क्या आपको पता है जिस फ़िल्म को आप सतलुज कह कर पुकार रहे हैं, उसे पहले घल्लूघारा और पंजाब-95 का नाम दिया गया था. अगर नहीं तो आपको बता दें कि यह फ़िल्म ZEE5 पर 3 दिन पहले यानी 3 जुलाई को ही रिलीज़ हुई थी. हालांकि, इसका निर्माण 2022-23 के बीच हो गया था. 

अब आप सोच रहे होंगे कि जब फ़िल्म 3 साल पहले ही बन कर तैयार हो गई थी तो इसे OTT पर इतना लेट क्यों रिलीज़ किया गया. दरअसल, शुरुआत में फ़िल्म का नाम घल्लूघारा था, जिसे बदलकर पंजाब-95 किया गया. लेकिन, मामला तब बदला जब केंद्रीय फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड (CBFC) ने फ़िल्म को थियेटर में रिलीज़ करने के लिए सर्टिफिकेट देने से इंकार कर दिया. बोर्ड ने थियेटर रिलीज़ का सर्टिफिकेट देने के लिए फ़िल्म निर्माताओ से 120 से अधिक कट्स की मांग की. बोर्ड चाहता था कि जसवंत सिंह खालड़ा का असली नाम फ़िल्म से हटा दिया जाए. साथ ही, पंजाब पुलिस का नाम, भारतीय ध्वज और गुरूवाणी के शब्द हटा दिए जाएं. 

मेकर्स ने इन कट्स को हटाने से मना कर दिया जिस कारण यह फ़िल्म 3 साल तक अटकी रही. 

ZEE 5 से क्यों हटाई गई फिल्म?

जब 3 साल तक यह फ़िल्म बड़े पर्दे पर नहीं आ सकी तो मेकर्स ने इसका नाम बदल कर ‘सतलुज’ कर दिया और बिना किसी कट के ZEE5 पर रिलीज़ कर दिया. ये फ़ैसला इसलिए भी लिया गया क्योंकि ओटीटी कंटेंट के लिए सेंसर बोर्ड के प्री-सर्टिफिकेशन की ज़रूरत नहीं होती है. जिसकी वजह से फ़िल्म का मूल रूप दर्शकों के सामने आ सका.

अब बवाल तब हुआ जब 5 जुलाई यानी फ़िल्म रिलीज़ होने के 48 घंटे के अंदर ही ZEE5 ने अचानक इस फ़िल्म को इंडिया में स्ट्रीमिंग से हटा दिया. दरअसल फ़िल्म भारत सरकार के निर्देश पर हटायी गई है. सूत्रों के अनुसार, सरकार का मानना है कि फिल्म के कुछ हिस्सों का "भारत विरोधी ताकतों द्वारा गलत इस्तेमाल" किया जा सकता है, जिससे देश के मौजूदा हालातों और माहौल पर असर पड़ सकता है. 

ओटीटी कंटेंट के लिए थियेटर जैसे सख्त नियमों की प्री-सर्टिफिकेशन व्यवस्था नहीं है, इसलिए सरकार ने आईटी नियमों (IT Rules) के तहत संवेदनशीलता को देखते हुए इस पर एक्शन लिया.

विवाद में विपक्षी दल क्या बोले?

इसी बीच विपक्षी दल और पंजाब के नेताओं का रूख सामने आया है, उन्होंने इस निर्णय का विरोध और निंदा करते हुए सरकार पर पंजाब के सच और इतिहास को दबाने के प्रयास के आरोप लगाए हैं. 

फ़िल्म हटने के बाद बोले दिलजीत 

फ़िल्म के लीड एक्टर दिलजीत दोसांझ ने X पर लिखा, “हमारा अहम मक़सद फ़िल्म को जनता तक पहुंचाना था, हालांकि फ़िल्म को हटा दिया गया है, जिसकी उम्मीद मुझे पहले से ही थी. लेकिन, कई लोगों ने फ़िल्म को डाउनलोड कर लिया है और कई लोगों ने इसे देख भी लिया है. एक जगह लोगों ने फ़िल्म को प्रोजेक्टर पर लगा कर चलाया है.”

