भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 23 जून को 7-दिवसीय Variable Rate Repo (VRR) नीलामी के जरिए बैंकों को 1.41 लाख करोड़ रुपये उपलब्ध कराए. केंद्रीय बैंक ने 2 लाख करोड़ रुपये तक की नकदी देने की पेशकश की थी, लेकिन बैंकों ने केवल 1.41 लाख करोड़ रुपये की मांग की. इस नीलामी में ब्याज दर 5.26 प्रतिशत रही. इस वित्त वर्ष का यह चौथा VRR नीलामी था.
बैंकों को भी पैसों की जरूरत पड़ती है
अधिकतर लोग जरूरत पड़ने पर बैंक से ऋण लेते हैं. लेकिन कई बार बैंक भी ऐसी स्थिति में पहुंच जाते हैं, जब उन्हें कुछ दिनों के लिए अतिरिक्त धन की जरूरत होती है. तिमाही के अंत में बढ़ी हुई नकदी मांग, कर भुगतान, बड़े लेनदेन या ऋण वितरण के कारण बैंकों पर नकदी का दबाव बढ़ सकता है. ऐसी स्थिति में बैंक देश के केंद्रीय बैंक RBI से मदद लेते हैं.
क्या है VRR?
VRR का पूरा नाम Variable Rate Repo है. सरल शब्दों में कहें तो यह RBI द्वारा बैंकों को कुछ दिनों के लिए दिया जाने वाला अल्पकालिक ऋण है. बैंक यह पैसा हमेशा के लिए नहीं लेते. तय अवधि पूरी होने पर उन्हें यह राशि ब्याज सहित RBI को वापस करनी होती है. 23 जून को आयोजित नीलामी में बैंकों को यह धन 7 दिनों के लिए मिला है. यानी यह पैसा 30 जून को RBI के पास वापस लौट जाएगा.
आखिर RBI ऐसा क्यों करता है?
RBI का एक बड़ा काम देश की बैंकिंग व्यवस्था में नकदी का संतुलन बनाए रखना है. अगर बैंकों के पास पर्याप्त धन नहीं होगा, तो ऋण वितरण प्रभावित हो सकता है और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है. इसे ऐसे समझिए, अगर किसी शहर में अचानक पानी की मांग बढ़ जाए, तो जल विभाग अतिरिक्त पानी छोड़ता है ताकि सप्लाई प्रभावित न हो. ठीक उसी तरह बैंकिंग सिस्टम में नकदी की जरूरत बढ़ने पर RBI अतिरिक्त धन उपलब्ध कराता है.
क्या यह पैसा सीधे लोगों तक पहुंचता है?
नहीं. RBI से मिलने वाला यह पैसा सीधे लोगों के खातों में नहीं जाता. यह पहले बैंकों के पास पहुंचता है. बैंक इसका उपयोग अपने दैनिक कामकाज, नकदी जरूरतों और ऋण वितरण को सुचारु बनाए रखने के लिए करते हैं. यानी यह पैसा बैंकिंग सिस्टम को मजबूत बनाए रखने का काम करता है.
क्या RBI नोट छापकर पैसा देता है?
नहीं. यह सबसे बड़ी गलतफहमी है. VRR के तहत दिया गया पैसा स्थायी नहीं होता. यह केवल कुछ दिनों के लिए दिया जाता है और बाद में ब्याज सहित RBI के पास वापस लौट आता है. इसलिए अर्थशास्त्री इसे "लिक्विडिटी मैनेजमेंट" यानी नकदी प्रबंधन कहते हैं, न कि "मनी प्रिंटिंग".
आम लोगों पर क्या असर पड़ता है?
VRR का असर सीधे दिखाई नहीं देता, लेकिन इसके फायदे पूरी अर्थव्यवस्था तक पहुंचते हैं. जब बैंकों के पास पर्याप्त नकदी होती है, तो ऋण वितरण बेहतर रहता है. उद्योगों और कारोबारियों को फंड जुटाने में आसानी होती है. वित्तीय बाजारों में स्थिरता बनी रहती है और आर्थिक गतिविधियों को समर्थन मिलता है. यही वजह है कि RBI समय-समय पर ऐसी नीलामियां आयोजित करता है.
RBI क्या संकेत देना चाहता है?
जून महीने में लगातार VRR नीलामियां आयोजित करके RBI यह संदेश दे रहा है कि वह बैंकिंग सिस्टम में नकदी की उपलब्धता को लेकर सतर्क है. केंद्रीय बैंक चाहता है कि बाजार में पैसों की कोई कमी न हो और ब्याज दरों पर अनावश्यक दबाव न बने. हालांकि बैंकों ने पूरी राशि नहीं उठाई, लेकिन RBI का यह कदम बाजार को भरोसा देता है कि जरूरत पड़ने पर केंद्रीय बैंक पर्याप्त नकदी उपलब्ध कराने के लिए तैयार है.
"भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 23 जून को 7-दिवसीय Variable Rate Repo (VRR) नीलामी के जरिए बैंकों को 1.41 लाख करोड़ रुपये उपलब्ध कराए. केंद्रीय…"
