चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ पर अंतरिम रोक लगा दी है. आयोग ने दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को 18 सितंबर सुबह 11 बजे तक तीन-तीन नाम और तीन-तीन मुक्त चुनाव चिह्न प्राथमिकता क्रम में देने का निर्देश दिया है. यह फैसला पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को होने वाले उपचुनाव से ठीक पहले आया है.
आयोग ने क्या कहा?
चुनाव आयोग ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर तृणमूल कांग्रेस में दो प्रतिद्वंद्वी गुट बन चुके हैं, एक ममता बनर्जी के नेतृत्व में और दूसरा अरूप रॉय के नेतृत्व में, और दोनों ही खुद को असली पार्टी बता रहे हैं.
इसलिए यह मामला प्रतीक आदेश (चुनाव चिह्न आरक्षण एवं आवंटन) 1968 के पैरा 15 के तहत तय किया जाएगा. आयोग के मुताबिक उपचुनाव से पहले इतना समय नहीं बचा कि विवाद का पूरी तरह निपटारा हो सके, इसलिए दोनों पक्षों को समान अवसर देने के लिए यह अंतरिम व्यवस्था की गई है.
आयोग ने साफ किया कि जब तक विवाद सुलझ नहीं जाता, न तो कोई गुट ‘अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस’ नाम का इस्तेमाल कर सकेगा, न ही पार्टी के पंजीकृत ‘फूल और घास’ चिह्न का. दोनों गुट चाहें तो अपने चुने हुए नए नाम में मूल पार्टी तृणमूल कांग्रेस से जुड़ाव का ज़िक्र कर सकते हैं, लेकिन असली नाम और चिह्न पर रोक बनी रहेगी.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त विवेक जोशी तथा एस एस संधू की पीठ ने दोनों गुटों से सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया.
यह आदेश सिर्फ आगामी उपचुनावों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तब तक लागू रहेगा जब तक आयोग यह तय नहीं कर लेता कि दोनों में से कौन सा गुट असली तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करता है.
ममता खेमे के सांसद कल्याण बनर्जी ने आयोग से मुलाकात के बाद कहा कि उनकी तरफ से यह कहा गया था कि कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया जाना चाहिए. दूसरी तरफ अरूप रॉय गुट की नुमाइंदगी आयोग के सामने विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रितब्रत बनर्जी ने की.
विवाद की जड़ कहां से शुरू हुई
पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद मई में तृणमूल कांग्रेस में टूट शुरू हुई थी. जून की शुरुआत में पार्टी के 80 में से करीब 60 विधायकों ने नेतृत्व के खिलाफ बगावत कर दी थी. इन बागी विधायकों ने रितब्रत बनर्जी को अपना नेता चुना, जिन्हें बाद में विधानसभा अध्यक्ष ने नेता प्रतिपक्ष के तौर पर मान्यता भी दे दी.
इसी बागी गुट ने बाद में अरूप रॉय को पार्टी अध्यक्ष घोषित किया था. अरूप रॉय जून 2026 में इस बागी गुट द्वारा तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, जबकि इससे पहले वह 2011 से पश्चिम बंगाल सरकार में सहकारिता मंत्री रह चुके थे.
ममता बनर्जी के खेमे को भी बड़ा झटका लगा है. उनके 28 लोकसभा सांसदों में से 20 ने पार्टी छोड़कर अपेक्षाकृत अनजान नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का दामन थाम लिया है. आयोग के सामने दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे हैं.
ममता खेमे का कहना है कि पार्टी का संविधान 9 मार्च को ही आयोग को सौंपा गया था, जिसमें पदाधिकारियों का कार्यकाल पांच साल तय है, और चूंकि पिछला चुनाव 2022 में हुआ था, इसलिए मौजूदा पदाधिकारियों का कार्यकाल 2027 तक वैध है.
वहीं रितब्रत बनर्जी का कहना है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का कार्यकाल 11 फरवरी 2025 को ही खत्म हो चुका था, इसलिए उसके बाद वह कोई फैसला लेने के लिए अधिकृत नहीं रह गई थी. उनके मुताबिक 22 जून को हुई एक विशेष बैठक में अरूप रॉय को सर्वसम्मति से पार्टी अध्यक्ष चुना गया.
शिवसेना और एनसीपी जैसा मामला
आयोग का यह रुख नया नहीं है. इससे पहले शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) में हुई टूट के वक्त भी आयोग ने यही तरीका अपनाया था, विवाद सुलझने तक दोनों गुटों से मूल नाम और चिह्न वापस लेकर, बाद में अंतिम फैसले में एक गुट को पार्टी का असली नाम और चिह्न सौंपा गया था.
-ममता सिंह
"चुनाव आयोग ने 17 सितंबर को अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके आरक्षित चुनाव चिह्न ‘फूल और घास’ पर अंतरिम रोक लगा दी है. आयोग ने दोनो…"
