उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में, जब औपनिवेशिक भारत का छोटानागपुर पठार ब्रिटिश विस्तारवाद और जमींदारों के क्रूर शोषण से कराह रहा था, तब एक ऐसे जननायक का उदय हुआ जिसने न केवल शोषित जनजातीय समाज को एक सूत्र में पिरोया, बल्कि एक न्यायपूर्ण समाज की स्पष्ट परिकल्पना भी प्रस्तुत की. आज भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि है. आइए, 'धरती आबा' के जीवन, उनके 'उलगुलान'  और उनके उस ऐतिहासिक संघर्ष को समझते हैं, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं.

 

जल, जंगल और जमीन की छीनी गई विरासत

बिरसा मुंडा के आंदोलन की गहराई को समझने के लिए उस दौर की 'खूंटकट्टी'  व्यवस्था को समझना अत्यंत आवश्यक है. खूंटकट्टी प्रणाली मुंडा और अन्य आदिवासी समुदायों के बीच प्राचीन काल से प्रचलित सामुदायिक भूमि स्वामित्व की एक विशिष्ट व्यवस्था थी. इस व्यवस्था में भूमि को कभी भी खरीद-बिक्री की वस्तु या व्यक्तिगत संपत्ति नहीं माना जाता था, यह एक पवित्र पैतृक धरोहर थी जो उनकी पहचान से जुड़ी थी. 

लेकिन ब्रिटिश शासन ने अधिकतम राजस्व वसूलने के लिए जब 'जमींदारी प्रणाली' लागू की, तो इससे बाहरी लोगों जिन्हें आदिवासी 'दीकू' कहते थे, का प्रवेश क्षेत्र में तेजी से होने लगा. साहूकारों, ठेकेदारों और ब्रिटिश अधिकारियों ने ऋण के जाल, धोखाधड़ी और कानूनी दांव-पेंच से आदिवासियों की पुश्तैनी खूंटकट्टी जमीनों पर व्यवस्थित रूप से कब्जा कर लिया.

परिणामस्वरूप, जो मुंडा कभी अपनी भूमि के प्राकृतिक स्वामी हुआ करते थे, उन्हें अपनी ही ज़मीन पर भूमिहीन मजदूर और 'बेगार' बनने के लिए विवश कर दिया गया. इसके अतिरिक्त, 'भारतीय वन अधिनियम' के लागू होने से सरकार ने वनों पर अपना एकाधिकार स्थापित कर लिया और आदिवासियों को जंगलों के उपयोग, लकड़ी काटने और वनोपज इकट्ठा करने के उनके पारंपरिक अधिकारों से पूरी तरह वंचित कर दिया.

 

मिशनरियों से वैचारिक टकराव

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, भगवान बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को रांची जिले के उलिहातू गांव में हुआ था (कुछ स्रोत 1872 भी इंगित करते हैं) उनका नाम बृहस्पतिवार को जन्म लेने के कारण मुंडा परंपरा के अनुसार 'बिरसा' रखा गया था. 

 

अत्यधिक गरीबी के कारण उनके परिवार को रोजगार की तलाश में बार-बार पलायन करना पड़ा, जिससे बिरसा मुंडा  ने बचपन से ही विस्थापित आदिवासियों की दयनीय स्थिति और जमींदारों के अत्याचार का बहुत करीब से प्रत्यक्ष अनुभव किया.

 

उनकी कुशाग्र बुद्धि को देखकर उन्हें जर्मन मिशन स्कूल भेजा गया, जहां प्रवेश के लिए उन्हें ईसाई धर्म अपनाना पड़ा और बपतिस्मा के बाद उनका नाम 'बिरसा डेविड' या दाउद रखा गया. यहीं उनकी वैचारिक नींव में एक बड़ा और परिवर्तनकारी बदलाव आया. उन्होंने महसूस किया कि ब्रिटिश प्रशासक और ईसाई मिशनरी इस पश्चिमी शिक्षा का उपयोग आदिवासियों को उनकी पारंपरिक संस्कृति से विमुख करने और उनका धर्मांतरण करने के लिए कर रहे हैं. 

 

जब उन्होंने अपनी संस्कृति के इस अपमान का प्रखर विरोध किया और मिशनरियों का मजाक उड़ाना शुरू किया, तो उन्हें स्कूल से निकाल दिया गया. बाद में स्वामी आनंद पांडे के संपर्क में आकर उन्होंने वैष्णववाद, रामायण और महाभारत का गहरा अध्ययन किया, जिसने उनके दार्शनिक दृष्टिकोण को एक नया और व्यापक आयाम दिया.

 

'बिरसैत' का उदय: धर्म से राजनीति तक का सफर

ब्रिटिश सरकार  की बंदूकों और मिशनरियों के प्रलोभनों का मुकाबला करने के लिए बिरसा मुंडा  ने समाज को आंतरिक रूप से सशक्त बनाने की ठानी और 1895 के आसपास एक नए स्वदेशी और सुधारवादी धर्म 'बिरसैत' की स्थापना की. 

इस नए पंथ में उन्होंने कठोर एकेश्वरवाद का पालन करते हुए समाज को अनेक देवी-देवताओं के बजाय केवल एक सर्वोच्च ईश्वर, 'सिंगबोंगा' की आराधना करने का निर्देश दिया. इसके साथ ही उन्होंने समाज में गहराई तक व्याप्त जादू-टोना, अंधविश्वास, पशुबलि और हड़िया (शराब) व अन्य मादक पदार्थों के सेवन पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाने का कठोर उपदेश दिया.

