कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता खुर्रम परवेज़ को दिल्ली हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. जम्मू-कश्मीर सिविल सोसाइटी के प्रमुख चेहरों में शामिल परवेज़ बीते साढ़े चार सालों से जेल में बंद थे. गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धाराओं में आरोपित परवेज़ को अदालत ने जमानत दे दी है.

क्या था आरोप

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने 2021 में खुर्रम परवेज़ पर आरोप लगाया था कि वह जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकी संगठनों से संपर्क में हैं. इन आरोपों में आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के कथित ओवरग्राउंड वर्कर (OGW) नेटवर्क से जुड़े होने का आरोप भी शामिल था. एजेंसी के अनुसार, परवेज़ पर आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन जुटाने, युवाओं की भर्ती में सहायता करने, सुरक्षा बलों की गतिविधियों से जुड़ी सूचनाएं एकत्र करने तथा अलगाववादी और आतंकी नेटवर्क को लॉजिस्टिक समर्थन उपलब्ध कराने का आरोप भी था.

एनआईए ने दावा किया था कि परवेज़ एक व्यापक आतंकी साजिश का हिस्सा थे, जिसके जरिए जम्मू-कश्मीर में हिंसा और अस्थिरता को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही थी.

परवेज़ समर्थकों की सफाई

खुर्रम परवेज़ के वकीलों और समर्थकों का कहना था कि उनके खिलाफ लगाए गए आरोपों को साबित करने के लिए जांच एजेंसियों के पास कोई प्रत्यक्ष और ठोस सबूत नहीं है. बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि एनआईए परवेज़ को किसी आतंकवादी संगठन, आतंकवादी गतिविधि या आतंक वित्तपोषण से सीधे तौर पर जोड़ने में विफल रही है. उनके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, दस्तावेजों और संचार रिकॉर्ड की जांच में भी ऐसा कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिला, जिससे भर्ती, फंडिंग या हिंसक गतिविधियों में उनकी भूमिका साबित हो सके.

समर्थकों का तर्क था कि परवेज़ पिछले दो दशकों से जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघनों, जबरन गुमशुदगी और नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े मुद्दों पर काम कर रहे हैं और उनकी गिरफ्तारी उनके मानवाधिकार कार्यों के कारण हुई है.

कब हुई थी गिरफ्तारी

खुर्रम परवेज़ को 2021 में 22 नवंबर के रोज राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने श्रीनगर स्थित उनके घर और कार्यालय पर छापेमारी के बाद गिरफ्तार किया था. इसके बाद उन्हें दिल्ली लाया गया और UAPA के तहत मामला चलाया गया. तब से वह लगातार जेल में थे और उनकी जमानत याचिकाएं कई बार खारिज भी हुईं.

कोर्ट ने जमानत देते हुए क्या कहा?

दिल्ली हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें परवेज़ की जमानत याचिका खारिज की गई थी. परवेज़ को जमानत देते हुए अदालत ने माना कि वह लगभग साढ़े चार साल से हिरासत में हैं. साथ ही मुकदमे के जल्द पूरा होने की संभावना नहीं दिख रही है. ऐसे में अदालत ने यह भी माना कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लंबी अवधि की हिरासत के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत देने का अर्थ आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं है और मामले का ट्रायल आगे भी जारी रहेगा.

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