भारतीय रिजर्व बैंक ने गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों यानी एनबीएफ़सी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई की है. केंद्रीय बैंक ने 59 कंपनियों के पंजीकरण प्रमाणपत्र (सीओआर) रद्द कर दिए हैं.
आरबीआई ने यह कार्रवाई भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 की धारा 45-आईए की उपधारा (6) के तहत की है. पंजीकरण रद्द होने के बाद ये कंपनियां अब गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्था के रूप में कारोबार नहीं कर सकेंगी.
पश्चिम बंगाल की कंपनियों पर सबसे ज्यादा कार्रवाई
आरबीआई की 59 कंपनियों की सूची में सबसे अधिक कंपनियां पश्चिम बंगाल की हैं. उपलब्ध पंजीकृत कार्यालयों के आधार पर 59 में से 43 कंपनियां पश्चिम बंगाल की हैं. इसके बाद महाराष्ट्र की 11, दिल्ली की 3, जबकि गुजरात और तेलंगाना की एक-एक कंपनी शामिल हैं. इस तरह कुल कार्रवाई में पश्चिम बंगाल की कंपनियों की हिस्सेदारी करीब 73 प्रतिशत है.
सूची की शुरुआत में ट्रिन्कास कंसल्टेंसी, ट्रिपल रैंक कंसल्टेंट्स, ट्रिस्टार एजेंसिज, ट्रू मर्केंटाइल, तुलसी ट्रिम्पेक्स और टर्फ एडवरटाइजिंग एंड मार्केटिंग जैसी कंपनियां शामिल हैं, जिनके पंजीकृत कार्यालय पश्चिम बंगाल में हैं.
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कई कंपनियों का पंजीकरण 20 से 30 साल पुराना
आरबीआई की कार्रवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि सूची में शामिल कई कंपनियों का पंजीकरण काफी पुराना है. मसलन, स्टेड ट्रेडर्स का पंजीकरण प्रमाणपत्र अप्रैल 1991 में जारी हुआ था. वहीं विस्टा विजन का मार्च 1998, जिग्मा कंसल्टेंट्स का नवंबर 1998 और कंपास फिनस्टॉक का अगस्त 1999 में पंजीकरण हुआ था.
इसी तरह डुलीचंद फाइनेंस एंड लीजिंग का पंजीकरण फ़रवरी 1998 और पीएनआर होल्डिंग्स का मार्च 1998 में हुआ था.
इससे साफ है कि आरबीआई की सूची में केवल हाल में स्थापित कंपनियां नहीं हैं, बल्कि कई ऐसी कंपनियां भी हैं जिनके पास वर्षों से पंजीकरण प्रमाणपत्र मौजूद था.
क्या सभी कंपनियों पर धोखाधड़ी का आरोप है?
आरबीआई की विज्ञप्ति में प्रत्येक कंपनी के पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द करने की अलग-अलग वजह नहीं बताई गई है. इसलिए केवल पंजीकरण रद्द होने के आधार पर इन कंपनियों को धोखाधड़ी करने वाली कंपनियां कहना उचित नहीं होगा.
आरबीआई पहले भी ऐसी कंपनियों के पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द करता रहा है जो गैर-बैंकिंग वित्तीय कारोबार नहीं कर रही थीं. केंद्रीय बैंक के नियमों में यह भी स्पष्ट किया गया है कि पंजीकरण प्रमाणपत्र का उद्देश्य गैर-बैंकिंग वित्तीय कारोबार करने वाली कंपनियों को नियामकीय ढांचे में रखना है.
आम लोगों पर क्या पड़ेगा असर?
अगर किसी व्यक्ति का इन कंपनियों से ऋण या कोई अन्य वित्तीय संबंध है, तो केवल इस आरबीआई विज्ञप्ति के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका पैसा डूब गया है.
आरबीआई ने इस विज्ञप्ति में ग्राहकों की संख्या, जमा राशि, ऋण की राशि या कंपनियों की कुल देनदारी से संबंधित आंकड़े जारी नहीं किए हैं. हालांकि एक बात पूरी तरह स्पष्ट है कि पंजीकरण प्रमाणपत्र रद्द होने के बाद संबंधित कंपनियां गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्था के रूप में कारोबार नहीं कर सकतीं.
आरबीआई की कार्रवाई से क्या संकेत मिलता है?
इस कार्रवाई से यह संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक एनबीएफसी क्षेत्र में ऐसे संस्थानों को नियामकीय दायरे से बाहर रखने के पक्ष में नहीं है, जो अब पात्रता पूरी नहीं करते या जिनके पास वैध पंजीकरण बनाए रखने का आधार नहीं है. आरबीआई पहले भी ऐसी कंपनियों के प्रमाणपत्र रद्द करता रहा है.
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