क्या दलितों और आदिवासियों को भी आर्थिक आधार पर आरक्षण मिलेगा? इस मामले पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष साफ़ रखा है. सरकार ने कहा है कि अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को मिलने वाले आरक्षण में सिर्फ आर्थिक आधार पर बदलाव नहीं किया जा सकता. केंद्र ने संविधान का हवाला देते कहा कि इन वर्गों को आरक्षण उनकी ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है, इसलिए इसे केवल आय के आधार पर तय नहीं किया जा सकता. इनके साथ होने वाला भेदभाव इनकी आय या आर्थिक स्थिति से समाप्त नहीं हो जाता. इसलिए OBC यानी अन्य पिछड़ा वर्ग की तरह SC-ST में 'क्रीमी लेयर' लागू नहीं किया जा सकता.

क्या SC-ST में भी लागू होगा क्रीमी लेयर का नियम? इसके लिए जानते हैं क्रीमी लेयर क्या होता है. क्रीमी लेयर' का इस्तेमाल OBC समुदाय के उस वर्ग के लिए होता है, जो आर्थिक और सामाजिक रूप से समृद्ध हो चुका है. इस वर्ग को OBC आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. सुप्रीम कोर्ट में यह मामला रमाशंकर प्रजापति और अश्विनी उपाध्याय की याचिका से जुड़ा है. याचिकाकर्ताओं की मांग है कि SC और ST आरक्षण से भी 'क्रीमी लेयर' को बाहर किया जाए. यानी जो SC और ST में आर्थिक और सामाजिक रूप से समृद्ध हो गए हैं, उन्हें भी आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाए. ऐसा न करना संविधान के समानता के अधिकार सहित अन्य मूल अधिकारों का उल्लंघन है.

क्या था सुप्रीम कोर्ट का फैसला

2024 में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों वाली संविधान पीठ ने एक बड़ा फैसला दिया. कोर्ट ने कहा कि SC और ST समाज के सभी लोग एक जैसी स्थिति में नहीं हैं. इनके अंदर भी कुछ समूह ज्यादा पिछड़े हो सकते हैं और कुछ समूह आगे बढ़ चुके हो सकते हैं.

कोर्ट ने राज्यों को अनुमति दी कि वे SC-ST के अंदर भी अलग-अलग वर्ग बनाकर उन लोगों को ज्यादा लाभ दे सकते हैं जो ज्यादा जरूरतमंद और पिछड़े हैं. उदाहरण के लिए, अगर किसी राज्य में कुछ SC जातियों को आरक्षण का ज्यादा फायदा मिल रहा है और कुछ जातियां अभी भी पीछे हैं, तो राज्य ऐसी नीति बना सकता है जिससे पीछे रह गए समूहों को प्राथमिकता मिले.

फैसले में कुछ जजों ने यह भी कहा कि SC-ST के अंदर जो लोग बहुत आगे बढ़ चुके हैं, उनके बारे में भी सोचा जाना चाहिए, ताकि आरक्षण का फायदा सबसे जरूरतमंद लोगों तक पहुंच सके. न्यायमूर्ति बी. आर. गवई ने भी इस विचार का समर्थन किया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश नहीं दिया कि SC-ST में तुरंत क्रीमी लेयर लागू कर दी जाए. क्रीमी लेयर की बात केवल कुछ जजों की राय थी, फैसला नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान केंद्र को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने को कहा था.

सरकार की प्रतिक्रिया

सरकार SC-ST में क्रीमी लेयर लागू करने के खिलाफ है. सरकार का कहना है कि SC-ST लोगों का पिछड़ापन सिर्फ पैसे की कमी की वजह से नहीं है, बल्कि जाति के आधार पर होने वाले भेदभाव की वजह से भी है.

सरकार के अनुसार, अगर कोई SC व्यक्ति IAS अधिकारी बन जाता है या आर्थिक रूप से मजबूत हो जाता है, तब भी उसे समाज में जाति से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए सिर्फ उसकी आय देखकर उसे आरक्षण से बाहर नहीं किया जा सकता.

सरकार यह भी कहती है कि SC-ST आरक्षण संविधान में दी गई खास सुरक्षा है. यह उन समुदायों को मौका देने के लिए है, जिन्हें लंबे समय तक जाति के कारण पीछे रखा गया. इसलिए इसमें OBC की तरह क्रीमी लेयर का नियम लागू नहीं किया जा सकता.

OBC और SC-ST में अंतर यह है कि OBC आरक्षण मुख्य रूप से सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर है, जबकि SC-ST आरक्षण का कारण लंबे समय से चला आ रहा जातिगत भेदभाव है. OBC में क्रीमी लेयर लागू है, लेकिन SC-ST में अभी लागू नहीं है.

नई व्यवस्था बनाना संसद का अधिकार

सरकार ने अपने हलफनामे में यह भी कहा कि आरक्षण नीति में बदलाव करना या नई व्यवस्था बनाना सरकार और संसद का अधिकार है, अदालत का नहीं. संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट सरकार को किसी खास तरह की आरक्षण नीति बनाने का निर्देश नहीं दे सकती.

केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा कि इन वर्गों की पहचान संविधान के प्रावधानों, विभिन्न आयोगों की सिफारिशों, संसद के कानूनों और अदालतों के फैसलों के आधार पर तय की गई है. सरकार के मुताबिक आर्थिक पिछड़ापन एक महत्वपूर्ण पहलू हो सकता है, लेकिन खासकर एससी और एसटी के मामले में यह अकेला आधार नहीं हो सकता, क्योंकि उन्हें आरक्षण सदियों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव, छुआछूत, सामाजिक बहिष्कार और भौगोलिक अलगाव को ध्यान में रखकर दिया गया है.

हलफनामे में और क्या कहा गया? केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि संविधान के अनुच्छेद 341(2) और 342(2) के तहत राष्ट्रपति द्वारा अधिसूचित एससी और एसटी की सूची में बदलाव करने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है. इसलिए अदालत या सरकार इस व्यवस्था में बदलाव का निर्देश नहीं दे सकती.


 

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