बहुजन समाज पार्टी के उत्तर प्रदेश में इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह का बुधवार रात निधन हो गया. 55 वर्षीय रसड़ा विधायक सिंह पिछले तीन वर्षों से कैंसर का इलाज करा रहे थे. इलाज के दौरान उन्होंने दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में अंतिम सांस ली. उनके निधन पर बसपा प्रमुख मायावती, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित कई नेताओं ने शोक व्यक्त किया है. आइए जानते हैं कि आख़िर कौन थे बलिया के रॉबिनहुड उमाशंकर सिंह, जिन्हें मायावती राखी बांधा करती थीं.

मायावती क्या बोलीं

बसपा प्रमुख मायावती गुरुवार सुबह लखनऊ में उमाशंकर सिंह के आवास पहुंचीं, जहां उन्होंने उनके पार्थिव शरीर पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी. मीडिया से बातचीत करते हुए मायावती भावुक हो गईं. बहनजी बोलीं, "उमाशंकर सिंह जब से बसपा में आए, उन्होंने पूरी ईमानदारी, निष्ठा और समर्पण के साथ पार्टी की सेवा की. उन्होंने कभी बसपा को धोखा नहीं दिया. भाई तो बहुत बने, लेकिन सब धोखा देकर चले गए, पर इन्होंने कभी साथ नहीं छोड़ा. वे मुझे अपनी सगी बहन मानते थे और हर रक्षाबंधन पर मुझसे राखी बंधवाते थे.” मायावती ने यह भी कहा कि यदि परिवार चाहेगा तो उमाशंकर सिंह के बेटे को राजनीति में आगे बढ़ाया जाएगा और पार्टी उनके परिवार का पूरा ध्यान रखेगी.

कब रहे विधायक

उमाशंकर सिंह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले की रसड़ा विधानसभा सीट से विधायक रहे हैं. वह 2012, 2017 और 2022 में लगातार तीन बार इस सीट से विधायक चुने गए. 2022 के विधानसभा चुनाव में वह BSP के एकमात्र विजयी उम्मीदवार थे.

छात्र राजनीति से शुरुआत

बलिया जिले के नगरा क्षेत्र में जन्मे उमाशंकर सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी. 1991 में सतीश चंद्र कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में महामंत्री बने और यहीं से उनकी राजनीतिक पहचान मजबूत हुई. इसके बाद 2000 में जिला पंचायत सदस्य चुने गए.

पहली बार की विधायकी

उमाशंकर सिंह के राजनीतिक सफ़र का सबसे बड़ा मोड़ 2011 में आया, जब उन्होंने बहुजन समाज पार्टी का दामन थामा. पार्टी सुप्रीमो मायावती ने उनकी संगठन क्षमता और क्षेत्र में मजबूत पकड़ को देखते हुए उन्हें 2012 के विधानसभा चुनाव में मैदान में उतारा. रसड़ा विधानसभा सीट के उम्मीदवार सिंह ने पहली ही बार चुनाव जीतकर मायावती के भरोसे को सही साबित कर दिया. इसके बाद 2017 और 2022 में भी लगातार जीत दर्ज कर उन्होंने रसड़ा सीट पर अपनी मजबूत पकड़ कायम रखी.

2022 का चुनाव

2022 का विधानसभा चुनाव उमाशंकर सिंह के राजनीतिक करियर का सबसे अहम पड़ाव साबित हुआ है. जहां पूरे उत्तर प्रदेश से BSP का सूपड़ा साफ़ हो गया तो वहीं बलिया की एक विधानसभा में उमाशंकर सिंह ने पार्टी की नाक बचा ली. पार्टी केवल एक सीट जीत सकी और वह सीट रसड़ा थी. इसके बाद उन्हें विधानसभा में BSP विधायक दल का नेता भी बनाया गया.

बलिया के रॉबिनहुड

राजनीति के साथ-साथ उमाशंकर सिंह सामाजिक कार्यों के लिए भी जाने जाते थे. उन्होंने अपने क्षेत्र में कई सामूहिक विवाह कार्यक्रम आयोजित किए, गरीबों की मदद की और कोरोना महामारी के दौरान जरूरतमंदों के इलाज तथा ऑक्सीजन उपलब्ध कराने में भी सक्रिय भूमिका निभाई. इन वजहों के चलते उन्हें बलिया का रॉबिनहुड भी कहा जाता था.

ठाकुर वर्चस्व की लड़ाई

इस राजनीतिक सफ़र में ठाकुर वर्चस्व की लड़ाई भी देखने को मिलती है. इसको और बेहतर समझने के लिए बीते साल का मामला देखते हैं. बात है 2025 के अगस्त महीने की, बारिश से NH-31 पर बना कटहल नाला पुल क्षतिग्रस्त हो जाता है. खतरे को देखते हुए PWD ने बिना औपचारिक उद्घाटन के नए पुल पर आवागमन शुरू करवा दिया. इसकी जानकारी मिलते ही योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री दयाशंकर सिंह भड़क गए और मौके पर ही अधिकारियों को बीच सड़क पर फटकारने लगे. देखते ही देखते विकास का मुद्दा वर्चस्व के हत्थे चढ़ गया. दयाशंकर सिंह ने अधिकारियों के साथ उमाशंकर सिंह को भी लपेटे में ले लिया.

बसपा विधायक पर आरोप लगाते हुए, भाजपा विधायक बोले कि PWD अधिकारी बसपा विधायक उमाशंकर सिंह के इशारे पर काम कर रहे हैं. विवाद सिर्फ प्रशासनिक न रहकर व्यक्तिगत हो गया. दयाशंकर सिंह ने उमाशंकर सिंह के परिवार पर तंज कसते हुए यह तक कह दिया कि "उमाशंकर के पिता तेल बेचते थे.” जवाब में उमाशंकर सिंह ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर दयाशंकर सिंह को चेतावनी दे डाली.

दरअसल, यह लड़ाई बलिया की ठाकुर राजनीति से जुड़ी हुई है. दयाशंकर सिंह और उमाशंकर सिंह दोनों बलिया से आते हैं और दोनों ठाकुर समुदाय से हैं, और दोनों की चाहत जिले की राजनीति पर अपनी पकड़ बनाए रखने की रही है. दिलचस्प बात यह भी थी कि उमाशंकर सिंह भले BSP में और मायावती के करीबी थे, पर उनकी सीएम योगी आदित्यनाथ से भी अच्छी नज़दीकी मानी जाती थी. यही वजह थी कि यह टकराव सिर्फ पार्टी लाइन का न होकर क्षेत्रीय वर्चस्व का ज़्यादा था.

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