विधानसभा चुनाव से कुछ ही महीने पहले कांग्रेस ने पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नेतृत्व बदल दिया है. पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान और जालंधर कैंट से विधायक परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया है. यह फैसला अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग के इस्तीफे के कुछ ही घंटों बाद आया. वड़िंग ने दिल्ली में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को इस्तीफा सौंपा और बदलाव के लिए सीधे तौर पर पंजाब के नए प्रभारी सचिन पायलट को जिम्मेदार ठहराया. 

उनका कहना था कि नए महासचिव को लगा कि उनकी ‘छुट्टी कर देनी चाहिए.’ लेकिन यह बदलाव केवल एक पद की अदला-बदली नहीं है. इसके पीछे महीनों की गुटबाजी, क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण और दोआबा में भाजपा की बढ़ती सक्रियता जैसे कई कारण काम कर रहे हैं.

वड़िंग की विदाई की जड़ें कहां थीं?
वड़िंग की विदाई की जड़ें उस खींचतान में हैं जो लुधियाना के सांसद वड़िंग और जालंधर के सांसद व पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के बीच महीनों से चल रही थी. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकमान में यह धारणा बन चुकी थी कि लगभग पूरा शीर्ष राज्य नेतृत्व वड़िंग से असहज है. इसके बावजूद पार्टी ने अजय माकन समिति की नेतृत्व परिवर्तन की सिफारिशों पर तुरंत अमल नहीं किया. 
पार्टी के भीतर, दिल्ली और पंजाब दोनों जगह, एक बड़े वर्ग का मानना था कि वड़िंग इसलिए टिके हुए हैं क्योंकि उन्हें पायलट के पूर्ववर्ती प्रभारी भूपेश बघेल का समर्थन हासिल है. चन्नी खेमे के विरोध के बीच बघेल को पिछले महीने बदल दिया गया, और सूत्रों के अनुसार उसी समय साफ हो गया था कि वड़िंग का समय अब सीमित है.

पायलट का फीडबैक और "सम्मानजनक विदाई" की कोशिश
पायलट ने प्रभार संभालने के बाद जो फीडबैक जुटाया, उसने इस धारणा को और पुख्ता किया. सूत्रों का कहना है कि वड़िंग के करीबी माने जाने वाले नेताओं ने भी यही राय दी कि वो बड़े वर्ग का भरोसा नहीं जीत पाएंगे और उन्हें पद पर रखने से पंजाब को वापस जीतने की कोशिशें उलझेंगी. 
पायलट ने यह बात पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी तक पहुंचाई और फैसला उन्हीं पर छोड़ दिया. इस हफ्ते पार्टी ने बदलाव का मन बना लिया. सूत्रों के मुताबिक, पायलट नहीं चाहते थे कि इसकी घोषणा महज एक बयान के जरिए हो. उन्होंने नेतृत्व से आग्रह किया कि वड़िंग से मुलाकात कर यह सुनिश्चित किया जाए कि बदलाव ‘सहज और गरिमापूर्ण’ रहे. पर वड़िंग को माहौल का अंदाजा हो गया था. उन्होंने एक्स पर अपना बायो बदलकर नाराजगी सार्वजनिक की और दबाव बनाने की कोशिश की, मगर तब तक हाईकमान अपना फैसला कर चुका था.

वड़िंग की जगह कौन? हाईकमान की कसौटी
हाईकमान की सबसे बड़ी चिंता यह थी कि अध्यक्ष पद किसी ऐसे नेता को न मिले जो मुख्यमंत्री पद का दावेदार हो. चन्नी और गुरदासपुर के सांसद व पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखजिंदर सिंह रंधावा, दोनों इस दौड़ में हैं, और नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा भी. ऐसे में इन दोनों में से किसी को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का मतलब बाकी गुटों को नाराज करना और पार्टी का संतुलन बिगाड़ना होता. 
विजय इंदर सिंगला, राणा के.पी. सिंह और भारत भूषण आशु जैसे हिंदू नेताओं के नामों पर भी चर्चा हुई, लेकिन नेतृत्व की स्पष्ट सोच थी कि प्रदेश कांग्रेस की कमान किसी सिख चेहरे के हाथ में होनी चाहिए. 
साथ ही वह चेहरा ऐसा हो जो पूरे पंजाब में जाना जाता हो, पर अगले साल पार्टी की सरकार बनने की स्थिति में मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल न हो. इन्हीं कसौटियों पर परगट सिंह खरे उतरे.

हॉकी के मैदान से सियासत तक: परगट सिंह का सफर
62 वर्षीय परगट सिंह जालंधर के मिठापुर गांव से आते हैं, जो हॉकी खिलाड़ियों की नर्सरी के रूप में जाना जाता है. फुल-बैक के तौर पर खेलते हुए वे अपनी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ डिफेंडरों में गिने गए. उन्होंने 1988 के सियोल, 1992 के बार्सिलोना और 1996 के अटलांटा ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया. आखिरी दो में वो टीम के कप्तान रहे और अटलांटा में उद्घाटन समारोह में देश के ध्वजवाहक भी बने. 
1986 के एशियाई खेलों में कांस्य और 1990 में रजत पदक उनके खाते में दर्ज है. उन्हें 1989 में अर्जुन पुरस्कार और 1998 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. संन्यास के बाद उन्होंने पुरुष राष्ट्रीय टीम को कोचिंग दी और 2017 में हॉकी पंजाब के महासचिव रहे. राजनीति में उनकी शुरुआत 2012 में शिरोमणि अकाली दल से हुई, जब उन्होंने पहली बार जालंधर कैंट से जीत दर्ज की. 2016 में उन्होंने अकाली दल से नाता तोड़ा और अगले साल कांग्रेस में शामिल हो गए.

