अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का नाम बदलकर सुपर इंटेलिजेंस (SI) करने वाले कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए हैं. 29 सितंबर को व्हाइट हाउस में बड़ी टेक कंपनियों के CEO के साथ हुई बैठक में यह फैसला लिया गया. इसी बैठक में गूगल, एंथ्रोपिक, मेटा, ओपनएआई, X-AI और एनवीडिया के CEO ने AI की सुरक्षा और निगरानी को लेकर एक समझौते पर भी साइन किए.

ट्रम्प का कहना है कि इस तकनीक को ‘आर्टिफिशियल’ यानी बनावटी कहना ठीक नहीं है. उनके मुताबिक यह इंटरनेट से भी बड़ी तकनीक है. उन्होंने पिछले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महासभा में पहली बार AI को सुपर इंटेलिजेंस कहा था. ट्रम्प ने यह भी कहा कि AI की दौड़ अब अमेरिका और चीन के बीच है और फिलहाल अमेरिका इस मुकाबले में आगे चल रहा है.

समझौते के तहत कंपनियों ने चार बातें मानने पर सहमति दी है. पहली बात यह कि कंपनियां अपने AI मॉडल की खुद जांच करेंगी और देखेंगी कि वो सुरक्षा के तय नियमों का पालन कर रहे हैं या नहीं. दूसरी, हर कंपनी एक अलग टीम बनाएगी, जो AI सिस्टम की निगरानी करेगी और किसी खतरे या गड़बड़ी पर नजर रखेगी. तीसरी, कंपनियां अपने मॉडल की जांच बाहरी विशेषज्ञों या किसी स्वतंत्र संस्था से भी कराएंगी. चौथी, कंपनी के बोर्ड की एक स्वतंत्र समिति इन जांच रिपोर्टों की समीक्षा करेगी और कोई समस्या सामने आने पर उसे दूर करने की जिम्मेदारी भी निभाएगी.

बैठक में AI के लिए जरूरी डेटा सेंटर और दूसरे बुनियादी ढांचे पर भी चर्चा हुई. ट्रम्प ने कहा कि जिन शहरों और कस्बों में डेटा सेंटर बनाए जाएंगे, वहां टेक कंपनियों को स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर काम करना होगा. उनके मुताबिक कंपनियों को इन इलाकों में रहने वाले लोगों की मदद करनी चाहिए, जिसमें स्कूलों, शिक्षकों और दूसरी स्थानीय जरूरतों के लिए आर्थिक सहयोग भी शामिल हो सकता है. ट्रम्प ने कहा कि डेटा सेंटर बनाने से पहले स्थानीय समुदाय के साथ साझेदारी होनी चाहिए, ताकि प्रोजेक्ट का फायदा वहां रहने वाले लोगों को भी मिल सके.

डेटा सेंटर AI के लिए इसलिए जरूरी हैं कि हम जिस AI से सवाल पूछते हैं, उसके पीछे हजारों-लाखों शक्तिशाली कंप्यूटर काम करते हैं. ये कंप्यूटर बड़े डेटा सेंटर में रखे जाते हैं. AI का इस्तेमाल बढ़ने के साथ ऐसे डेटा सेंटर की जरूरत भी बढ़ती जाएगी.

मेटा के CEO मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि व्हाइट हाउस के साथ हुए समझौते का मकसद लोगों का भरोसा बढ़ाना है. उन्होंने कहा कि अमेरिकी नागरिकों और ग्राहकों को यह भरोसा होना चाहिए कि AI तकनीक उसी तरह काम करेगी, जिस तरह उसे बनाया गया है. एंथ्रोपिक के CEO डारियो अमोडेई ने कहा कि तकनीक का विकास सुरक्षित तरीके से तभी हो सकता है, जब सभी कंपनियां मिलकर काम करें.

अमेरिका और चीन के बीच AI की इस दौड़ में चार मोर्चों पर मुकाबला है. पहला मोर्चा चिप्स का है, जिन्हें AI का दिमाग कहा जाता है. जिसके पास बेहतर और ज्यादा चिप्स होंगे, वह बड़े और तेज AI सिस्टम बना सकेगा. दूसरा मोर्चा डेटा सेंटर का है, जहां AI चलाने वाले कंप्यूटर रखे जाते हैं. तीसरा मोर्चा बिजली का है, क्योंकि डेटा सेंटर बहुत ज्यादा बिजली खर्च करते हैं और इस दौड़ में सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं, पर्याप्त और लगातार बिजली मिलना भी जरूरी है. चौथा मोर्चा AI मॉडल का है, यानी कौन सबसे तेज, समझदार और मुश्किल काम करने वाला मॉडल बना पाता है.

 

-ममता सिंह 

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