भारत में संविधान लागू हुए 75 साल से ज्यादा हो चुके हैं. देश ने विज्ञान, शिक्षा और तकनीक में काफी तरक्की की है. इसके बावजूद अंधविश्वास आज भी समाज में मौजूद है.

इसी अंधविश्वास का खामियाजा कई बार महिलाओं को भुगतना पड़ता है. उन्हें ‘डायन’ बताकर प्रताड़ित किया जाता है. कई मामलों में उनके साथ हिंसा भी होती है.

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

इस गंभीर मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में सख्त टिप्पणी की है. ओडिशा के वर्ष 1998 के एक मामले में यह टिप्पणी सामने आई. जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी.

पीठ ने बलकू ओराम की अपील खारिज कर दी. इसी दौरान अदालत ने अंधविश्वास के नाम पर महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा पर चिंता जताई.

सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी बेहद अहम है. यह बताती है कि आधुनिक दौर में भी ऐसी कुरीतियां चिंता का विषय हैं. साथ ही यह सवाल भी उठाती है कि आखिर समाज ऐसी सोच से कब पूरी तरह बाहर आएगा.

‘डायन’ बताकर महिला की हत्या

इस मामले में बलकू ओराम और उसके साथियों पर एक महिला को ‘डायन’ बताने का आरोप था. उन्होंने महिला को उसके घर से बाहर खींच लिया. इसके बाद उसके साथ बेरहमी से मारपीट की गई.

मारपीट इतनी गंभीर थी कि महिला की मौत हो गई. सबसे दर्दनाक बात यह थी कि उसकी बेटी के सामने पूरी घटना हुई. उसे अपनी मां के साथ हुई क्रूरता अपनी आंखों से देखनी पड़ी.

संविधान की भावना का सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना पर गंभीर चिंता जताई. कोर्ट ने कहा कि डायन बताकर महिलाओं को निशाना बनाना बेहद अपमानजनक प्रथा है. ऐसी प्रथाओं को कानून और संविधान की भावना से अलग नहीं रखा जा सकता.

पीठ ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र में कानून का शासन सबसे जरूरी है. अगर ऐसी कुरीतियां जारी रहती हैं, तो लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए यह गंभीर खतरा है.

अदालत ने यह भी कहा कि पीड़िता बेहद असहाय स्थिति में थी. इसके बावजूद उसे डायन बताकर मार डाला गया. उसकी बेटी के सामने हुई यह घटना इस पूरी सोच की भयावहता को दिखाती है.


 


 

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