मालवा, माझा और दोआबा: क्षेत्रीय संतुलन का गणित
इस नियुक्ति का क्षेत्रीय पहलू भी अहम है. वड़िंग मालवा से हैं, जबकि उनसे पहले अध्यक्ष रहे प्रताप सिंह बाजवा माझा से आते हैं. परगट सिंह दोआबा के नेता हैं. कांग्रेस ने 2010 में मोहिंदर केपी के बाद 16 साल में पहली बार दोआबा से प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. माना जा रहा है कि इसके जरिए पार्टी मालवा और माझा के बीच पनप रही गुटबाजी को संतुलित करना चाहती है. हाईकमान परगट सिंह की नियुक्ति को वड़िंग, चन्नी, बाजवा और अन्य धड़ों के बीच संतुलन साधने वाले कदम के रूप में देख रहा है.

दोआबा की 23 सीटें और भाजपा की बढ़त
इसके पीछे दोआबा की चुनावी अहमियत भी है. इस क्षेत्र की 23 सीटों को सभी दल अपना ट्रंप कार्ड मान रहे हैं. दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, भाजपा जनवरी 2026 से यहां बढ़त बनाकर चल रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डेरा बल्लां जाना और आदमपुर एयरपोर्ट का नाम श्री गुरु रविदास महाराज के नाम पर रखने की पहल इसके उदाहरण के तौर पर गिनाए गए हैं. दो दिन पहले ही गृह मंत्री अमित शाह जालंधर कैंट के परागपुर में रैली कर गए हैं, जबकि प्रधानमंत्री इससे पहले दो बार जालंधर का दौरा कर चुके हैं. 
ऐसे में जालंधर के ही विधायक को कमान सौंपना दोआबा में भाजपा के बढ़ते असर को काटने की कोशिश भी माना जा रहा है.

जट्ट सिख समीकरण में निरंतरता 
सामाजिक समीकरण के स्तर पर देखें तो कांग्रेस ने कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है. परगट सिंह और वड़िंग, दोनों जट्ट सिख समुदाय से हैं. यानी हाईकमान ने समुदाय बदलने के बजाय संगठन को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान दिया है.

इनसाइड स्टोरी
नियुक्ति की अंदरूनी कहानी को लेकर एक दूसरी रिपोर्ट में अलग तस्वीर पेश की गई है. उसके मुताबिक विजय इंदर सिंगला का नाम लगभग तय था, लेकिन 2 अक्टूबर को इस्तीफा सौंपने के बाद वड़िंग ने राहुल गांधी से मुलाकात में इसका कड़ा विरोध किया. दावा है कि उन्होंने तर्क दिया कि सिंगला चन्नी खेमे के हैं और उनके अध्यक्ष बनने से पार्टी पर चन्नी गुट का दबदबा हो जाएगा, जबकि हिंदू चेहरा होने से जट्ट सिख वोटर नाराज हो सकते हैं. रिपोर्ट के अनुसार, इसके बाद राहुल गांधी ने पायलट से बात की, पायलट ने चन्नी और रंधावा से संवाद किया और सहमति बनने पर अंतिम समय में सिंगला की जगह परगट सिंह का नाम तय हुआ. 

परगट सिंह के सामने चुनौतियां
परगट सिंह के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं. सबसे बड़ी चुनौती गुटों को साथ रखने की है. चन्नी को अंततः हाईकमान के फैसले पर सहमत होना पड़ा, पर यह समझौता कितना टिकेगा, यह देखना बाकी है. वड़िंग की सार्वजनिक नाराजगी भी बताती है कि असंतोष पूरी तरह थमा नहीं है. दूसरी चुनौती सामाजिक दायरा बढ़ाने की है. केवल दोआबा या जट्ट सिख चेहरे के भरोसे 2027 की लड़ाई नहीं जीती जा सकती. उन्हें मालवा, शहरी हिंदू मतदाताओं, दलित समुदाय और माझा के नेताओं को साथ लेकर चलना होगा. तीसरी चुनौती भाजपा की रफ्तार का जवाब देने की है. दोआबा में भाजपा कथित तौर पर आगे चल रही है और कांग्रेस को इसका मुकाबला जमीन पर संगठन खड़ा करके करना होगा, केवल चेहरा बदलने से बात नहीं बनेगी.

कुल मिलाकर परगट सिंह की नियुक्ति कांग्रेस का संतुलन साधने वाला दांव है. उन्हें गुटों से ऊपर माना जाने वाला, मुख्यमंत्री की दौड़ से बाहर, दोआबा से आने वाला और साफ छवि वाला चेहरा समझकर चुना गया है. लेकिन यह फैसला गुटबाजी का इलाज नहीं, उसे थामने की कोशिश भर है. 
चुनाव में गिनती के महीने बचे हैं और परगट सिंह के पास संगठन खड़ा करने, गुटों को जोड़ने और दोआबा में भाजपा की बढ़त का जवाब देने के लिए बहुत कम समय है. हॉकी के मैदान में डिफेंडर का काम गोल बचाना होता है, पर राजनीति के मैदान में प्रदेश अध्यक्ष से हमले की रणनीति भी बनाने की उम्मीद की जाती है.

 

-ममता सिंह 

 

"विधानसभा चुनाव से कुछ ही महीने पहले कांग्रेस ने पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी का नेतृत्व बदल दिया है. पूर्व भारतीय हॉकी कप्तान और जालंधर कैंट …"