दिलजीत ने पोस्ट में आगे लिखा कि “खालड़ा साहब दी आवाज नू कोई नी दबा सकदा.” जिसका मतलब ये है की खालड़ा साहब की आवाज़ को कोई भी दबा नहीं सकता. 

ZEE5 ने भी X पर किया पोस्ट

फिल्म सतलुज को दर्शकों से बहुत प्यार और समर्थन मिला, जिसके लिए वे सभी का धन्यवाद करते हैं. उनका मानना है कि अच्छी कहानियां लोगों को प्रेरित करती हैं और लंबे समय तक असर छोड़ती हैं. हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों के कारण सतलुज को अगले आदेश तक भारत में उपलब्ध नहीं कराया जाएगा. ZEE5 ने भरोसा दिलाया है कि वह सभी जरूरी कानूनी और उचित प्रक्रियाओं का पालन करते हुए फिल्म को जल्द से जल्द दोबारा दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश करेगा. साथ ही, कहा कि वह हमेशा सार्थक और ईमानदारी से बनाई गई कहानियों का समर्थन करता रहेगा. वहीं, ज़ी5 ने दर्शकों से फिल्म की पाइरेसी (गैरकानूनी तरीके से देखना या साझा करना) का समर्थन न करने की अपील की.

क्या है सतलुज की कहानी? 

फिल्म 'सतलुज' का निर्देशन बॉलीवुड के मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर और फिल्ममेकर हनी त्रेहान ने किया है, जबकि इसका निर्माण रॉनी स्क्रूवाला की प्रसिद्ध प्रोडक्शन कंपनी RSVP और मैकगफिन पिक्चर्स ने मिलकर किया है. इस फिल्म में मुख्य किरदार मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा का है, जिसे मशहूर अभिनेता व गायक दिलजीत दोसांझ ने बेहद संजीदगी से निभाया है. उनके साथ फिल्म में अर्जुन रामपाल एक ईमानदार और संवैधानिक पुलिस जांचकर्ता 'समुद्र सिंह' के रूप में नजर आए हैं, जबकि जसवंत सिंह की साहसी पत्नी परमजीत कौर की भूमिका अभिनेत्री गीतिका विद्या ओहल्यान ने निभाई है. इनके अलावा फिल्म में सुविंदर विक्की (पुलिस अधिकारी सुरजीत सिंह सुग्गा) और कंवलजीत सिंह (डीजीपी बिट्टा) जैसे बेहतरीन कलाकार भी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में दिखाई दिए हैं.

फिल्म की कहानी साल 1995 के अमृतसर, पंजाब की पृष्ठभूमि पर आधारित है. जसवंत सिंह खालड़ा (दिलजीत दोसांझ) एक बैंक डायरेक्टर हैं, जो अपनी पत्नी पम्मी (गीतिका विद्या) और बच्चों के साथ सामान्य जीवन जी रहे होते हैं. कहानी में मोड़ तब आता है जब उनकी एक करीबी बुजुर्ग चाची (बीबी गुरपेज कौर) अचानक लापता हो जाती हैं. उनकी तलाश में जब जसवंत सिंह पुलिस और प्रशासन के चक्कर काटते हैं, तो उन्हें कोई सुराग नहीं मिलता. पुलिस में मौजूद उनके दोस्त भी उन्हें इस मामले से दूर रहने की चेतावनी देते हैं.

हार न मानते हुए जसवंत खुद इस मामले की गहराई में उतरते हैं. इस दौरान उन्हें सबूत मिलते हैं कि पुलिस ने उनकी चाची सहित हजारों युवाओं और नागरिकों को गैर-कानूनी ढंग से हिरासत में लिया, उनके फर्जी एनकाउंटर किए और फिर उन्हें गुपचुप तरीके से जला दिया.

पूरी कहानी जसवंत सिंह खालड़ा के खतरनाक खोजी सफर, सिस्टम के खिलाफ उनकी कानूनी लड़ाई और सच को सामने लाने के लिए उनके और उनके परिवार द्वारा चुकाई गई व्यक्तिगत कीमत को बेहद भावुक और रोंगटे खड़े कर देने वाले तरीके से दिखाती है.

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