क्या थी घटना?
14 अप्रैल 1990 को आतंकवादियों ने SKIMS कहब्बा खातून हॉस्टल में घुसकर सरला भट का अपहरण कर लिया, बाद में 5 दिन तक उनका गैंगरेप करने के बाद, गोली मारकर बेरहमी से हत्या कर दी गई. शव को डाउनटाउन श्रीनगर की उमर कॉलोनी (मल्लाबाग) में फेंक दिया गया था. उनके शरीर पर गोलियों के कई निशान थे और हत्यारों ने शव के पास एक नोट छोड़ा था, जिसमें उन्हें 'पुलिस मुखबिर' बताया गया था.
कश्मीर में था डर का माहौल
1980 के आखिर और 1990 की शुरुआत में कश्मीर भीषण आतंकवाद से जूझ रहा था. अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडितों पर सुनियोजित हमले किया जा रहे थे. आतंकवादियों की ओर से पोस्टर, अख़बार के विज्ञापनों और मस्जिदों के लाउडस्पीकर के ज़रिए धमकियां दी जा रही थीं. पंडितों को चेतावनी दी जा रही थी कि वे कश्मीर छोड़ दें, वरना उन्हें इसके गंभीर नतीजे भुगतने होंगे. इन्हीं सब के बीच 21 जनवरी 1990 को गौकदल नरसंहार हुआ. इसमें करीब 50 लोगों की जानें गईं. इसके बाद घाटी से कश्मीरी पंडितों का बड़े पैमाने पर पलायन हुआ. अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स के आंकड़ों के अनुसार हज़ारों परिवार अपने घर छोड़कर जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों में चले गए. बड़े विस्थापन के बाद हुए सरला हत्याकांड को भी उन्हीं घटनाक्रमों से जोड़कर देखा जाता है.
सरला भट्ट क्यों बनीं निशाना?
घाटी में बड़े स्तर पर हुए पलायन के बाद भी कई कश्मीरी पंडितों को उम्मीद थी कि एक दिन सब कुछ ठीक हो जाएगा. लेकिन, अलगाववादी ऐसे लोगों को चुन-चुनकर निशाना बनाते थे. उनके पास ऐसे लोगों की लिस्ट होती थी जो घाटी में तब भी मौजूद थे. इन्हीं में सरला भट्ट भी थीं. सरला ने लगातार धमकियों के बाद भी नौकरी नहीं छोड़ी. उनकी हत्या के बाद मामले में FIR होने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई थी. 2025 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा के आदेश पर केस दोबारा खोला गया और मामले की जांच शुरू हुई. अब 36 साल बाद सरला को न्याय मिलने के उम्मीद है.
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