आज जब एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए करीब 95 रुपये खर्च करने पड़ते हैं, तो अक्सर यह सवाल उठता है कि आखिर आज़ादी के समय रुपये की स्थिति क्या थी और कैसे भारतीय मुद्रा का इतना पतन हुआ.
भारत को 1947 में आज़ादी मिली थी. उस समय भारतीय रुपया दुनिया की अपेक्षाकृत मजबूत मुद्राओं में गिना जाता था. भारत पर विदेशी कर्ज का बोझ सीमित था और विनिमय दर पूरी तरह बाजार के भरोसे नहीं था, बल्कि सरकारी नियंत्रण में तय होता था.
1947 में कितना था एक डॉलर?
आम तौर पर माना जाता है कि 1947 में एक अमेरिकी डॉलर लगभग 3.30 रुपये के आसपास था. हालांकि उस समय की विनिमय व्यवस्था आज की तरह मुक्त बाजार आधारित नहीं थी और कई आर्थिक कारक सरकारी नियंत्रण में थे.
आज की तुलना करें तो भारतीय रुपये ने डॉलर के मुकाबले अपनी बड़ी कीमत गंवाई है. आज एक डॉलर करीब 95 रुपये के आसपास पहुंच चुका है. यानी आज़ादी के बाद से डॉलर के मुकाबले रुपये का मूल्य लगभग 28 गुना से अधिक घट चुका है. इस वर्ष 2026 में रुपया अभी तक 6 प्रतिशत से अधिक टूटा है.
क्यों कमजोर हो रहा रुपया?
भारत लंबे समय से कच्चे तेल का बड़ा आयातक रहा है. तेल खरीदने के लिए डॉलर की जरूरत पड़ती है. जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था बढ़ी, आयात भी बढ़ता गया और डॉलर की मांग लगातार बढ़ती रही.
1966 में भारत ने रुपये का बड़ा अवमूल्यन किया. विदेशी मुद्रा संकट और आर्थिक दबावों के कारण सरकार को यह कदम उठाना पड़ा. इसके बाद डॉलर के मुकाबले रुपये में तेज गिरावट दर्ज हुई.
1991 भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ऐतिहासिक वर्ष था. विदेशी मुद्रा भंडार गंभीर संकट में पहुंच गया था. देश के पास कुछ ही हफ्तों के आयात के बराबर डॉलर बचे थे जिसे हम बैलेन्स ऑफ पेमेंट की समस्या कहते हैं. इसके बाद आर्थिक उदारीकरण शुरू हुआ और रुपये को धीरे-धीरे बाजार आधारित विनिमय व्यवस्था की ओर ले जाया गया.
अमेरिकी डॉलर दुनिया की प्रमुख रिजर्व मुद्रा है. अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, कच्चे तेल की खरीद-बिक्री और अधिकांश वित्तीय लेनदेन डॉलर में होते हैं, इसलिए दुनिया भर की मुद्राओं पर डॉलर का प्रभाव बना रहता है.
दशक-दर-दशक रुपया
क्या कमजोर रुपया हमेशा बुरी खबर है?
कमजोर रुपया भारतीय निर्यातकों के लिए फायदेमंद हो सकता है क्योंकि उन्हें डॉलर में अधिक आय मिलती है. आईटी कंपनियां, फ़ार्मा कंपनियां और कई निर्यातक उद्योग इससे लाभ उठाते हैं. हालांकि आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं, जिससे महंगाई बढ़ती है और आम उपभोक्ता पर बोझ पड़ता है. देश के लिए रुपये का मजबूत होना ही फायदेमंद है गिरता हुआ रुपया व्यापार में वित्तीय घाटे में इजाफा करेगा और इससे आर्थिक समस्या को बल मिलेगा.
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