 

बिरसा ने आदिवासियों के भीतर सांस्कृतिक गौरव जगाते हुए अपने अनुयायियों को स्पष्ट रूप से समझाया कि "हमें किसी बाहरी व्यक्ति के भगवान के सामने सिर क्यों झुकाना चाहिए?" यह पंथ ब्रिटिश धर्मांतरण गतिविधियों और प्रशासकीय नियंत्रण के खिलाफ एक सीधा राजनीतिक प्रहार था. उनके अनुयायियों ने ब्रिटिश साम्राज्य और ईसाई मिशनरियों को खुले तौर पर अपना सबसे बड़ा दुश्मन घोषित कर दिया, जिससे एक अनुशासित और साम्राज्यवाद विरोधी राजनीतिक शक्ति का निर्माण हुआ.

 

उलगुलान  और डोंबारी बुरू का रक्तरंजित नरसंहार

शांतिपूर्ण सरदारी लड़ाई के विफल हो जाने और ब्रिटिश न्याय प्रणाली से निराश होने के बाद, बिरसा मुंडा ने सशस्त्र बलों को संगठित कर गुरिल्ला युद्ध की उन्नत रणनीति अपनाई. जल्द ही छोटानागपुर के जंगलों में राष्ट्रवाद और विद्रोह का एक अत्यंत शक्तिशाली नारा सुनाई देने लगा: "अबुवा राज एते जाना, महारानी राज टुंडू जाना" (महारानी का राज खत्म हो और हमारा राज स्थापित हो).  24 दिसंबर 1899 को क्रिसमस की पूर्व संध्या पर उन्होंने औपचारिक रूप से 'उलगुलान'  का शंखनाद कर दिया.

इस उलगुलान का सबसे क्रूर और निर्णायक अध्याय 9 जनवरी 1900 को खूंटी जिले की 'डोंबारी बुरू' पहाड़ी पर लिखा गया, जिसे जनजातीय इतिहास का 'जलियांवाला बाग' भी कहा जाता है. भगवान बिरसा वहां अपने सहयोगियों के साथ एक विशाल गुप्त जनसभा कर रहे थे, जिसमें आस-पास के दर्जनों गांवों के हजारों आदिवासी, महिलाएं और बच्चे शामिल थे. 

 

इस युद्ध की एक अद्वितीय विशेषता यह थी कि सेनापति गया मुंडा की पत्नी माकी मुंडा जैसी वीरांगनाओं ने भी अग्रिम मोर्चे पर ब्रिटिश बंदूकों का सीना तानकर सामना किया.

 

दुर्भाग्यवश, मुखबिरों की सूचना पर आधुनिक हथियारों, स्नाइपर राइफलों और तोपों से लैस 150 ब्रिटिश सैनिकों ने पहाड़ी को घेरकर बिना किसी पूर्व चेतावनी के भीड़ पर अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी. मुंडा विद्रोहियों ने अदम्य साहस दिखाते हुए केवल तीर-धनुष, गोफन और पत्थरों से 72 घंटों तक पलटवार किया, लेकिन ब्रिटिश सेना की गोलीबारी में 400 से अधिक निर्दोष आदिवासी मौके पर ही शहीद हो गए. 

 

यह भीषण नरसंहार इतना भयानक था कि शहीदों के अनगिनत शवों से पहाड़ी खून से लाल हो गई और पास बहने वाली 'ताजना नदी' का पानी कई दिनों तक लाल रंग का बहता रहा.

 

गद्दारी, शहादत और विरासत

 

स्थानीय मुखबिरों की गद्दारी और अंग्रेजों द्वारा रखे गए 500 रुपये के भारी इनाम के लालच के कारण, 3 मार्च 1900 को चक्रधरपुर के निकट घने जंगलों में सोते समय बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर लिया गया. रांची की जेल में उन पर राजद्रोह और हत्या सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए, और न्यायिक प्रक्रिया के बीच ही 9 जून 1900 को खून की उल्टियां करने के बाद मात्र 25 वर्ष की अत्यंत युवा आयु में इस महान जननायक का निधन हो गया. 

जेल अधिकारियों ने आधिकारिक रूप से उनकी मृत्यु का कारण 'हैजा' बताया, लेकिन आदिवासी समाज और समकालीन इतिहासकारों का आज भी यह दृढ़ विश्वास है कि अंग्रेजों ने उनके जीवित रहने को खतरा मानते हुए उन्हें जेल के भोजन में धीमा जहर  देकर मारा था.

बिरसा मुंडा के  विद्रोह और जन-दबाव के प्रत्यक्ष विधायी परिणाम के रूप में अंग्रेजी सरकार को छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम, 1908 (CNT Act) पारित करना पड़ा. इस अधिनियम ने पहली बार ब्रिटिश इतिहास में 'मुंडारी खूंटकट्टी' व्यवस्था को कानूनी मान्यता दी और गैर-आदिवासियों को भूमि हस्तांतरण पर सख्त रोक लगा दी, यह कानून आज भी झारखंड में लागू है और आदिवासियों की भूमि की रक्षा कर रहा है.

 

 

"उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में, जब औपनिवेशिक भारत का छोटानागपुर पठार ब्रिटिश विस्तारवाद और जमींदारों के क्रूर शोषण से कराह रहा था, तब एक ऐसे…"