राजस्थान के NEET-UG कैंडिडेट हर्षवर्धन सिंह की ओर से दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है. छात्र ने सुप्रीम कोर्ट में एक अहम सवाल उठाया था. उनका तर्क था कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए परिवार की अधिकतम वार्षिक आय 8 लाख रुपये तय है, जबकि निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस 18.9 लाख से 25 लाख रुपये सालाना तक पहुंच जाती है. ऐसे में EWS कोटा की सीटें गरीब छात्रों के लिए कैसे उपयोगी हो सकती हैं?

निजी कॉलेजों की फीस पर रोक लगाने से इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने छात्र की इस दलील को स्वीकार नहीं किया. अदालत ने स्पष्ट किया कि निजी मेडिकल कॉलेजों को सरकारी संस्थानों की तरह कम फीस लेने के लिए दबाव नहीं बना सकते. कोर्ट ने कहा कि निजी और सरकारी संस्थानों की वित्तीय संरचना और कार्यप्रणाली पूरी तरह अलग होती है.

सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों को सरकार से अनुदान मिलता है, जबकि निजी संस्थान अपने संसाधनों से संचालन करते हैं. इसलिए दोनों की फीस संरचना की तुलना करना सही नहीं है.

स्कॉलरशिप और सब्सिडी को बताया विकल्प

अदालत ने कहा कि यदि कोई छात्र निजी मेडिकल कॉलेज की फीस भरने में असक्षम है तो उसके लिए छात्रवृत्ति, वित्तीय सहायता और सब्सिडी जैसे उपाय उपलब्ध हैं. केवल अधिक फीस होने के आधार पर निजी संस्थानों की फीस कम करने का आदेश नहीं दिया जा सकता.

डॉक्टरों की बढ़ती जरूरत का भी दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि निजी मेडिकल कॉलेजों को कम फीस लेने के लिए मजबूर किया गया, तो मेडिकल शिक्षा क्षेत्र में उनकी भागीदारी प्रभावित हो सकती है. देश में डॉक्टरों की बढ़ती जरूरत को देखते हुए निजी संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसे राजस्थान हाई कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई कारण नजर नहीं आता. इसलिए याचिका खारिज की जाती है. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर इस मामले में कानून से जुड़ा कोई सवाल उठता है तो उसे भविष्य के लिए खुला रखा गया है.


 


 

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