किसी भी फिल्म की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी कहानी दर्शकों को कितनी मजबूती से बांध पाती है. सुरेश त्रिवेणी के निर्देशन में बनी नई फिल्म 'मां बहन' एक बेहतरीन नारीवादी डार्क कॉमेडी बन सकती थी, लेकिन कमजोर और उलझे हुए लेखन ने इस शानदार विचार को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है. इस फिल्म में माधुरी दीक्षित, तृप्ति डिमरी, परेश रावल और धारणा दुर्गा जैसी बेहतरीन कलाकारों की टोली है, इसके बावजूद फिल्म दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाती.
क्या है फिल्म की कहानी?
उत्तर भारत के एक छोटे से काल्पनिक शहर पर आधारित इस फिल्म की कहानी मुख्य रूप से रेखा (माधुरी दीक्षित) और उनकी दो बेटियों, जया (तृप्ति डिमरी) और सुषमा (धारणा दुर्गा) के इर्द-गिर्द घूमती है. इन नामों को सुनकर आपको मशहूर निरमा विज्ञापन की याद जरूर आ जाएगी, जिसे फिल्म में चतुराई से इस्तेमाल किया गया है. इस परिवार के इर्द-गिर्द एक ऐसा पितृसत्तात्मक माहौल बुना गया है,
जहां ससुर अपने लिए एक कप चाय नहीं बना सकते, देवर को तवे से उतरी गरमा-गरम रोटियां चाहिए और एक लापरवाह पति अपनी ही सालियों के साथ फ्लर्ट करने से बाज नहीं आता. मोहल्ले का माहौल भी ठेठ है, जहां हर कोई एक-दूसरे की जिंदगी में दखलंदाजी करता है.
कहानी में नया मोड़ तब आता है जब स्लीवलेस चोली पहनने वाली बेबाक रेखा अपने नए नवेले पति (जतिन सरना) के साथ वापस लौटती है. इसे देखकर पड़ोस में रहने वाला हट्टा-कट्टा पड़ोसी (रवि किशन) और उनकी पत्नी (गीतांजलि कुलकर्णी) भी संदेह में पड़ जाते हैं.
दिग्गज निर्देशक और लेखिका की जोड़ी नहीं दिखा पाई कमाल
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसका बिखरा हुआ स्क्रीनप्ले है. एक ही कहानी में रसोई में पड़ी खून से लथपथ लाश, एक गायब इंसान, शादी की रस्में, दोबारा पनपता रोमांस, सोशल मीडिया पर रील बनाने की लत और छोटे शहर की चुगलियों को एक साथ ठूंसने की कोशिश की गई है. इतने सारे ट्रैक्स एक साथ चलने के कारण कहानी पूरी तरह उलझ जाती है और मुख्य मुद्दा कहीं खो जाता है. यह यकीन करना मुश्किल होता है कि यह 'तुम्हारी सुल्लू' और 'जलसा' जैसी बेहतरीन फिल्में देने वाले सुरेश त्रिवेणी की फ़िल्म है.
इस फिल्म की लेखिका पूजा तलोनी हैं, जो एफटीआईआई (FTII) पुणे से पढ़ी हैं. पूजा इससे पहले 'सेक्रेड गेम्स सीजन-2', 'सरफिरा' और 'लस्ट स्टोरीज-2' जैसे शानदार और चर्चित प्रोजेक्ट लिख चुकी हैं. उनकी पिछली जबरदस्त राइटिंग को देखते हुए 'मां बहन' का उलझा हुआ लेखन काफी निराश करता है.
फिल्म में क्या है खास?
तमाम खामियों के बावजूद फिल्म का आखिरी हिस्सा थोड़ी राहत देता है. फिल्म का असली मजा आखिरी के चौथाई हिस्से में आता है. इस दौरान तृप्ति डिमरी को एक बेहद दमदार सीन मिला है, जहां वह अपने निकम्मे पति को खूब खरी-खोटी सुनाती हैं. इस सीन में उनके पति का किरदार निभा रहे शार्दुल भारद्वाज का अभिनय भी काबिले तारीफ है.
इसके अलावा इंटरनेट सेंसेशन धारणा दुर्गा को स्क्रीन पर छोटे-छोटे मौकों में जितना भी समय मिला है, उन्होंने अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है.
इस फिल्म में एक धमाकेदार कॉमेडी बनने की पूरी क्षमता थी. माधुरी दीक्षित की बेमिसाल कॉमिक टाइमिंग का हिंदी सिनेमा ने कभी पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया है, और यह फिल्म उन्हें एक बेबाक और मजेदार अंदाज में पेश करने का सुनहरा मौका थी. दुर्भाग्य से, एक तयशुदा सांचे में बांधकर इतने शानदार कलाकारों की प्रतिभा को जाया कर दिया गया.
उम्मीद है कि भविष्य में कोई ऐसी फिल्म जरूर बनेगी जो माधुरी दीक्षित के टैलेंट को उसका असली हक दिलाएगी, लेकिन अफसोस की बात है कि 'मां बहन' वह फिल्म नहीं है.
"किसी भी फिल्म की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी कहानी दर्शकों को कितनी मजबूती से बांध पाती है. सुरेश त्रिवेणी के निर्देशन में बनी नई…"
