ता के कई केंद्र मौजूद हैं और फिलहाल कोई एक नेता पूरी तरह हावी नहीं दिखता.
आगे की चुनौती
पायलट की सबसे बड़ी परीक्षा यह होगी कि वे वड़िंग, चन्नी, बाजवा और रंधावा जैसे प्रभावशाली नेताओं को एक मंच पर लाकर पार्टी को एकजुट कर पाते हैं या नहीं. राहुल गांधी की आगामी पंजाब यात्रा को भी इस दिशा में अहम माना जा रहा है, जिससे उम्मीद जताई जा रही है कि राज्य इकाई में माहौल बदल सकता है.
यह देखना दिलचस्प होगा कि पायलट अपने संगठनात्मक अनुभव और राजनीतिक कौशल का इस्तेमाल कर 2027 से पहले पंजाब कांग्रेस को कितना संगठित कर पाते हैं.
-ममता सिंह
"कांग्रेस ने 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले एक बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए सचिन पायलट को राज्य का नया प्रभारी बनाया है. भूपेश बघेल क…"
