अगर कोई महिला और पुरुष कई सालों से बिना शादी के साथ रह रहे हैं और उनका रिश्ता पूरी तरह पति-पत्नी जैसा है, तो क्या उस महिला को कानून पत्नी की तरह सुरक्षा देगा?
मान लीजिए, कुछ समय बाद पुरुष महिला को मारने-पीटने लगे, दहेज की मांग करे या मानसिक रूप से प्रताड़ित करे. ऐसे में क्या महिला सिर्फ इसलिए न्याय से वंचित रह जाएगी क्योंकि दोनों की शादी नहीं हुई?अब इस सवाल का जवाब काफी हद तक बदल गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने दिया नया फैसला
3 अगस्त को सुप्रीम Court ने एक अहम फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि कुछ खास परिस्थितियों में लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला भी IPC की धारा 498A (अब BNS की धारा 85) के तहत शिकायत दर्ज करा सकती है.
यानी अगर रिश्ता शादी जैसा था और महिला के साथ क्रूरता हुई है, तो सिर्फ शादी का सर्टिफिकेट न होने की वजह से उसे कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता.
498A क्या है?
498A ऐसा कानून है जो पति या उसके परिवार द्वारा महिला के साथ की गई क्रूरता, मारपीट, मानसिक उत्पीड़न और दहेज के लिए प्रताड़ना जैसे मामलों में लागू होता है. इस कानून के तहत दोषी पाए जाने पर आरोपी को तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कुछ मामलों में यही सुरक्षा लिव-इन पार्टनर को भी मिल सकती है.
क्या हर लिव-इन रिलेशनशिप को मिलेगा यह अधिकार?
नहीं, कोर्ट ने साफ कहा है कि हर लिव-इन रिलेशनशिप इस फैसले के दायरे में नहीं आएगी.
इसके लिए कुछ शर्तें पूरी होना जरूरी हैं.
- रिश्ता लंबे समय से चल रहा हो.
- दोनों पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हों.
- दोनों एक-दूसरे की जिम्मेदारियां निभा रहे हों.
- रिश्ता गंभीर हो, सिर्फ कुछ समय का या कैजुअल न हो.
- यह दिखे कि दोनों का रिश्ता शादी जैसे जीवन की तरह था.
यह मामला शुरू कैसे हुआ?
यह मामला कर्नाटक का है. एक महिला ने अपने लिव-इन पार्टनर पर आरोप लगाया कि उसने अपनी पहली शादी की बात छिपाई, दहेज के लिए प्रताड़ित किया और उसके साथ मारपीट की. आरोपी ने अदालत में कहा कि जब शादी हुई ही नहीं, तो 498A कैसे लागू हो सकता है? पहले कर्नाटक हाईकोर्ट ने उसकी दलील खारिज की. बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि सिर्फ शादी न होने की वजह से महिला को कानूनी सुरक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता.
कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क्रूरता सिर्फ शादी में ही नहीं होती. अगर किसी महिला के साथ उसी तरह का उत्पीड़न लिव-इन रिलेशनशिप में भी हो रहा है, तो कानून उसकी भी रक्षा करेगा. कोर्ट ने यह भी कहा कि सिर्फ रिश्ते का नाम देखकर कानून अलग व्यवहार नहीं कर सकता. ऐसा करना संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ होगा.
घरेलू हिंसा कानून पहले से था, फिर नया फैसला क्यों?
केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को पहले से ही Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005 (घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005) के तहत सुरक्षा मिलती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट इससे सहमत नहीं हुआ. कोर्ट ने कहा कि घरेलू हिंसा कानून और 498A दोनों अलग-अलग उद्देश्य पूरे करते हैं. घरेलू हिंसा कानून का मकसद पीड़ित महिला को राहत देना है. जैसे रहने का अधिकार, सुरक्षा आदेश और मुआवजा.
जबकि 498A एक आपराधिक कानून है. इसका मकसद आरोपी को सजा दिलाना है. यानी एक कानून राहत देता है और दूसरा अपराध करने वाले को सजा दिलाने का रास्ता देता है. इसलिए दोनों कानून एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते.
समाज बदल रहा है, कानून भी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी माना कि आज के समय में शादी से पहले साथ रहना पहले की तुलना में ज्यादा सामान्य हो गया है. समाज बदल रहा है और रिश्तों को देखने का नजरिया भी बदल रहा है. ऐसे में कानून का काम भी बदलते समाज के साथ लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है.
आखिर इसका मतलब क्या है?
इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि अब हर लिव-इन रिलेशनशिप को शादी के बराबर मान लिया गया है. लेकिन अगर कोई महिला लंबे समय से शादी जैसे रिश्ते में रह रही थी और उसके साथ हिंसा या दहेज के नाम पर प्रताड़ना हुई है, तो सिर्फ शादी न होने की वजह से उसे न्याय से वंचित नहीं किया जाएगा. यह फैसला महिलाओं की कानूनी सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
"अगर कोई महिला और पुरुष कई सालों से बिना शादी के साथ रह रहे हैं और उनका रिश्ता पूरी तरह पति-पत्नी जैसा है, तो क्या उस महिला को कानून पत्नी की…"
